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रुद्राक्ष एक - उपयोग अनेक

By: Rekha Kalpdev | 25-Jun-2019
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रुद्राक्ष एक - उपयोग अनेक

रुद्राक्ष में विद्युत चुंबकीय गुण होते हैं जो शरीर क्रिया विज्ञान पर प्रभाव डालते हैं। रुद्राक्ष कवच सबसे शक्तिशाली प्रतिकारक यंत्र होता है क्योंकि यह व्यक्ति के सकारात्मक गुणों में वृद्धि करता है और हर नकारात्मक पक्ष को मिटाता है। शिव की विशेष कृपा व आशीर्वाद रुद्राक्ष धारण करने वालों पर होती है। नेपाल के राजा अपने सच्चे एक मुखी रुद्राक्ष की वजह से राजतंत्र में रहे, जबकि जन्मपत्री में अशुभ योग थे।

रुद्राक्ष का शास्त्रों में विवेचन

अलग-अलग ग्रहों की शक्तियों की अभिवृद्धि के लिए अलग-अलग प्रतिनिधि रुद्राक्ष धारण करने का विधान है। रुद्राक्ष धारण करने से मन स्थिर होता है तथा विभिन्न रोगों का शमन होता है। रुद्राक्ष सामान्यतया पांच मुखी पाए जाते हैं, लेकिन एक से चौदह मुखी रुद्राक्ष का उल्लेख शिव पुराण, पद्म पुराण आदि में मिलता है।

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रुद्राक्ष की उत्पत्ति

प्रस्तुत खण्ड में सभी प्रकार के रुद्राक्षों का वर्णन, धारण विधि, मंत्र, विनियोग, रहस्य आदि का विस्तृत विवरण है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार रुद्राक्ष के जन्मदाता स्वयं भगवान् शिव हैं। इसका प्रमाण लिंग पुराण, स्कन्दपुराण, शिव पुराण, अग्नि पुराण आदि ग्रन्थों में मिलता है। रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान् शिव के नेत्र के अश्रुकणों से है। विश्व के सभी देशों व धर्मों के लोग इसकी उपयोगिता स्वीकारते हैं। भारत में मुख्यतः यह बंगाल एवं असम के जंगलों में तथा हरिद्वार एवं देहरादून के पहाड़ी क्षेत्रों तथा दक्षिण भारत के नीलगिरी, मैसूर और अन्नामलै क्षेत्र व नेपाल देश के क्षेत्रों में रुद्राक्ष के वृक्ष अधिक पाये जाते हैं। रुद्राक्ष के वृक्ष सामान्य रूप से आम के वृक्षों की तरह होते हैं। आम के पत्तों की तरह इसके पत्ते भी होते हैं।

इसका फूल सफेद रंग का होता है इसके फल हरी आभा युक्त नीले रंग के गोल आकार में आधा इंच से एक इन्च व्यास तक के होते हैं। फल की गुठली पर प्राकृतिक रूप से कुछ धारियां होती हैं और धारियों के बीच का भाग रवेदार होता है। गुठलियों पर आड़ी धारियों से ही रुद्राक्ष के मुखों की गणना की जाती है। रुद्राक्ष के रंग तथा मुख एवं उसमें बने छिद्र प्राकृतिक रूप से होते हैं। ये मुख्यतः चार रंगों में पाये जाते हैं।

रुद्राक्ष प्रकरण

1. श्वेत वर्ण || 2. रक्त वर्ण || 3. पीत वर्ण || 4. श्याम वर्ण रुद्राक्ष

रुद्राक्ष के छोटे एवं काले दानों के वृक्ष अधिकांशतः इण्डोनेशिया में पाये जाते हैं तथा नेपाल में भी इसके कुछ वृक्ष हैं। इण्डोनेशिया में विशेषतौर पर 1 मुखी, 2 और 3 मुखी पाया जाता है। ये रूद्राक्ष नेपाल में बहुत कम पाया जाता है। इसलिए 1 मुखी, 2 मुखी और 3 मुखी नेपाली दाना का मूल्य अधिक होता है।

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रुद्राक्ष का महत्त्व

रुद्राक्ष की नित्य पूजा करने, धारण करने या विविध रूपों में इसे उपयोग करने से अन्न वस्त्र एवं ऐश्वर्य की कमी नहीं होती तथा शरीर में अनेक रोगों को शमन करने में रुद्राक्ष सहायक होता है। किसी भी रंग या किसी भी क्षेत्र का रुद्राक्ष अनेक सिद्धियों एवं रोगों के उपचार के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। रुद्राक्ष-पाप वृत्ति से दूर रखता है, हिंसक कार्यो से बचाता है भूत प्रेत एवं ऊपरी बाधाओं से रक्षा भी करता है तथा पाप कर्मों को नष्ट करके पुण्य का उदय करता है। रुद्राक्ष को धारण करने से बुद्धि का विकास होता है। इस लोक में सुख भोगने के बाद शिव लोक में जाने का अधिकार प्राप्त होता है। रुद्राक्ष धारी व्यक्ति की अल्पमृत्यु नहीं होती एवं रुद्राक्ष दीर्घायु प्रदान करता है। रुद्राक्ष से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं।


पहचान एवं उपयोग

रुद्राक्ष आम के पेड़ जैसे एक पेड़ का फल है। ये पेड़ दक्षिण एशिया में मुख्यतः जावा, मलयेशिया, ताइवान, भारत एवं नेपाल में पाए जाते हैं। भारत में ये मुख्यतः असम, अरुणांचल प्रदेश एवं देहरादून में पाए जाते हैं। रुद्राक्ष के फल से छिलका उतारकर उसके बीज को पानी में गलाकर साफ किया जाता है। इसके बीज ही रुद्राक्ष रूप में माला आदि बनाने में उपयोग में लाए जाते हैं। इसके अंदर प्राकृतिक छिद्र होते हैं एवं संतरे की तरह फांकें बनी होती हैं जो मुख कहलाती हैं। रुद्राक्ष की जाति के ही दूसरे फल हैं भद्रास एवं इंद्राक्ष। भद्राक्ष में मुख जनित धारियां नहीं होती हैं। इंद्राक्ष अब लुप्त हो चुका है और देखने में नहीं आता।

कहा जाता है कि सती की मृत्यु पर शिवजी को बहुत दुख हुआ और उनके आंसू अनेक स्थानों पर गिरे जिससे रुद्राक्ष ( शिव के आंसू) की उत्पत्ति हुई। इसीलिए जो व्यक्ति रुद्राक्ष धारण करता है उसे सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। चंद्रमा शिवजी के भाल पर सदा विराजमान रहता है अतः चंद्र ग्रह जनित कोई भी कष्ट हो तो रुद्राक्ष धारण से बिल्कुल दूर हो जाता है। किसी भी प्रकार की मानसिक उद्विग्नता, रोग एवं शनि के द्वारा पीड़ित चंद्र अर्थात साढ़े साती से मुक्ति में रुद्राक्ष अत्यंत उपयोगी है। शिव सर्पों को गले में माला बनाकर धारण करते हैं। अतः कालसर्प जनित कष्टों के निवारण में भी रुद्राक्ष विशेष उपयोगी होता है।

रुद्राक्ष सामान्यतया पांच मुखी पाए जाते हैं, लेकिन एक से चौदह मुखी रुद्राक्ष का उल्लेख शिव पुराण, पद्म पुराण आदि में मिलता है। रुद्राक्ष के मुख की पहचान उसे बीच से दो टुकड़ों में काट कर की जा सकती है। जितने मुख होते हैं उतनी ही फांकें नजर आती हैं। हर रुद्राक्ष किसी न किसी ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। इनका विभिन्न रोगों के उपचार में भी विशेष उपयोग होता है। रुद्राक्षों में एक मुखी अति दुर्लभ है। शुद्ध एक मुखी रुद्राक्ष तो देखने में मिलता ही नहीं है। नेपाल का गोल एक मुखी रुद्राक्ष अत्यंत ही दुर्लभ है। इसके स्थान पर दक्षिण भारत में पाया जाने वाला एक मुखी काजूदाना अत्यंत ही प्रचलित है। असम में पाया जाने वाला गोल दाने का एक मुखी रुद्राक्ष भी बहुत प्रचलित है। इक्कीस मुखी से ऊपर के रुद्राक्ष अति दुर्लभ हैं।

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दुर्लभ रुद्राक्ष

इसके अतिरिक्त अट्ठाइस मुखी तक के रुद्राक्ष भी पाए जाते हैं। मालाएं अधिकांशतः इंडोनेशिया से उपलब्ध रुद्राक्षों की बनाई जाती हैं। बड़े दानों की मालाएं छोटे दानों की मालाओं की अपेक्षा सस्ती होती हैं। साफ, स्वच्छ, सख्त, चिकने व साफ मुख दिखाई देने वाले दानों की माला काफी महंगी होती है। रुद्राक्ष के अन्य रूपों में गौरी शंकर, गौरी गणेश, गणेश एवं त्रिजुटी आदि हैं। गौरी शंकर रुद्राक्ष में दो रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं। ये दोनों रुद्राक्ष गौरी एवं शंकर के प्रतीक हैं। इसे धारण करने से दाम्पत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है। इसी प्रकार गौरी गणेश में भी दो रुद्राक्ष जुड़े होते हैं एक बड़ा एक छोटा, मानो पार्वती की गोद में गणेश विराजमान हों।

इस रुद्राक्ष को धारण करने से पुत्र संतान की प्राप्ति होती है एवं संतान के सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। गणेश रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से हाथी की सूंड जैसी आकृति बनी होती है। इसे धारण करने से सभी प्रकार के अवरोध दूर होते हैं एवं दुर्घटना से बचाव होता है। त्रिजुटी रुद्राक्ष में तीन रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं। यह अति दुर्लभ रुद्राक्ष है और इसे धारण करने से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है।

रुद्राक्ष के बारे में कुछ भ्रम भी प्रचलित हैं। जैसे कि पहचान के लिए कहा जाता है कि तांबे के दो सिक्कों के बीच में यदि रुद्राक्ष को रखा जाए और वह असली हो तो धीमी गति से घूमता हुआ नजर आएगा। वास्तव में रुद्राक्ष जैसी किसी भी गोल कांटेदार वस्तु को यदि इस तरह पकड़ा जाएगा तो वह असंतुलन के कारण घूमेगी। दूसरा भ्रम यह है कि असली रुद्राक्ष पानी में डूबता है, नकली नहीं। यह बात इस तथ्य तक तो सही है कि लकड़ी का बना कृत्रिम रुद्राक्ष नहीं डूबेगा। रुद्राक्ष का बीज भारी होने के कारण डूब जाता है लेकिन यदि असली रुद्राक्ष पूरा पका नहीं हो या छिद्र में हवा भरी रह गई हो तो वह भी पानी से हल्का ही रहता है, डूबता नहीं।

अधिक मुख वाले रुद्राक्ष एवं एक मुखी रुद्राक्ष महंगे होने के कारण नकली भी बना लिए जाते हैं। प्रायः कम मुखी रुद्राक्ष में अतिरिक्त मुख की धारियां बना दी जाती हैं जिससे कम मूल्य का रुद्राक्ष अधिक मूल्य का हो जाता है। इस तथ्य की जांच करने के लिए रुद्राक्ष को बीच से काटकर फांकों की गिनती की जा सकती है। दूसरे, अनुभव द्वारा इन कृत्रिम धारियों और प्राकृतिक धारियों में अंतर किया जा सकता है। कभी-कभी दो रुद्राक्षों को जोड़कर भी एक महंगा रुद्राक्ष बना लिया जाता है। गौरी शंकर, गौरी गणेश या त्रिजुटी रुद्राक्ष अक्सर इस प्रकार बना लिए जाते हैं। इसकी जांच के लिए यदि रुद्राक्ष को पानी में उबाल दिया जाए तो नकली रुद्राक्ष के टुकड़े हो जाएंगे जबकि असली रुद्राक्ष ज्यों का त्यों रह जाएगा। कई बार नकली रुद्राक्ष को भारी करने के लिए छिद्रों में पारा या सीसा भर दिया जाता है। उबालने से यह पारा या सीसा बाहर आ जाता है और रुद्राक्ष तैरने लगता है।

कई बार देखने में आता है कि रुद्राक्ष पर सर्प, गणेश, त्रिशूल आदि बने होते हैं। ये सभी आकृतियां प्राकृतिक नहीं होती हैं, इस प्रकार के रुद्राक्ष केवल नकली ही होते हैं। अतः महंगे रुद्राक्ष किसी विश्वसनीय प्रतिष्ठान से ही खरीदना उचित है। असली एवं विश्वसनीय रुद्राक्ष की प्राप्ति के लिए फ्यूचर पॉइंट रत्न एवं रुद्राक्ष भंडार में आपका स्वागत है। मुख्यतः रुद्राक्ष पन्द्रह प्रकार के पाये जाते हैं। जिसमें प्रथम गौरीशंकर से लेकर चतुर्दश मुखी तक रुद्राक्ष हैं, इसके अनेक प्रकार से लाभ हैं। यूं तो रुद्राक्ष को वैज्ञानिक आधार पर बिना मंत्र का उच्चारण किये भी धारण किया जा सकता है। किन्तु यदि शास्त्रीय विधि से रुद्राक्ष को अभिमन्त्रित करके धारण किया जाये रुद्राक्ष को अभिमन्त्रित करने से उसमें विलक्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है। इसकी विधि यह है कि किसी योग्य पंडित से रुद्राक्ष को अभिमन्त्रित कराया जाये और फिर उपयोग में लाया जाय प्रत्येक रुद्राक्ष का अलग-अलग मंत्र ग्रन्थों में पाया जाता है।

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रुद्राक्ष का आधुनिक मूल्यांकन

रुद्राक्ष अनेक रूपां में मानव जीवन के लिए उपयोगी है। इसे भस्म बनाकर उपयोग में लाया जाता है तथा जल शोधित किया जाता है। लिंग स्वरूप मान कर भी इसकी पूजा होती है। माला बनाकर गले में धारण की जा सकती है। छोटे दानों को गले, कलाई एवं कमर में भी बांध कर उपयोग में लाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जातक के ग्रह प्रतिकूल होने पर रुद्राक्ष की माला धारण करने से ग्रहों का अनुकूल फल प्राप्त होता है। वैज्ञानिक आधार पर आज रुद्राक्ष अपनी कसौटी पर खरा उतर चुका है और लोगों को अनेक तरह से लाभ प्रदान कर रहा है। रुद्राक्ष के दाने जैसे-जैसे छोटे होते हैं वैसे उनकी कीमत बढ़ती जाती है। जो दाना बड़ा होता है उसकी कीमत कम होती है परन्तु एक मुखी एवं गौरीशंकर रुद्राक्ष का बड़े आकार में अधिक महत्व है तथा कलयुग में काला रुद्राक्ष अत्यधिक उपयोगी एवं लाभकारी माना गया है। इसकी पैदावार मुख्यतः इण्डोनेशिया में होती है।

रुद्राक्ष के प्रकार

रुद्राक्ष

रुद्राक्ष में प्राकृतिक मुख होता है जो देखने से पता लग जाता है।

भद्राक्ष

हिमालय या दक्षिण भारत में उपलब्ध होता है। प्राकृतिक मुख नहीं होता, बनाया जाता है।

इन्द्राक्ष

लुप्त हो चुका है इसलिए इन्द्राक्ष का नाम सुनने को नहीं मिलता है और न देखने को।

रुद्राक्ष से लाभ

अगर असली रुद्राक्ष उपयोग में लाया जा रहा है तो यह रक्त चाप, वीर्य दोष, बौद्धिक विकास, मानसिक शान्ति, पारिवारिक एकता, व्यापार में सफलता एवं गुस्से को शान्त करता है। यह ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले लोगों के लिए विशेष उपयोगी होता है। अभक्ष्य-भक्षण और परस्त्री गमन जैसे पाप को भी नष्ट करता है । शिक्षक विद्वान सभी के लिए सम्मान कीर्ति प्रदान करता है। इसमें पांचों तत्वों का समावेश है यह अग्निभय, चोरभय एवं दुर्घटनाओं से भी रक्षा करता है।

रुद्राक्षः यस्य गात्रेषु ललाटे च त्रिपुण्ड्रकम्।
स चाण्डालोऽपि सम्पूज्यः सर्ववर्णोत्तमो भवेत्।।

रुद्राक्ष जिसके शरीर पर हो और ललाट पर त्रिपुण्ड हो, वह चाण्डाल भी हो तो सब वर्णों में उत्तम एवं पूजनीय है। अभक्त हो या भक्त हो, नीच हो या नीच से भी नीच हो, जो रुद्राक्ष को धारण करता है, वह सब पातकों से छूट जाता है।

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रुद्राक्ष एक नजर में

एक मुखी

शक्ति, सत्ता, आत्म विश्वास, ऐश्वर्य प्राप्ति, प्रशासकों, राजाओं के लिए उत्तम

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दो मुखी

वैवाहिक सुख, मानसिक शांति व संतोष

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तीन मुखी

शत्रु विजय

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चार मुखी

शिक्षा, एकाग्रता

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पांच मुखी

ज्ञान, अध्यात्मिक उन्नति व स्वास्थ्य

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छह मुखी

प्रेम, कामशक्ति, आकर्षण

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सात मुखी

शनि शमन

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आठ मुखी

रोग, बाधा शांति

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नौ मुखी

वीरता, साहस, कर्मठता

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दस मुखी

सफलता, उन्नति

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तेरह मुखी

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चौदह मुखी

सत्ता, शक्ति, कीर्ति

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पंद्रह मुखी

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सोलह मुखी

रोग नाश/आग, चोरी, डकैती से सुरक्षा


सत्रह मुखी

भूमि, मकान, वाहन सुख


अठारह मुखी

विपत्ति नाश/गर्भस्थ शिशु की रक्षा


उन्नीस मुखी

सत्यनिष्ठा, न्यायप्रियता के गुण/रक्त व स्नायु तंत्र रोगों में लाभकारी


बीस मुखी

भूत पिशाच से रक्षा


एक्कीस मुखी

आज्ञा चक्र को जाग्रत करने हेतु


गौरीशंकर

वैवाहिक सुख, आकर्षण, प्रसन्नता


गणेश

ऋद्धि, सिद्धि, बुद्धि की प्राप्ति


गौरी गणेश

संतान सुख


रुद्राक्ष कवच

विभिन्न उद्देश्यों के लिए

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