केतु - योगी का हठ योग या अनुयायी की अंधश्रद्धा

By: Acharya Rekha Kalpdev | 01-Mar-2024
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केतु - योगी का हठ योग या अनुयायी की अंधश्रद्धा

ज्योतिष शास्त्रों में केतु को मंगल के समान कहा गया है। केतु रचनात्मक शक्ति, कुछ करने की ऊर्जा, प्रत्येक स्थिति में धन कमाने की क्षमता, सब पर परोपकार, सरल जीवन शैली, मन से सन्यासी, विषयों का गूढ़ ज्ञान, विपत्ति को अवसर में बदलने की क्षमता। सब को माफ करने का गुण, विश्व कल्याण की कामना से जीवन, सबकी सहायता करने की इच्छा, धैर्य और सहनशीलता, योगियों का हठ, सुख साधनों से वंचित जीवन में भी मुस्कान बने रहना, ओजपूर्ण वक्ता, आध्यात्मिक, लोगों को प्रभाव में लेने की योग्यता, मंत्र और योग सिद्धि से युक्त, गहरा अनुभव, सिद्धियों का उपयोग दूसरों के लाभ के लिए, चेहरे पर चमक, छठी इंद्री का सक्रीय होगा, उत्कृष्ट, लेखक, ज्योतिषी, मनोवैज्ञानिक, रेकी हीलर, आधात्मिक गुरु, पीठाधीश्वर जैसे गुणों से युक्त करता है। सर्वकल्याण की भावना से ये अपने जीवन को समर्पित करते है, निस्वार्थ सेवा और पुण्य कार्य करते हुए मोक्ष मार्ग पर अग्रसर। इनके बड़ी संख्या में अनुयायी होते है। जिन्हें आज की भाषा में अनुयायी कहा जाता है।

केतु को इस प्रकार समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए एक उत्तल लेंस को यदि हम सूर्य की तेज किरणों के नीचे रखते है, तो वह ऊर्जा को ग्रहण कर, कई गुना बढ़ा देता है। केतु के लिए ऐसा भी कहा जाता है कि केतु कुंडली की सारी ऊर्जा सोख लेता है। और कुंडली में जहाँ वह बैठा होता है, उस भाव में उस ऊर्जा को संगृहीत कर लेते है।

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वास्तव में अनुभव में यह पाया गया है कि इस संसार में वैदिक ज्योतिष से अधिक वैज्ञानिक और व्यवहारिक विषय अन्य कोई विषय है ही नहीं। यह यदि इस सापेक्ष में अग्नि की बात करते है तो अग्नि कई प्रकार की होती है- एक अग्नि वो है जिसकी एक चिंगारी हजारों मील में फैले जंगल को आग बना देती है, दूसरी आग वह है जो स्वभाव को प्रकट करती है, कठोर और चुभने वाले शब्द केतु है।

सृष्टि के जन्म से ही अग्नि बदलाव का साधन है। आग में जलाकर किसी भी धातु को पिघला कर आकर बदला जा सकता है। सिखने और जानने की ऊर्जा भी अग्नि है, भोजन को पचाने के लिए जठरग्नि भी अग्नि का ही एक रूप है जिसे पित्त कहा जाता है।

काल पुरुष की कुंडली में केतु 8वें भाव की राशि का स्वामी होता है, केतु को मंगल के समान कहा गया है। कालपुरुष की कुंडली में मंगल लग्न भाव और अष्टम भाव दोनों भावों का स्वामी होता है, इस प्रकार केतु भी आठवें भाव का सहस्वामी हुआ। आठवाँ घर बदलाव और जीवन की मृत्यु का घर है। मृत्यु होने पर अग्नि में अंतिम संस्कार कर जीवात्मा अन्य योनि या मोक्ष मार्ग की यात्रा पर निकल जाती है। किसी बर्तन का आकार बदलना हो तो या जीवात्मा की योनि, सब में अग्नि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अग्नि ही सोने को कुंदन बनाती है, अग्नि ही भोजन को पचाती है। केतु ऐसा सैनिक है, जो छुपकर दूसरे देश में अपने देश के लिए जासूसी का काम करता है। सेना की सारी अग्नि ऊर्जा को एक स्थान पर संगृहीत करें, तो वह केतु है। परमाणु बम भी केतु की ऊर्जा का ही एक रूप है।

वैदिक ज्योतिष में कोई ग्रह अच्छा या बुरा नहीं होता है, ग्रह अपनी स्थिति और स्वामित्व के आधार पर शुभ या अशुभ होता है। मंगल सुस्थित हो तो व्यक्ति सच्चा देशभक्त बन सकता है, केतु की अशुभ स्थिति व्यक्ति को आतंकवादी या पागल बनाती है। बॉडीबिल्डर, खिलाड़ी या पुलिस हो सकता है। केतु प्रभाव से व्यक्ति अपने क्षेत्र में चरमपंथी होता है। फिर वह चाहे खेल के मैदान में हो, या बॉर्डर पर, या किसी प्रयोगशाला में हो, सब जगह वह चरम पर होता है।

हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिए, कि केतु का सिर नहीं है, मस्तिष्क रहित होने के कारण वह सोच समझ कर, बुद्धि चातुर्य से काम नहीं लेता है, वह हृदय व् मन से काम लेता है। धर्म गुरु होने पर वह सभी भौतिक सुख छोड़कर वह ईश्वर प्राप्त में लीन होता है। हमने देखा है कि अनुयायी अपने बॉस, मालिक, पिता, धार्मिक गुरु और नेताओं के प्रत्येक शब्द को आदेश मनाकर अनुशरण करते है, इसमें वो अपनी बुद्धि का प्रयोग कर सही गलत का विचार नहीं करते है। ऐसे सभी अनुयायी केतु प्रभावित होते है, केतु स्वयं किसी मठ का पीठधीश्वर भी हो सकता है और स्वयं अनुयायी भी हो सकता है। यह केतु का अद्भुत उदाहरण है। जिसमें केतु गुरु और भक्त दोनों भूमिका निभा रहा है। यह केतु का संक्षिप्त परिचय हुआ।

मंगल और केतु के गुण एक समान कैसे?

मंगल वैदिक ज्योतिष में जोश, ऊर्जा और आवेश के लिए मुख्य रूप से जाना जाता है। मगंल हमारे अंदर का योद्धा है, साहस, शक्ति, जूनून और आक्रामकता है। ग्रहों में चौथा है। यह व्यक्ति की शारीरिक शक्ति और मानसिक शक्ति दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। मन का बल जिसे मनोबल के नाम से जाना जाता है का कारक भी मंगल ही है। मंगल का कर्म क्षेत्र मुख्य रूप से खेल का मैदान या युद्ध का मैदान है, जबकि केतु आध्यात्मिक बल का कारक होकर उसका कर्म क्षेत्र कोई गुफा, निर्जन प्रदेश जहाँ साधना और सिद्धि प्राप्त कि जा सके या गोपनीय स्थान जिसकी जानकारी किसी को न हो। फिर भी दोनों को एक समान इसलिए कहा जाता है क्योंकि दोनों अपनी ऊर्जा का पूर्ण उपयोग करते है, दोनों में अग्नि है और साहस भी अद्भुत है। मंगल खेल, प्रतियोगिता, शारीरिक गतिविधियों से जुड़ा है। सभी एथलेटिक मंगल के स्वामित्व में आते है। केतु इच्छाशक्ति, साहसिक कार्य, आक्रमक, क्रोधी, भूमि और मित्र का प्रतिनिधित्व करता है। केतु भ्रम को तोड़कर ज्ञान चक्षु खोलने वाला ग्रह है। केतु अलगाव, आध्यात्मिकता देता है। नए अनुसन्धान, वैज्ञानिक सोच, अतिसाहसी, सर्जरी, रक्तपात, दुर्घटना आदि देता है।

जन्मपत्री में चंद्र अशुभ प्रभाव में हो तो, व्यक्ति हिंसक होकर स्वयं को या दूसरों को हानि पहुंचाता है। यह स्थिति अवसाद में लेकर भी जाती है। मंगल-केतु की युति हो तो व्यक्ति ऊर्जावान बनाता हो। व्यक्ति में हीमोग्लोबिन की कमी होती है। ऐसा व्यक्ति किसी भी शत्रु को परास्त कर सकता है। किसी के जीवन को दिशा देता है। अशुभ रूप में यह योग हो तो व्यक्ति क़ानून तोड़ने वाला होता है। और शुभ रूप में यह योग हो तो व्यक्ति संत बनता है।

केतु पूर्व जन्म की स्मृतियाँ

केतु को वैदिक ज्योतिष में प्रारब्ध से जुड़ा ग्रह कहा गया है। वह आध्यात्म से जोड़कर को जीव मुक्ति देता है। जीव मुक्ति देने से पहले केतु दुनियादारी, रिश्ते नातों की डोर को कम कर देता है। इसे दुनियादारी का बोझ कम करना भी कहा जा सकता है। केतु जिस भाव में स्थित होता है उस भाव से जुड़े विषयों की इच्छाएं नहीं देता है। उस भाव से जुड़े विषय व्यक्ति पूर्व जन्म में प्राप्त कर चुका होता है। पूर्व जन्म की ऊर्जा, स्मृतियों को लेकर केतु आता है। आर्थिक उन्नति के लिए कर्म इच्छा को कम करता है और आध्यात्मिक उन्नति कि और उन्मुख करता है। ऊर्जा को संगृहीत रखना केतु का स्वभाव है। केतु गुप्त ऊर्जा को प्रकट करता है। रहस्यमयी गुण, आतंरिक उन्नति, अतीत में जीने वाला और भविष्य का दृष्टा होता है। केतु व्यक्ति को हर हाल में प्रसन्न रहना सिखाता है। केतु व्यक्ति में दिव्य चेतना को जागृत करता है। जीवात्मा को ईश्वर से जोड़ता है। कुंडली में जहाँ स्थित हो उस भाव के कर्मों की समाप्ति का संकेत भी देता है। प्रारब्ध से हम क्या लेकर आये है, और इस जन्म में हम कौन से जीवन लक्ष्य लेकर आये है। केतु जिस भाव में स्थित है, उस भाव से जुड़ा ऋण बाकि रहने का संकेत देता है, उस ऋण को इस जन्म में चुकता करने का समय होता है। केतु व्यक्ति को कार्यों में निपुणता देता है। अपने क्षेत्र में केतु व्यक्ति को सर्वोच्च निपुणता देता है। कौशल, कला या आध्यात्मिक कुशलता देता है। केतु मुक्ति देता है, धार्मिक पंडितों के द्वारा पूजनीय होता है।

Kundli में केतु सूर्य के साथ हो या उसकी राशि में हों, तो व्यक्ति को पूर्व जन्म के रिश्ते कई बार याद रहते है। इस जन्म के रिश्तों में वह पूर्व जन्म के रिश्ते बता देता है। केतु धार्मिक विचारधारा को संकीर्ण बनता है, केतु अनुयायी देता है, जो बस फॉलो करते है, दिमाग नहीं लगाते है।

राहु यह बताता है कि इस जन्म में जीव को कौन सी इच्छाओं के लिए भागना है। राहु व्यक्ति को स्वतंत्र बनाता है, तो केतु व्यक्ति को नियम और कानूनों में बांधता है। योग और सिद्धि दोनों में नियमों का विशेष महत्त्व है। केतु व्यक्ति को आध्यात्मिक दुनिया का सर्वोच्च पद देता है। जातक को अन्तरदृष्टि क्षमता देता है, इससे हटकर चंद्र मन को दुनियावी बातों में उलझाएं रखता है। केतु इस भौतिक संसार से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। वस्तुओं के सार को भेदने वाला मन, केतु प्रभावित मन बहुत जिज्ञासु हो जाता है और उसके ध्यान क्षेत्र में आने वाली हर चीज़ को गहराई से समझना चाहता है, मनोविज्ञान में रुचि, मजबूत अंतर्ज्ञान, भावनात्मक अभिव्यक्ति जिसमें उत्तेजना, व् कठोरता हो सकती है। दूसरी ओर भावनाओं पर नियंत्रण दे सकता है, आत्मचिंतन और आलोचना दोनों गहराई से करने की योग्यता, पूर्व जन्म की याद, अतीत की याद, इससे भावनात्मक असंतुलन पैदा हो सकता है।

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केतु प्रभावित लोग दूसरों को अवसाद से बाहर लाने में सक्षम होते है, लेकिन इन लोगों को दूसरा कोई अवसाद से बाहर नहीं निकल सकता। केतु अंतर्मन को शुद्ध और निर्मल करने का काम करता है, जबकि चंद्र को छोड़कर अन्य ग्रह बाहरी व्यक्तित्व को अधिक प्रभावित करते है। केतु योग, साधना से शरीर और चेतना दोनों को बदल देता है। दुनिया को शुद्ध करने का काम केतु करता है। आध्यात्मिक उन्नति के द्वारा व्यक्ति की चेतना को शुद्ध करता है। आध्यात्मिक उन्नति के सामने दुनियादारी को व्यर्थ समझता है। केतु प्रभावित व्यक्ति रिश्तों, मोह और माया से परे होता है। सब कुछ छोड़कर वह केवल आध्यात्म की और ध्यान देता है। केतु सांसारिक दुनिया से मोहभंग कराता है। गुरु ग्रह इसके विपरीत धर्म और रिश्तों में संतुलन बनाकर बैठता है। केतु एक छाया ग्रह है और अग्नि तत्व है। केतु मंगल की भांति क्रूर ग्रह है, अग्नि तत्व ग्रह है राहु-केतु दोनों ग्रहों को किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं दिया गया है।

राहु जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव के कारकतत्वों का अधिग्रहण कर लेता है, इसके विपरीत केतु उस भाव की शक्ति, ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है। नवग्रहों में केतु एक दिव्य, अद्वितीय ग्रह है, कई गोपनीय रहस्यों से जुड़ा हुआ है। वैराग्य, आध्यात्मिकता, मुक्ति, रहस्यमयी अनुभव, पूर्व जन्म, कर्म प्रभाव को दर्शाता है। यह व्यक्ति में छुपी हुई साधना, ध्यान और योग की शक्ति को भी स्पष्ट करता है। गूढ़ ज्ञान और आध्यात्मिक रहस्यों का उद्घाटन करता है। केतु मोह के धागों को तोड़ता है और व्यक्ति को निर्मोही बनाता है। केतु व्यक्ति को अहंकाररहित बनाता है। केतु व्यक्ति को गैरपरंपरागत ज्ञान देता है, सामजिक मानदंडों से अलग करता है। केतु निर्मल और उच्च चेतना की और लेकर जाता है।

एक ज्योतिषीय उक्ति के अनुसार कुजा वत केतु, जिसके अनुसार केतु का प्रभाव मंगल के जैसा कहा गया है, जबकि मंगल और केतु कई विषयों में एक दूसरे से अलग है। दोनों अग्नितत्व है और ऊर्जा के कारक है। केतु व्यक्ति को वैराग्य, मुक्ति और अतीत से जोड़ता है। केतु के अन्य कारकतत्व इस प्रकार है -

केतु आध्यात्मिक जागृति और आत्मज्ञान के द्वार खोलता है। इस संसार के बंधनों से मुक्त कराता है। आत्मिक विकास और आत्मिक चेतना की खोज में जीवात्मा की खोज निकलती है। वैराग्य और त्याग की भावना भी केतु ही देता है। इच्छाओं का दमन कर ईश्वर प्राप्ति के कामना जागृत करता है। आसक्तियों का त्याग कर, अनासक्तियों कि तलाश में जीवात्मा निकलती है। अंतर्ज्ञान और मन की क्षमताओं, छुपे हुए ज्ञान कि खोज में व्यक्ति निकलता है। आत्मिक चेतना को मन की गहराइयों में ले जाने का कार्य केतु करता है।

केतु अन्तर्मन के गहरे समुद्र में गोते लगाकर मुक्ति रूपी रत्न निकल कर लाता है। यह चेतना को सर्वोच्च स्थान पर लेकर आता है। रहस्यवाद की व्याख्या केतु करता है। केतु गूढ़ विज्ञानं की जानकारी देता है। केतु का सबसे बड़ा गुण प्रारब्ध के कर्म पैटर्न को हल करने की योग्यता जातक को देता है। केतु कष्ट देने के बाद जीवन की एक नई शुरुआत देता है। विघटन और परिवर्तन केतु का मुख्य गुण है। सांसारिक रिश्तों से आघात देकर, जीवन को एक नई दिशा केतु देता है, जिसे हम लाइफ का टर्निंग पॉइंट कहा जाता है। समाज, परिवार के बंधनों को तोड़कर, ईश्वर से मिलन का मार्ग खोलता है।


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