कान्हा धाम तीर्थ यात्रा

By: Future Point | 20-Feb-2018
Views : 10382
कान्हा धाम तीर्थ यात्रा

29 मार्च 2018 से लेकर 1 अप्रैल 2018 तक चार दिन की छुट्टियां आ रही है। इन छुट्टियों का पूरा लुत्फ उठाने के लिए आप किसी धार्मिक यात्रा पर जा सकते हैं। लगातार घर और आफिस में काम करते करते नीरसता आ जाती है। ऐसे में छुट्टियां सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं, इससे शरीर और मन दोनों को आराम मिलता है, एक नई स्फूर्ति, नवचेतना, ऊर्जा और मानसिक शांति मिलती है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में अवकाश चाहिए होता है, यही वजह है कि जब भी मौका मिलता है। हम सभी छुट्टियों का जीभर कर आनंद लेने से नहीं चूकते हैं। अगर आप इन छुट्टियों में कुछ नया करना चाहते हैं तो इस बार कान्हा के विभिन्न धामों की सैर जरुर करें। कान्हा धाम मथुरा, गोवधर्न, बरसाना, बरसाना, गोपीनाथ, गोकुल धाम और मंदिरों में जुगलकिशोर, राधा बल्लभ और मदनमोहन मन्दिर।



इनके अलावा जानकी वल्लभ मन्दिर, श्री गोविन्द जी का मन्दिर, रंग जी का मन्दिर, कांच का मन्दिर, गोदा मन्दिर, राधा गोविन्द मन्दिर, राधा – श्याम मन्दिर, गोपेश्वर मन्दिर, युगल किशोर मन्दिर, मदन मोहन मन्दिर, मानस मन्दिर, अक्रूर मन्दिर, मीराबाई मन्दिर, रसिक बिहारी मन्दिर, गोरे दाउजी का मन्दिर, अष्ट सखी मन्दिर आदि दर्शनीय मन्दिर हैं। मथुरा में इतने सारे मंदिर और धर्मस्थल है, जिन्हें एक साथ देखने का आनंद ही कुछ ओर है। सैलानी मथुरा तक बस, ट्रेन और हवाई जहाज से आराम से पहुंच सकते हैं। यहां आराम से घूमा जा सकता है। तो आइये जानते हैं कान्हा धाम, मथुरा में घूमने की जगहें-

मथुरा भगवान कृष्ण की जन्मस्थली हजारों वर्षों से हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थ धाम रहा है। मार्च माह में एक साथ आने वाली चार छुट्टियों में कृष्ण की नगरी, वृन्दावन की सैर पर चलिए. यहां का माहौल सारे वर्ष कृष्ण भक्ति में लीन रहता है और इस समय होली के अवसर पर यहाँ नज़ारा ही अलग होता है। वृन्दावन में कई ऐसे आकर्षक केंद्र हैं जो भारत ही नहीं दुनिया भर में रहने वाले कृष्ण भक्तों को हर साल अपनी ओर खींचते हैं। 1 मार्च की होली है और 2 मार्च का रंग है।

मथुरा में बसंत पंचमी से ही ब्रजक्षेत्र में होली का वातावरण बन जाता है। होली से आठ दिन पूर्व यानि होलाष्टक प्रारम्भ होते ही पूरा बृज क्षेत्र होली के रंग में पूर्ण रूप से रंग जाता है। नन्द गाँव कि होली, मथुरा की होली, वृंदावन की होली, बरसाना की लठमार होली आदि अलग-अलग दिवसों पर अलग-अलग स्थानों पर होली का आयोजन बड़े धूम-धाम से किया जाता है। बरसाना की लठमार होली विश्वभर में अपने अलग स्वरुप के कारण प्रसिद्ध है। यहां की होली का आनंद लेने के लिए न केवल बल्कि विदेश से भी लाखों की संख्या में लोग यहां आते हैं और यहां की अनोखी होली के आयोजन का हिस्सा बनते हैं।

यात्रा से पूर्व ध्यान देने योग्य बातें -

  • श्रीकृष्ण जन्मभूमि में कैमरा, मोबाइल व अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान ले जाना प्रतिबंधित है।
  • प्रयास करें कि यहां के मंदिरों में दर्शनों के लिए 4 बजे से पहले जाया जाए।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि

जब आप भगवान् कान्हा की जन्मभूमि मथुरा में घूमने के लिए आते हैं तो सबसे पहले श्रीकृष्ण जन्मभूमि में आयें। यहां छोटे-बड़े अनेक दर्शनीय धार्मिक स्थल है, जो अपने में विरासत समेटें हुए है। यहां पग-पग पर अनेक सुंदर सुंदर मंदिर हैं। जिनका ऎतिहासिक और पौराणिक महत्व रहा है। यहां रहने के लिए मंदिरों के आसपास अनेक आश्रम, मठ और धर्मशालाएं हैं। 4 दिन के सीमित समय में सभी स्थलों की यात्रा कर पाना सम्भव ही नहीं है इसलिए इस समय मुख्य व प्रसिद्ध स्थलों के दर्शन का ही कार्यक्रम बनाएं।

मथुरा के बाद अब वृंदावन के रमणीय स्थल की और प्रस्थान किया। सिर्फ मथुरा में ही जब आप मथुरा से वृंदावन की ओर मूव करते है तो आपको पागल बाबा का मंदिर, बाँकेबिहारी मंदिर, श्री गरुड् गोविन्द मन्दिर, शांतिकुंज, बिडला मंदिर, राधावल्लभ मंदिर और राधावल्लभ मंदिर हैं। इतने सारे मंदिरों के एक साथ दर्शन करना संभव नहीं है। फिर भी पूर्व नियोजन से आप इसे सरलता से कर सकते हैं।

Shrikrishna Janmabhumi

 

भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा हजारों वर्षों से हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थ रहा है। इस स्थान पर कभी भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था, वहां आज एक भव्य मन्दिर है। गोकुल में देखने योग्य जगहों में ठकुरानी घाट, नवनीतप्रिया जी का मंदिर, रमण रेती, 84 खम्बे, बलदेव, बह्मांड घाट, महावन, चिंताहरण महादेव महावन हैं। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शनों के लिए आते हैं। यहां के मंदिरों को बहुत आकर्षक ढंग से सजाया जाता है और मंदिर के परिसर मे भगवान कृष्ण की रास लीला है। गोकुल, जहां भगवान कृष्ण का बचपन बीता था, यहाँ से कुछ ही दूरी पर है। यह वही स्थान है जहां कृष्ण चुरा-चुरा कर माखन खाया करते थे और माता यशोदा उनके पीछे-पीछे दौड़ा करती थीं।

वृंदावन धाम

वृंदावन का कण-कण भगवान कृष्ण की लीलाओं से ओत-प्रोत है इसी कारण वृंदावन को बृजक्षेत्र का हृदय भी कहा जाता है। वृंदावन पहुँचने के बाद भी अभी मंदिरों के खुलने में बहुत समय शेष था। समय का सदुपयोग करने के लिए आप वृंदावन के निधिवन में घूम कर स्वयं को कान्हा-राधा के प्रेम संबंधों को महसूस कर सकते हैं। वृदांवन में ही कृष्ण गोपियों के साथ रास रचाया करते थे। वे कभी माखन से भरी उनकी मटकियों को फोड़ देते, तो कभी नहाती हुई गोपियों के कपड़े चुरा कर पेड़ पर चढ़ जाते। यहां भगवान कृष्ण का एक भव्य मन्दिर है।

पुरातत्व की दृष्टि से भी इस मन्दिर की गणना विश्व के प्रसिद्ध मन्दिरों में की जाती है। इसके अतिरिक्त भी यहां देखने योग्य बहुत से दूसरे मन्दिर हैं जिनमें प्रमुख हैं- गोपीनाथ, जुगलकिशोर, राधा बल्लभ और मदनमोहन मन्दिर। वृदावन प्रेम की धरती है। भगवान श्रीकृष्ण और राधा, श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रेम ने इस धरती को सींचा है। कृष्ण यहां बंसी की मधुर तान छेड़ते थे और गोपियां उसकी आवाज पर खिंची आती थीं। आज भी सच्चे प्रेमी को वह आवाज सुनाई पड़ती है। भारतीय ही नहीं कई विदेशी युवक-युवतियां प्रेमरस में डूबकर आज भी कृष्ण की यहां के गली-कूचों, खेत-खलिहानों, कुंज लताओं और यमुना तट पर खोजते फिरते हैं।

वृंदावन धाम को लेकर एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध हैं। कथा के अनुसार- वृन्दा देवी ने भगवान श्रीहरि विष्णु की तपस्या की और यह वरदान मांगा कि उसका पति अमर रहे। कोई भी उसे न मार सके। वृन्दा का पति जलन्धर नामक एक राक्षस था। भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि जब तक तुम पतिव्रता धर्म का पालन करती रहोगी तुम्हारे पति को कोई नहीं मार सकेगा। जलन्धर ने अमर होते ही देवताओं से युद्ध शुरू कर दिया और देवताओं को पराजित कर डाला। स्वयं भगवान विष्णु भी हार गए। छलपूर्वक विष्णु ने जलंधर का रूप धारण कर वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग कर दिया।

मौका देखते ही भगवान शिव ने जलंधर का वध कर दिया। असलियत जानते ही वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप देकर सालिग्राम बना दिया। सारे भगवान परेशान हो उठे। अतः सभी देवताओं के अनुनय-विनय के बाद वृंदा ने विष्णु को श्रापमुक्त कर दिया। भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया किं तुम्हारा अगला जन्म तुलसी का होगा और लोग तुम्हारी पूजा करेंगे। ऐसा विश्वास है कि इसी वृंदा देवी के नाम पर बाद में इसका नाम वृन्दावन पड़ गया। एक दूसरा मत यह है कि राधा के सोलह नामों में से एक नाम बृंदा भी था। यह वृंदा (राधा) श्रीकृष्ण से मिलने यहाँ आया करती थी। शायद इसी कारण से इस स्थान का नाम वृन्दावन पड़ा हो।

गोवधर्न पर्वत

मथुरा से 20 से 26 किलोमीटर की दूरी पर चलने पर गोवधर्न पर्वत आता है। गोवर्धन धाम में आपको जतीपुरा, बरसाना, नंदगाँव, कामवन और लोहवन आता है। गोवर्धन पर्वत को लेकर गोवर्धनवासियों और इंद्र देव से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध हैं। कहानी इस प्रकार हैं - जब स्थानीय लोग कृष्ण को अपने आराध्य देव के रूप में मानने लगे तो इन्द्र के क्रोध की कोई सीमा न रही। उसने लोगों को सबक सिखाने के लिए मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। जब वर्षा कई दिनों के बाद भी नहीं रुकी तो स्थानीय लोग घबरा गए और कृष्ण की शरण में गए। कृष्ण ने उन्हें बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया। आखिरकार इन्द्र को हार माननी पड़ी।

Gobardhan Parbat

 

मथुरा के दर्शनीय स्थलों में चार दिन बिताकर आप को ऐसा लगेगा कि आप ईश्वर की गोद में समय बिताकर आए हैं। यहां के शांत एवं मनमोहन वातावरण से मेरे अंदर एक स्फूर्ति आ गई। मार्च में मौसम ना अधिक गर्म रहता है और ना अधिक सर्द। तापमान भी सामान्य रहता है ऐसे मे भ्रमण करना बहुत रोमांचक रहेगा। शांत एवं मनमोहन वातावरण से आप अपने अंदर एक स्फूर्ति का अनुभव करेंगे।

यहां के अनेकों मंदिर और वहां का वातावरण आपका मन को मोह लेंगे। भव्य, आकर्षक और ऎतिहासिक मधुरा नगरी की कान्हा धाम यात्रा आपको सकून तो देगी ही साथ ही यहां से जाते समय आप यहां एक बार फिर आने का मन जरुर मना लेंगे। यकीन मानिए यह आपके जीवन की सबसे यादगार यात्राओं में से एक रहेगी, जिसमें आपको कान्या के अनेक रुपों से जुड़ने का अवसर मिलेगा।


Previous
Astrological Prediction of Earthquakes and Weather 2018

Next
Colour therapy from the perspective of an astrologer