होलाष्टक क्या है? होली से पहले के ये 8 दिन क्यों माने जाते हैं अशुभ?

By: Future Point | 27-Feb-2020
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होलाष्टक क्या है? होली से पहले के ये 8 दिन क्यों माने जाते हैं अशुभ?

होली (Holi 2020) का नाम सुनते ही सबके रंग बिरंगे चेहरे याद आ जाते हैं। गुझिया और अन्य मीठे पकवानों से मुंह मिठास से भर जाता है। हमारे जीवन में यह खुशियों का दिन होता है। एक दूसरे को गुलाल लगाकर हम एक दूसरे के रंग में रंग जाते हैं। एक दूसरे का मुंह मीठा करके हम रिश्तों में आई कड़वाहट को दूर करते हैं। होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है जो कि बेहद शुभ दिन माना गया है। मान्यता है कि इस दिन आग की परिक्रमा कर जो भी इच्छा मांगी जाती है वह ज़रूर पूरी होती है। लेकिन इससे पहले के आठ दिन बेहद अशुभ माने जाते हैं। इन आठ दिनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं किए जाते। आइए, ज्योतिष के माध्यम से समझते हैं कि होलाष्टक क्या है? ये अशुभ दिन क्यों होते हैं? इस दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

होलाष्टक क्या है?

होलाष्टक शब्द होली और अष्टक से निकला है जिसका अर्थ होली के आठ दिन पहले से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होली से पहले आठ दिन कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित है। यदि इस दौरान कोई भी शुभ कार्य किया जाए तो उसके अशुभ फल मिलते हैं। बन रही बात भी बिगड़ सकती है। धर्मशास्त्रों में 16 संस्कार दिए गए हैं- गर्भधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन/चूडाकर्म, विद्यारंभ, कर्णभेद, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह और अन्त्येष्टि/श्राद्ध। इनमें से किसी भी संस्कार को इस दिन संपन्न नहीं करना चाहिए। यदि होलाष्टक के अशुभ दिनों में इन्हें किया जाता है तो व्यक्ति को बेहद कष्ट उठाना पड़ता है।

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होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से शुरु होकर होलिका दहन तक रहता है। इस बार होलाष्टक मंगलवार, 3 मार्च से लेकर सोमवार, 9 मार्च तक रहेगा। इससे जुड़ी तिथियां और मुहूर्त निम्न हैं:

सूर्योदय- प्रात: 6:50 (मंगलवार, मार्च 3, 2020)
सूर्यास्त- सायं 6:27 बजे (मंगलवार, मार्च 3, 2020)
अष्टमी तिथि प्रारंभ- अपराह्न 12:52 बजे (सोमवार, मार्च 2, 2020)
अष्टमी तिथि समाप्त- अपराह्न 1:50 बजे (मंगलवार, मार्च 3, 2020)

ध्यान रहे, अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है इसलिए विभिन्न शहरों और राज्यों के लिए अष्टमी और होलाष्टक के समय में भी थोड़ा अंतर हो सकता है।

क्यों नहीं किए जाते शुभ कार्य?

धार्मिक ग्रंथों में होलाष्टक से संबंधित कई कथाएं मिलती हैं। एक कथा भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद से जुड़ी है। मान्यता है कि भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप नास्तिक थे इसलिए उसे अपने पुत्र की भक्ति रास नहीं आती थी। अपने पुत्र को सज़ा देने के लिए उसने होली से आठ दिन पहले उसे कारागार में बंद कर दिया। इस तरह प्रह्लाद को मारने की योजना होली से आठ दिन पहले ही शुरु हो गई थी। इसके लिए भक्त प्रह्लाद को इन आठ दिनों में कई तरह की यातनाएं दी गईं। होली से एक दिन पहले उसे ज़िंदा जलाने का भी प्रयास किया गया। लेकिन भगवान अपने भक्त की रक्षा करते रहे। क्योंकि प्रह्लाद को आठ दिन तक कई तरह के कष्ट दिए गए थे इसलिए ये आठ दिन अशुभ माने जाते हैं। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने होलाष्टक के दिन ही कामदेव को भस्म किया था इसलिए इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने से व्यक्ति को उसका उचित फल नहीं मिलता। उसे अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं।

इसके अलावा होलाष्टक के दिन कोई भी शुभ कार्य न करने की ज्योतिषीय वजह भी है। होलाष्टक अष्टमी के दिन से आरंभ होता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार अष्टमी और उसके बाद के आठ दिन नकारात्मक ऊर्जा काफ़ी हावी होती है। इस दौरान अलग-अलग ग्रह अपने उग्र रूप में होते हैं। अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तो पूर्णिमा तिथि को राहु बेहद उग्र होते हैं। इनसे निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा के कारण जातक का मन अस्थिर रहता है। वह ठीक तरह से सोच नहीं पाता और सही निर्णय नहीं ले पाता। इसलिए इस दौरान जातक को कोई भी शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है।

होलाष्टक से जुड़ी परंपराएं

हालांकि होलाष्टक में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता लेकिन इससे जुड़ी कई महत्वपूर्ण परंपराएं और अनुष्ठान हैं:

  • लोग पेड़ों को रंगीन रंगीन कपड़ों से सजाते हैं। पेड़ की टहनियों पर रंगीन कपड़ों के टुकड़े और धागे बांधे जाते हैं। आठवें दिन यानी होलिका दहन वाले दिन इन्हें मिट्टी में दबा दिया जाता है। कुछ लोग इन कपड़ों को होलिका दहन के दौरान आग में भी जलाते हैं। मान्यता है कि पेड़ पर बांधे गए ये कपड़े और धागे नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेते हैं और इस तरह हमें उसके दुष्प्रभाव से बचाते हैं।
  • होलाष्टिक शुरु होते ही होलिका दहन की तैयारी भी शुरु हो जाती है। सबसे पहले होलिका दहन की जगह चुन ली जाती है और उसके बाद हर दिन छोटी-छोटी लकड़ियां इकट्ठी की जाती हैं। होलिका दहन वाले दिन इन लकड़ियों को आग में भस्म कर दिया जाता है।
  • गाय के सूखे उपले, सूखी लकड़ियां औऱ घास इकट्ठी की जाती हैं। घर में एक होली स्टिक यानी लकड़ी रखी जाती है।
  • होलाष्टक के दौरान सामाजिक सेवा के कार्य और दान करने का महत्व है। मान्यता है कि इन दिनों गरीब और असहाय लोगों को अन्न, धन, वस्त्रादि दान करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
  • होलाष्टक शुरु होने पर लोग अपने घर को गंगाजल से धोते हैं और उसे अच्छी तरह साफ़ करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।

होलाष्टक में क्या न करें?

  • हिंदू धर्मग्रंथों में 16 प्रकार के संस्कार बताए गए हैं। इन में से किसी भी संस्कार का पालन इन दिनों नहीं करना चाहिए। हालांकि दुर्भाग्यवश किसी की मृत्यु हो जाए तो अंत्येष्टि संस्कार के बाद शांति पूजन ज़रूर करवाएं।
  • नवविवाहिताओं को इस दौरान मायके में रहने की सलाह दी जाती है।
  • इस दौरान गृह प्रवेश या भूमि पूजन नहीं करना चाहिए।
  • गर्भवती महिलाएं इस दौरान नदी पार करके यात्रा न करें। इससे गर्भ में पल रहे शिशु को नुकसान पहुंच सकता है।
  • होलाष्टक में विवाह नहीं करना चाहिए क्योंकि इस दौरान विवाह का कोई मुहूर्त नहीं होता। इस दौरान सगाई भी नहीं की जा सकती है। यदि विवाह कर लिया जाए तो उसके बाद वैवाहिक जीवन में बहुत दिक्कतें आती हैं।

होलाष्टक में क्या करें?

हालांकि होलाष्टक में कोई भी शुभ कार्य करने पर रोक होती है लेकिन इस दौरान अपने देवी-देवता की पूजा करना अनिवार्य होता है। इस दौरान व्रत करने और अपने आराध्य देव की पूजा और दान करने से लाभ होगा। इस दौरान वे सभी कार्य करने चाहिए जिनसे नकारात्मक शक्तियों का नाश हो। होलाष्टक में कैसे नकारात्मक शक्ति के असर को बेअसर कर सकते हैं? जानने के लिए हमारे विशेषज्ञ ज्योतिषियों से परामर्श लें।



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