Solar Eclipse 2024: सूर्य ग्रहण क्या है? वर्ष 2024 का पहला सूर्य ग्रहण कब है?

By: Acharya Rekha Kalpdev | 20-Mar-2024
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Solar Eclipse 2024: सूर्य ग्रहण क्या है? वर्ष 2024 का पहला सूर्य ग्रहण कब है?

Solar Eclipse 2024: ग्रहण को इस प्रकार समझा जा सकता है - पृथ्वी अपनी धूरी में घूमने हुए सूर्य की परिक्रमा करती है, एवं चंद्र अपनी कक्षा में घूमने हुए पृथ्वी के चारों और चक्कर लगता है। एक निश्चित समय पर सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक सीढ़ी लाइन में आ जाते है जिससे एक का प्रकाश दूसरे तक नहीं पहुँच पाता है। इसी खगोलीय घटना को ग्रहण के नाम से जाना जाता है।

ग्रहण के दो प्रकार है - सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण। भ्रमण के दौरन जब सूर्य और चंद्र के मध्य पृथ्वी आ जाती है, तब चंद्र ग्रहण होता है। चंद्र ग्रहण में सूर्य का प्रकाश बाधित होकर पृथ्वी तक नहीं आ पाता है। चंद्र ग्रह का अपना कोई प्रकाश नहीं है, वह प्रकाश के लिए सूर्य पर आश्रित है। सूर्य का प्रकाश बाधित होने से चन्द्रमा का प्रकाश भी बाधित हो जाता है और चंद्र ग्रहण काल में अपना कुछ अंश और कभी कभी सारा प्रकाश खो देता है।

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चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दिन ही होता है। इसके विपरीत जब चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य आ जाता है तो वह घटना सूर्य ग्रहण कहलाती है। सूर्य ग्रहण अमावस्या तिथि पर ही होता है। सूर्य ग्रहण काल में चंद्र सूर्य प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकता है, उस पर छाया डालने का कार्य करता है। एक व्रत में अधिक से अधिक ३ चंद्र ग्रहण ही हो सकते है। एक वर्ष में 6 ग्रहण सामान्यता देखे जा सकते है।

वर्ष 2024 में 8-9 अप्रैल 2024, चैत्र अमावस्या, सोमवार-मंगलवार के दिन पूर्ण सूर्य ग्रहण की घटना फिर के बार देखी जा सकती है। इस दिन पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा। पूर्ण सूर्य ग्रहण काल 22:09 से शुरू होकर 25:25 तक जाएगा। ग्रहण की कुल अवधि 03 घंटे 16 मिनट की रहेगी। ग्रहण का मध्य काल 23:47 समय की रहेगी।

8-9 अप्रैल,2024 का सूर्य ग्रहण किस किस देश में दृश्य रहेगा?

पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका, उत्तरी दक्षिण अमेरिका, प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर, उत्तरी ध्रुव में दृश्य रहेगा। इस ग्रहण को भारत में नहीं देखा जा सकेगा, इस कारण यह ग्रहण भारत में अदृश्य रहेगा। भारत में अदृश्य होने के कारण इस ग्रहण के सूतक काल के नियम भारत में नहीं रहेंगे।

सूर्य ग्रहण के प्रकार:

पूर्ण सूर्य ग्रहण - इस घटना के समय सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाने के कारण पृथ्वी के एक हिस्स्से पर अंधकार छा जाता है। इस घटना में चंद्र सूर्य को ढक लेता है, तो सूर्य के बाहरी किनारे ही दिखाई देते है। शेष में अंधकार दिखाई देता है। इसी घटना को सूर्य ग्रहण के नाम से जाना जाता है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण - वलयाकार सूर्य ग्रहण के समय में चंद्र पृथ्वी से दूर होता है। यह आकार में छोटा दिखाई देता है। जिसके कारण यह सूर्य को पूरा ढक नहीं पाता है। परिणाम यह होता है कि चन्द्रमा एक बड़े प्रकाश गोले पर एक छोटे काले गोले के रूप में दिखाई देता है। जो चंद्र के चारों और एक प्रकाशित छल्ले के रूप में दिखाई देता है।

आंशिक सूर्य ग्रहण - आंशिक सूर्य ग्रहण कि स्थिति उस समय होती है जब सूर्य और पृथ्वी के मध्य चंद्र आ जाता है। लेकिन इस घटना में सूर्य, पृथ्वी और चंद्र तीनों एक सीधी रेखा में नहीं होने के कारण, सूर्य का केवल एक भाग ही ढक्का हुआ दिखाई देता है। जिससे सूर्य आधे चंद्र का जैसा दिखाई देता है। पूरे या वलयाकार ग्रहण के दौरान चंद्र कि छाया के बाहर लोगों को सूर्य ग्रहण दृष्ट होता है।

मिश्रित सूर्य ग्रहण - पृथ्वी के अपनी धूरी पर झुके होने के कारण, कभी कभी ग्रहण के चरण, वलयाकार और पूर्ण ग्रहण के मध्य परिवर्तित हो जाता है। इस घटना में चंद्र की छाया संसार भर में दिखाई देती है। यही मिश्रित सूर्य ग्रहण कहलाता है।

आइये अब चंद्र ग्रहण को समझते है -

चंद्र ग्रहण कैसे होता है? यह हमने ऊपर जाना। एक व्रत में अधिक से अधिक ३ चंद्र ग्रहण ही देखे जा सकते है।

ग्रहण का धार्मिक महत्व

वेद शास्त्र और धार्मिक ग्रंथों में ग्रहण का वर्णन मिलता है। वैदिक काल से ही हमारे ऋषि मुनि ग्रहण की गणना करने में समर्थ रहे है। ग्रहण के विषय में दस हजार सालों के बाद नासा जो जानकारी देता है, वह ज्ञान, वह गणना हमारे ऋषि मुनियों ने अपनी योग, ध्यान, साधना से वैदिक काल में ही कर ली थी।

वैदिक काल और पौराणिक काल में ग्रहण काल को राज्य और राजसत्ता के पक्ष से अशुभ समय माना जाता था। सूर्य ग्रहण से राज्य और सत्ता को लेकर शकुन अपशकुन के फलादेश किये जाते थे। जैसा की सर्वविदित है की ग्रहों में सूर्य राजा का स्थान रखता है। इसलिए ग्रहण में सूर्य का अंधकारमय होना, सत्ता खोने जैसे घटना का संकेत पौराणिक काल में समझा जाता था।

सूर्य ग्रहण से जुडी कथाएं?

एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब सूर्य को राहु ने ग्रसित कर लिया तो सारी पृथ्वी पर अंधकार छा गया। सृष्टि पर अंधकार देख कर सारे प्राणी घबरा गए। घबराएं हुए प्राणियों को देखकर ऋषि अत्रि ने अपनी सिद्धियों से सूर्य को राहु के बंधन से मुक्त किया। और सूर्य को फिर से प्रकाशित किया। इस कथा के मध्य में यह भी आता है कि देवराज इंद्र ने अत्रि ऋषि के सहयोग से राहु के प्रभाव से सूर्य को मुक्त कराया था।

पांडवों से जुडी कथा

महाभारत काल द्वापर युग कि कथा के अनुसार जिस समय पांडव कौरवों के साथ जुए में अपना सब कुछ हार गए थे, वह दिन सूर्य ग्रहण का दिन था। वैदिक ज्योतिष में सूर्य नवग्रहों में राजा का स्थान रखता है, इसलिए राजा पर ग्रहण लगना सत्ता जाने का संकेत समझा जाता है। जिस भी वर्ष एक वर्ष में तीन से अधिक दृश्य सूर्य ग्रहण होते है, उस देश में उस वर्ष में सत्ता परिवर्तन कि संभावनाएं बनती है।एक अन्य कथा के अनुसार जिस दिन अर्जुन ने जयद्रथ को मारकर अपने पुत्र अभिमन्यु कि मृत्यु का बदला लिया था, वह दिन सूर्य ग्रहण का दिन था। इसके अलावा जिस दिन भगवान् कृष्ण कि नगरी समुद्र में समाई थी, उस दिन भी सूर्य ग्रहण ही था। इसलिए सूर्य ग्रहण सत्ता पक्ष के लिए अतिशुभ माना जाता है।

सूर्य ग्रहण का आध्यात्मिक महत्त्व

सूर्य ग्रहण काल में सूर्य मन्त्रों का जाप करना अतिशुभ माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को पिता, आत्मा, आत्मशक्ति, आत्मबल, आत्मविश्वास, और रोगों से लड़ने कि शक्ति के कारक ग्रह है। सूर्य ग्रहण के समय में सूर्य मंत्र का जाप करने से सूर्य की कारक वस्तुओं में वृद्धि होती है। ग्रहण काल को हमेशा से आतंरिक शक्तियों को बल देने का समय कहा गया है। आंतरिक शक्तियों को मजबूत करने के लिए भी इस अवधि को अतिशुभ माना जाता है। ग्रहण काल मन्त्र सिद्ध के लिए सबसे उपयुक्त समझा जाता है। किसी भी मन्त्र को सिद्ध करने के लिए ग्रहण काल सबसे उपयुक्त समय होता है।

ग्रहण शब्द का शाब्दिक अर्थ स्वीकार कारण, आत्मसात करना, चेतना को प्रकाशित करने के लिए। अंतर्चेतना को जागृत करने के लिए ग्रहण काल श्रेष्ठ कहा गया है। मोह, माया, लोभ और ईर्ष्या जैसे दोषों को दूर करने के लिए ग्रहण काल सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। सूर्य ग्रहण हो या चंद्र ग्रहण, कोई ग्रहण काल हो, इस समय में सूतक लगने के कारण ध्यान, मनन और चिंतन जैसे कार्य आसानी से किये जा सकते है।

सूर्य ग्रह और सत्ता फलादेश

सूर्य ग्रहण को लेकर ज्योतिषीय ग्रंथों में यह वर्णन मिलता है कि सूर्य ग्रहण यदि मंगलवार, शनिवार के दिन होता है तो उसका परिणाम सत्ता पक्ष के लिए प्रतिकूल फल देने वाला होता है।

सूर्य ग्रहण काल में ध्यान देने योग्य बातें -

सूर्य ग्रहण कभी भी नग्न आँखों से नहीं देखना चाहिए। ग्रहण के समय विकरणों से बचने के लिए चश्में का प्रयोग करना चाहिए। सूर्य ग्रहण लेंस से ही देखना चाहिए। बिना लेंस के कभी भी ग्रहण नहीं देखना चाहिए।

सूर्य ग्रहण को लेकर मान्यताएं

सूर्य ग्रहण गर्भवती स्त्रियों को नहीं देखना चाहिए। सूर्य ग्रहण को प्रेग्नेंसी के लिए कष्टकारी समय माना गया है। सूर्य ग्रहण के दौरान निकलने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणें अजन्में बच्चे के लिए परेशानी देने वाली समझी जाती है।

इसके अलावा सूर्य ग्रहण के समय में भोजन न करने कि भी मान्यता है। सूर्य ग्रहण काल में विकरणों के कारण हमारी पाचन क्षमता प्रभावित होती है, इसीलिए ग्रहण काल में भोजन न करने के लिए कहा जाता है।

ग्रहण काल में साफ़-सफाई का ख़ास ध्यान रखना चाहिए, और जहाँ तक हो सोने से बचना चाहिए। इस प्रकार ग्रहण काल में हम अपना ध्यान रख, स्वयं को स्वस्थ रख सकते है। ८-९ अप्रैल को लगने वाला सूर्य ग्रहण क्योंकि भारत में दृश्य नहीं है, इसलिए भारत में इस सूर्य ग्रहण से सम्बंधित सूतक नियम लागू नहीं रहेंगे।


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