Maha Shivratri 2024: महाशिवरात्रि में महा क्या है? महाशिवरात्रि 2024 व्रत पर्व, पूजा विधि, मुहूर्त, व्रत कथा

By: Acharya Rekha Kalpdev | 06-Feb-2024
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Maha Shivratri 2024: महाशिवरात्रि में महा क्या है? महाशिवरात्रि 2024 व्रत पर्व, पूजा विधि, मुहूर्त, व्रत कथा

Maha Shivratri 2024: हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार प्रत्येक अमावस्या से पहले की रात्रि महाशिव रात्रि होती है। प्रत्येक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि शिवरात्रि के नाम से जानी जाती है। इसे प्रदोष तिथि के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। इस प्रकार 12 माह में 12 शिवरात्रि होती है। जिसमें फाल्गुन माह की शिवरात्रि सबसे उत्तम मानी जाती है, इसीलिए इसे महाशिवरात्रि कहा जाता है। पौराणिक कथाओंके अनुसार इस दिन भगवान् शिव और माता पार्वती जी का विवाह हुआ था। इसी उपलक्ष्य में महाशिव रात्रि अन्य शिवरात्रियों से श्रेष्ठ हो जाती है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार इस दिन ब्रह्माण्ड की रचना हुई थी। इस दिन की ग्रह स्थिति से ऊर्जा और अध्यात्म में वृद्धि होती है। ब्रह्मांडीय ऊर्जा एक चक्र में गति करती है। जिसमें निर्माण और नाश तक की प्रक्रिया होती है। इस दिन की ऊर्जा स्वत: उधरगामी होती है। मन भी इस दिन सही दिशा में गति करता है। निर्माण और नष्ट होना, यह क्रम चलता रहता है। जब विध्वंस का समय आता है तो भगवन शिव क्रोध मुद्रा में कैलाश पर्वत पर तांडव नृत्य करते है। भगवान शिव संहारक है, और उनके तांडव करने पर उनकी तीसरी आँख खुलती है, जिससे निकली अग्नि से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलकर रख हो जाता है। और यहाँ से एक बार फिर से सृजन की प्रक्रिया शुरू होती है। महाशिवरात्रि पर्व को भगवान शिव की महान रात्रि एक रूप में भी जाना जाता है। इस मध्य रात्रि को भगवान् शिव और शक्ति का विवाह हुआ था, भगवान् महादेव ने वैराग्य जीवन से बाहर निकलकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था।

भगवान् शिव और देवी पार्वती जी को दाम्पत्य जीवन की एक आदर्श जोड़ी के रूप में जाना जाता है। इसलिए प्रत्येक अविवाहित पुरुष देवी पार्वती जी के जैसी जीवन संगिनी चाहता है और प्रत्येक अविवाहित कन्या भी पति स्वरुप में भगवान् शिव जैसा पति चाहती है। इस कामना पूर्ति के लिए महाशिव रात्रि पूरे वर्ष भर में सबसे उत्तम दिन है। इस दिन अविवाहित पुरुष और कन्या दिन भर व्रत कर भगवान् शिव और माता पार्वती जी जैसे जीवन साथी की मनोकामना भगवान् शिव और माता पार्वती से मांगते है।

इसके अलावा विवाहित स्त्री पुरुष भी व्रत कर आजीवन सौभाग्यशाली रहने की कामना मांगते है। विवाहित स्त्रियां इस दिन अपने गृहस्थ जीवन की लम्बी आयु, पति के आरोग्य, दीर्घायु, और कल्याण हेतु भी भगवान शिव से प्रार्थना करती है। एक मत के अनुसार इस दिन भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश देने वाले सूर्य के जैसे लिंग रूप में प्रकट हुए थे। इसलिए इस रात्रि को विशेष मानकर इस रात्रि भर शिवलिंग पर अभिषेक किया जाता है।

भगवान् शिव क्या है ? भगवान् शिव का क्या अर्थ है?

शिव का अर्थ है "जो नहीं है" यह सारी सृष्टि शून्य से शुरू होकर शून्य में समा जाती है। इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ शून्य है। सारी आकाशगंगाएं भी इस शून्य के सामने बिन्दु मात्र है। यही शून्य भगवान् शिव है। शिव में ही सब कुछ जन्म लेता है और समा जाता है। इसलिए शिव को आदि और अंत दोनों कहा गया है। भगवान् शिव गुरु और योगी दोनों है। आज हम सब जिस सृष्टि को जानते है, वह सब भगवन शिव ही है। यदि भगवान् शिव को अपने अंदर समाहित करना है तो हृदय में शून्यता होनी चाहिए। जहाँ शून्यता होगी वहीँ किसी को समाहित किया जा सकता है।

भगवान् शिव योगी भी है शून्य भी है। सनातन धर्म अपने अंदर द्वन्द को समेटे है। दर्शन शास्त्र के गूढ़ अर्थ को समाये हुए है। जिस शून्यता को हम शिव कहते है, वह भगवान् शिव सर्वदृष्टा है। शास्वत है। हमारी बुद्धि, हमारे विवेक की सीमाएं है। भगवान् शिव की कोई सीमा नहीं है। इस संसार के सभी गुणों को एक ही व्यक्ति में समाहित कर दिया गया है। इसीलिए उन्हें महादेव की उपाधि दी गई। जहाँ अंधकार और प्रकाश दोनों नहीं होते, जहाँ सत और असत दोनों नहीं है, वहीँ निर्विकार भगवान् शिव है। शिव का अर्थ ही प्रसन्नता और आंनद है, परमसुख है, कल्याण है, परम मंगलदायक है, शिव अर्थात जिसे सब स्वीकार करें। भगवान् ब्रह्मा जी इस संसार के रचियता है, विष्णु जी पालनकर्ता है। और शिव संहारक है। शक्ति तीन रूपों में समाहित है। शक्ति के इन्हीं तीनों रूपों का हम नवरात्र में दर्शन पूजन करते है। भगवान् शिव को शक्ति की आत्मा कहा गया है। भगवान् शिव शक्ति में है, और शक्ति शिव में है। शिव स्वयं ही आधार है। स्वयं ही सृष्टा है और संहारक है। शक्ति को कई जगह माया का नाम भी दिया गया है।

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शिव का उच्चारण करने मात्र से चेतना एक नए आयाम में प्रवेश करती है। शिव में शि वर्ण शक्ति का प्रतीक है। और व् ऊर्जा को संतुलित करने का कार्य करता है। भगवान् शिव और शक्ति दोनों श्रद्धा और विश्वास है। श्राद्ध और विश्वास के साथ जब कोई भगवान शिव के श्रीचरणों में सीस झुकता है तो, उसका कल्याण हो जाता है। शिव शब्द का अलग अलग अर्थ कहा गया है। शिव को कल्याण कहा गया है। शिव को मंगल कहा गया है। शिव इस संसार के कल्याण के लिए ही जगत में है। दूसरों के कल्याण के लिए ही भगवान् सुन्दर है। शिव की गंभीरता और मौन दोनों के पीछे कल्याण की भावना ही निहित है। भगवान् शिव स्वयं में सृजन और प्रलय दोनों को समेटे हुए है। भगवान् शिव शक्ति के बिना शव समान है। शिव विश्वास है, विश्वास न रहने पर ईश्वर भी पत्थर हो जाता है। विश्वास ही एक पत्थर की प्रतिमा को ईश्वर में परिवर्तित करता है। शिव की शून्यता में ही सारा जगत शयन कर रहा है, निश्चित है, शिव के भरोसे निश्चित है।

शिव जी का पूजन दो रूपों में किया जाता है। एक शिव रूप में जो व्यक्त है, सगुन है, स्थूल रूप है। दूसरा भगवान् शिव का दूसरा रूप लिंग रूप है। भगवान् शिव के लिंग रूप की पूजा सबसे अधिक की गई है। लिंग से अभिप्राय शिव का परमशक्ति के साथ समन्वय चिन्ह। शिव और शिवलिंग दोनों का स्वरुप भिन्न है। दोनों की प्रतिमाओं का आकार और प्रकार भिन्न भिन्न है। भगवान् शिव सदैव एक तपस्वी, योगी के रूप में होते है।

भगवान् शिव शंकर दोनों एक ही सत्ता के दो रूप है। महाशिव रात्रि में भगवान् शिव और पार्वती जी का पूजन काम और भगवान् शिव के ज्योतिर्लिंग पर अभिषेक रूप में पूजन अधिक होता है। भगवान् शिव को भूत भावन के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। भूत भावन अर्थात भूतों के प्रिय। इस समाज ने जिनकी अवहेलना की है, उन्हें उपेक्षा झेलनी पड़ी हो, जिन्हें घृणा और नफरत की दृष्टि से देखा गया हो, उन सब को भगवान् शिव अपनी शरण देते है। जिसे संसार ने ठुकरा दिया हो उसे अपना ही शिवत्व है।

अर्द्धनारीश्वर स्वरुप भी भगवान् शिव का ही एक रूप है। अर्द्धनारीश्वर रूप का अर्थ यह नहीं है की इस रूप में भगवान् शिव अधूरे है, भगवान् शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप का अर्थ है की पुरुष कितना भी शक्तिशाली हो, स्त्री के साथ के बिना वह अपना अर्थ खो देता है। नारी शक्ति है, प्रकृति है। इसे जब तक पुरुष का साथ न मिले यह अपना अर्थ खो देती है। भगवान् शिव जब शक्ति के साथ होते है तभी पूर्ण होते है और शक्ति भी जब शिव के साथ होती है तभी वह समर्थ होती है।

भगवान् शिव हमें यह शिक्षा देते है की सुख के पल सब जीना चाहते है, दुःख कोई नहीं। समुद्र मंथन से अमृत निकला, उसे पीने के लिए दानव और देवता दोनों में युद्ध हुआ परन्तु समुद्र मंथन से निकले विष को ग्रहण करने के लिए कोई आगे नहीं आया। ठीक इसी प्रकार सुख को पाने के लिए लोग लड़ मर रहे है, दुःख से सब भाग रहे है।

भगवान शिव इतने भोले है की देवताओं के आग्रह पर विष तक ग्रहण कर लिया। इसका विचार किये बिना कि इसका परिणाम क्या होगा। भगवान् शिव विष कि तरह अपने भक्तों के सारे कष्ट भी पी जाते है। भगवान् शिव ने विष को कंठ में ही रोक लिया। विष के कारण भगवान् शिव का कंठ नीला हो गया और भगवान् शिव नीलकंठ के नाम से प्रसिद्द हुए।

भगवान शिव बहुत आसानी से प्रसन्न होते है। कोई शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दे, भगवन शिव इतने भर में प्रसन्न हो जाते है। शिव महिमा से पौराणिक कथाएं भरी पड़ी है। भगवान् शिव की जितनी प्रशंसा कि जाए, उतनी कम है। हमारे भोले बड़े भोले है। भगवान शिव इस संसार में विष, उपेक्षा, नफ़रत, नाराजगी, कटुता और अपमान सब सहन करते है। भगवान शिव स्वयं विष पीते है और अमृत दूसरों को देते है। शिव परिवार में भूत प्रेत है, जिन्हें देखकर हर कोई डर जाता है। भगवान् शिव का जीवन हमें बहुत कुछ सिखाता है।

भगवान शिव का वाहन नंदी जी है, जो मेहनत और शक्ति का प्रतीक है। अपने इष्ट के प्रति समर्पित रहना, और मेहनत से जी न चुराना। जिसने आलस्य का त्याग कर दिया उसने ईश्वर को पा लिया। ईश्वर का कोई भी रूप हो, ईश्वर उनकी सहायता करते है, जो अपनी सहायता स्वयं करते है। नंदी हमारी मेहनत और शक्ति का प्रतीक है।

भगवान् शिव ने चंद्र को अपने मस्तक पर धारण किया है। चंद्र की कलाओं की तरह हमारा मन घटता बढ़ता रहता है। इसे शांत रखना संतुलित रखना हमारा काम है। जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में चंद्र चमकता रहता है, ऐसे ही हमें भी हर हाल में खुश रहना चाहिए।

भगवान् शिव ने अपने सिर पर चंद्र के अतिरिक्त गंगा जी को भी धारण किया है। गंगा जी शीतलता और शुद्धता की परिचायक है। प्रत्येक व्यक्ति को गंगा जी को ज्ञान की गंगा के रूप में धारण करना चाहिए। मस्तिष्क में अज्ञान के अंधकार को बाहर कर, ज्ञान को प्रकाश के रूप में अपने मस्तिष्क में स्थान देना चाहिए। गंगा जी के प्रचंड वेग को सहन करने के लिए जो सामर्थ्य चाहिए, वह भगवान् शिव में है। विपरीत परिस्थितियों के वेग को सहना, भगवान् शिव से सीखना चाहिए।

भगवान् शिव का जब तीसरा नेत्र खुलता है तो इस सृष्टि का संहार होता है। लोभ, मोह और अहंकार रूपी तीन बंधन है, इसे भगवान् शिव ने अपने त्रिशूल के रूप में धारण किया है। ज्ञान, भक्ति और आस्था से इन बंधन को काटा जा सकता है। भगवान् शिव का तीसरा नेत्र आज्ञा चक्र है, जिसके खुलने से ज्ञान चक्षु खुल जाते है। उनके सब बंधन खुल जाते है।

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भगवान् शिव मस्तमौला है, डमरू बजाते है। सुख हो दुःख हो, सदैव प्रसन्न रहते है। भगवान् शिव जब डमरू बजाकर जब नृत्य करते है तो सब जीव जंतु मंत्रमुग्ध हो जाते है। भगवान् शिव गृहस्थ जीवन में होकर भी योगी है। उनका जीवन योगियों के जैसा है। अपनी अर्धांगिनी में शक्ति के दर्शन करते है। भगवान् शिव गृहस्थ जीवन में होकर भी ब्रह्मचर्य जीवन में है। गृहस्थ जीवन में भी आप संन्यास आश्रम जैसा जी सकते है।

हम सभी जीवन में दुखों और कष्टों रूपी भांग ग्रहण करते है। शिव भांग धतूरा ग्रहण करते है। जिन वस्तुओं को कोई ग्रहण नहीं करता, उन्हें भगवान् शिव ग्रहण करते है। भगवान् शिव को पशुपति महाराज की उपाधि दी गई है। भगवान् शिव मनुष्य में से पशुत्व का नाश कर, मनुष्य तत्व को बढ़ाते है। अपने भक्तों की पशुता का नाश करते है। इससे मनुष्य एक सीढ़ी ऊपर आकर देवत्व का गुण धारण करता है ।

वर्ष 2024 में महाशिवरात्रि, 08 मार्च, 2024, शुक्रवार को है। 2024 में महाशिवरात्रि पूजन मुहूर्त

साल 2024 में चतुर्दशी तिथि 08 मार्च, को रात्रि 09:57 मिनट पर शुरू हो रही है और अगले दिन 09 मार्च को सांयकाल 06:17 पर समाप्त हो रही है। ऐसे में महाशिवरात्रि पर्व पूजन मुहूर्त निम्न रहेगा-

  • प्रथम पूजा मुहूर्त 08 मार्च सायंकाल 06:25 से रात्रि 09:28 तक।
  • द्वितीय पूजा मुहूर्त 09 मार्च रात्रि 09:28 से 12:31 मध्य रात्रि तक।
  • तृतीय पूजा मुहूर्त 09 मार्च मध्य रात्रि 12:31 से 03:34 प्रात: काल तक।
  • चतुर्थ पूजा मुहूर्त 09 मार्च प्रात: काल 03:34 से 06:37 प्रात: काल तक।
  • पारण समय - प्रात: काल 06:30 से अपराह्न 15:30 तक।

महाशिवरात्रि पूजा विधि / Mahashivratri Puja Vidhi

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि पर्व के नाम से जाना जाता है। यह रात्रि भगवान् शिव की प्रिय रात्रि है। भगवान् शिव के भक्त इस रात्रि में भगवान् शिव दर्शन पूजन करते है। मंदिरों में इस दिन लाखों की संख्या में भक्तजन भगवान् शिव के ज्योतिर्लिंग पर दूधाभिषेक करते है। वैसे तो सोमवार का दिन भगवान् शिव को समर्पित दिन है। सोमवार के दिन भगवान् शिव के भक्त अपने इष्ट को व्रत, जप, अनुष्ठान, दर्शन, पूजन और जलाभिषेक से प्रसन्न करते है। शिवभक्तों के लिए फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि महाशिवरात्रि पर्व होने के कारण विशेष हो जाती है। इस दिन शिव भक्त भगवान् शिव को प्रसन्न करने के लिए दिन भर व्रत कर रात्रि भर जागरण और पूजन करते है। रात भर भगवान् शिव के मन्त्रों से जागरण करें, हवन, अनुष्ठान करें। भजन कीर्तन के विशेष आयोजन इस रात्रि में किये जाते है।

इस दिन भक्त प्रात:काल में सूर्योदय से पहले उठकर, स्नानादि से मुक्त होकर सूर्य को अर्घ्य दें। भगवान् शिव और माता पार्वती के सम्मुख व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर में भगवान् शिव और परिवार की धूप, दीप और फूल से पूजा करें। एक मिटटी एक लोटे में जल, दूध, फूल, कष्ट, बेल पत्र, धतूरा, आक के फूल डालकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करें, और भगवान् शिव से अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए उनसे निवेदन करें। सायंकाल में एक बार फिर से जल व् दूध, बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाएं। चार पहर की पूजा करें, भगवान् शिव को भोग लगाएं, और कथा सुने, भगवान् शिव की आरती गाये। रात्रिभर ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें।

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महाशिवरात्रि व्रत पर्व की कथा / Story of Mahashivratri Fast Festival

शिव पुराण में उल्लेखित कथा के अनुसार- एक गाँव में एक शिकारी रहता था। शिकारी जानवरों का शिकार करके जीवनयापन करता था। वह शिकारी गाँव के जमींदार का कर्जदार था, बहुत मेहनत करने पर शिकारी अपना कर्ज नहीं चुका पा रहा था। कर्ज का धन न मिलने से जमींदार उससे बहुत नाराज था। उसने शिकारी को एक शिव मठ में कैद कर दिया। जिस दिन जमींदार ने ऐसा किया उस दिन सौभाग्य से महाशिवरात्रि थी।

जमींदार उस दिन अपने घर में महाशिवरात्रि की पूजा कर रहा था। शिकारी पूजा विधि को ध्यान पूर्वक सुन रहा था। उसने मंत्र जाप भी दोहराये और कथा भी सुनी। शिकारी जमींदार से अगले दिन एक दिन की मोहलत लेकर शिकार की तलाश में जंगल चला गया। भूख प्यास से बेहाल होकर वह बेसुध होने लगा, कोई जानवर उसे अपना शिकार न बना ले, यह सोचकर मचान बनाने लगा। मचान के आसन के लिए उसने कुछ बेल पत्र की कुछ पत्तियां तोड़ी, संयोगवश कुछ पत्तियां मचान के नीचे शिवलिंग पर गिर गई। शिवलिंग पत्तियों से पूरी तरह ढक गया था। शिकारी एक रात्रि पहले से भूखा था। संयोगवश उसका व्रत भी उस दिन हो गया था। कुछ देर में एक हिरनी वहां से गुजरी, जिसने शिकारी से एक दिन के लिए अपनी जान न लेने की विनती की। मचान पर बैठे होने के कारण, कुछ पत्ते फिर से शिवलिंग पर गिर गए।

उसके कुछ देर बाद एक और हिरनी आई, उसने अपने बच्चों को उनके पिता के पास छोड़ कर वापस आने के लिए कहा, और अपनी जान बख्सने के लिए कहा। शिकारी ने उस पर तरस खाया। और उसे भी छोड़ दिया।

उसे भी शिकारी ने जाने दिया। कुछ घंटे बीत जाने पर हिरनी अपने परिवार के साथ शिकारी के पास आई। शिकारी को हिरनी के परिवार पर दया आ गई। उसने उस दिन शिकार नहीं किया। व्रत भी उसका हो गया था। और उसने अनजाने में शिवलिंग पर बेलपत्र भी अर्पित कर दिया। उसके इस प्रकार बेलपत्र अर्पित करने से भगवान् शिव प्रसन्न हुए और शिकारी को मोक्ष का वरदान दिया। इस प्रकार कथा पूर्ण हुई।


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