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गौरी तीज व्रत - माघ माह

By: Rekha Kalpdev | 01-Feb-2019
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गौरी तीज व्रत - माघ माह

वर्ष के बारह माहों में माघ माह सबसे अधिक पुण्य, दान, धर्म, स्नान और व्रत करने का माह है। इस माह की शुभता का वर्णन विभिन्न धर्म-पुराणों में किया गया है। माघ मास को पुण्य प्राप्ति अमृत स्नान का माह भी कहा जाता है। इस मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को गौरी तीज व्रत का पालन किया जाता है। इस वर्ष यह पर्व , शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। यह व्रत मुख्यत: भगवान शिव और देवी पार्वती का आशीर्वाद प्राप्ति हेतु किया जाता है। वैवाहित स्त्रियां इस दिन अपने सौभाग्य को बनाए रखने के लिए देवी गौरी को प्रसन्न करने के लिए इस व्रत का पालन करती है।

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गौरी तीज व्रत

गौरी तीज अत्यंत शुभ व्रत पर्व है। यह पर्व पूर्ण आस्था और विश्वास के साथ मनाया जाता है। अमावस्या से तीसरा दिन गौरी तीज के रूप में मनाया जाता है। यह दिन माँ गौरी के चरण कमलों से आशीर्वाद प्राप्त करने का दिन है। तृतीया तिथि के दिन मां गौरी का दर्शन-पूजन करना विशेष रुप से शुभ माना जाता है।

गौरी तृतीया इतिहास

पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, जो लोग व्रत - अनुष्ठान के साथ इस दिन देवी गौरी की पूजा करते हैं, उन्हें सौभाग्य प्राप्त होता है। इस व्रत का पालन करने वाली महिलाओं को आनंदित दांपत्य जीवन और संतान की प्राप्ति होती है। किंवदंतियों के अनुसार, यह कहा जाता है कि देवी गौरी ने राजा दक्ष की बेटी के रूप में धरती पर जन्म लिया। वह सती के नाम से जानी जाती थी। उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उनकी इच्छा पूरी की। देवी सती को हिन्दू संस्कृति में विभिन्न नामों से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवी सती ने भगवान शिव से शुक्ल पक्ष की तृतीया को शादी की थी। इस प्रकार, यह भक्तों के लिए एक शुभ दिन माना जाता है। इस व्रत को करने से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

व्रत पूजन विधि

प्रात:काल में नित्यकर्म और स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर इसके साथ ही सर्वप्रथम पूज्य देव भगवान श्रीगणेश का भी विधि-विधान से पूजन करें एवं भगवान भोलेनाथ और देवी पार्वती का मन-वचन क्रम से पूजन करें। पूजन करते हुए भगवान शिव का जल में पंचगव्य और चंदन मिलाकर अभिषेक करें। देव को स्नानादि कराने के बाद, धूप, दीप और फूल से भगवान शिव का पूजन करें। ईष्ट देव के सम्मुख व्रत पालन का संकल्प लें। तत्पश्चात देवी गौरी को पंचामृत से स्नान कराते हुए कुमकुम, चंदन और सिंदूर सजाएं। देवी का मनमोहक श्रृंगार करें। इस प्रकार भगवान शिव और मां गौरी का दर्शन-पूजन करने के बाद, माता को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें। इसके साथ ही गौरी व्रत कथा सुनें। पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से जो स्त्री इस व्रत का पालन करती है, उसे अनंत सौभाग्य के प्राप्ति होती है। सायंकाल में अनुष्ठान करते हुए, देवी को भोग अर्पित करें और यथासंभव दान करें। इस व्रत के विषय में कहा जाता है कि इस व्रत का पालन करने से व्रती की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है, उसके व्रत से जुड़े सभी उद्देश्य पूरे होते है।

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व्रत कथा

गौरी व्रत के महत्व का उल्लेख विभिन्न धर्म पुराणों में मिलता है। इस विषय में कथा भी प्रचलित है, जिसके अनुसार महाराजा दक्ष के यहां देवी सती का जन्म हुआ। देवी सदैव से ही भगवान शिव को पति रुप में प्राप्त करना चाहती थी। इसके लिए देवी सती ने अनेक वर्षों तक जप, तप और साधना की। देवी की साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव से उनका विवाह माघ मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को सम्पन्न हुआ। इसी दिन को गौरी तृतीया व्रत के नाम से जाना जाता है। इस व्रत का पालन मनोनुकूल व्रत की कामना करने वाली विवाह योग्य कन्याएं भी करती है। विवाह योग्य कन्याओं और विवाहित महिलाओं के लिए द्वारा इस व्रत का पालन खास तौर पर किया जाता है।

कैसे मनाएं

यह हर साल माघ महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह भक्तों द्वारा भगवान शिव और देवी पार्वती की कृपा पाने के लिए मनाया जाता है। माँ दिव्य के चरण कमलों में प्रार्थना करने से दोनों लोकों में पुण्य़ की प्राप्ति होती है। जिन लोगों के वैवाहिक जीवन में किसी भी तरह की परेशानियां चल रही हों उन दम्पतियों को इस व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए।


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