दूसरे नवरात्रि की देवी कौन है? देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा कैसे करें? | Future Point

दूसरे नवरात्रि की देवी कौन है? देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा कैसे करें?

By : Acharya Rekha Kalpdev
Expert Review : Dr. Arun Bansal, Vedic Astrologer | 45+ Years Experience
Published : 19-Mar-2024दूसरे नवरात्रि की देवी कौन है? देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा कैसे करें?

देवी दुर्गा के नव अवतारों का साल में दो बार दर्शन-पूजन किया जाता है। इन्हीं नवदेवियों में से देवी का दूसरा रूप देवी ब्रहमचारणी का रूप है। चैत्र नवरात्र हों या आश्विन नवरात्र, दोनों के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। ब्रह्मचारिणी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। प्रथम शब्द ब्रह्म से अभिप्राय: तपस्या और चारणी का अर्थ आचरण करना है। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ तपस्या का आचरण करने वाला या वाली हुआ। भगवान् शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने अनेकोनेक वर्षों तक तपस्या की, साधना की थी। देवी पार्वती की साधना से प्रसन्न होने पर देवी पार्वती जी को भगवान् शिव ने अपनी अर्धांग्नी के रूप में स्वीकार किया।

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देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरुप

देवी ब्रह्मचारिणी का स्वारूप अत्यंत कोमल, मनोरम है। देवी ब्रह्मचारिणी तपस्वी रूप में है, उनके एक हाथ में जाप माला और दूसरे हाथ में कमंडल है। इस स्वरुप में देवी किसी भी वहां पर सवार नहीं है। माता ब्रह्मचारिणी देवी नवत्रात्रि की दूसरी देवी है। नवरात्री के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी का दर्शन-पूजन पूर्ण विधि विधान से किया जाता है।देवी ब्रह्मचारिणी की कथा, मुख्य रूप से भगवान् शिव के प्रति उनके अटूट स्नेह और समर्पण की कथा है। देवी ब्रह्मचारिणी अपने इस स्वरुप में वैवाहिक जीवन में समर्पण और निष्ठावान रहने का सन्देश देती है। देवी वैवाहिक जीवन को एक तपस्या के जैसा होने का सन्देश भी देती है।

ब्रह्मचारिणी देवी से जुडी कथा

पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र प्रजापति दक्ष ने अपने यहाँ एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में प्रजापति दक्ष ने सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया, परन्तु अपनी पुत्री देवी सती और उनके पति भगवान् शिव को इस यज्ञ में नहीं बुलाया। भगवान् शिव और देवी सती का विवाह प्रजापति दक्ष की आज्ञा के विरुद्ध हुआ था। इस पर राजा दक्ष दोनों से बहुत क्रोधित थे। भगवान् शिव को अपमानित करने हेतु राजा दक्ष ने उन्हें इस आयोजन में नहीं बुलाया। देवी सती को जब अपने पिता के इस यज्ञ की जानकारी मिली तो देवी सती को बहुत बुरा लगा। उन्होंने भगवान् शिव से यज्ञ में चलने की जिद की, भगवान् शिव ने बिना आमंत्रण के शामिल होने से मना कर दिया। इस पर देवी सती भगवान् शिव की आज्ञा लिया बिना ही अपने पिता राजा प्रजापति एक यज्ञ में शामिल होने पहुँच गई। अपनी पुत्री सती को बिना निमंत्रण के इस प्रकार आया देख कर राजा दक्ष बहुत नाराज हुए और देवी सती और भगवान् शिव के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया। देवी सती अपने पति का अपमान सहन न कर सकी और योगाग्नि द्वारा अपना शरीर त्याग दिया। भगवान् शिव को जब सारा प्रसंग मालूम हुआ तो वो बहुत क्रोधित हुए।

देवी सती के शरीर त्यागने के बाद सृष्टि निर्जीव समान हो गई, भगवान् शिव भी उदास और व्यथित हो गए। दानवों का उपद्रव बढ़ गया। राक्षओं का विनाश करने हेतु आदिशक्ति पार्वती ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया। देवी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में हिमालय और मैनादेवी के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था। पर्वतराज के घर जन्म लेने के कारण ही देवी पार्वती कहलाई।

देवी पार्वती जब विवाह योग्य हुई तो हिमालय राज ने देवऋषि नारद जी से अपनी पुत्री की जन्मपत्रिका देखने के लिए कहा। देवी पार्वती जी की जन्मपत्रिका देखने के बाद नाराज जी ने कहा कि उनकी पुत्री के जीवन साथी देवो के देव महादेव होंगे। जब देवी पार्वती जी को यह मालूम हुआ तो उन्होंने भगवान् शिव को पाने के लिए घोर तपस्या करनी शुरू कर दी। तपस्या अवधि में देवी ने प्रारम्भ में कुछ दिन फल और फूल का सेवन कर तपस्या की। उसके बाद बिल्व पत्र का सेवन का तपस्या की, तत्पश्चात निर्जल और बिना आहार के व्रत सहित तपस्या की।

देवी पार्वती की तपस्या से सभी देवी देवता प्रसन्न थे, उन्होंने देवी पार्वती जी को आशीर्वाद दिया की आपका मनोरथ सिद्ध हो। समय बीतने पर देवी पार्वती का विवाह भगवान् शिव के साथ संपन्न हुआ। देवी ब्रह्मचारिणी देवी पार्वती का ही रूप है। देवी ब्रह्मचारिणी के रूप में देवी सब के मनोरथ सिद्ध करती है। देवी इस रूप में सभी विद्याओं को उत्पन्न करने वाली देवी है। नवरात्री के दूसरे दिन देवी कवच का पाठ करने के बाद कुंजिका स्तोत्र के साथ दुर्गा सप्तसती का पाठ करना अति शुभ माना गया है।

ब्रह्मचारिणी माता श्लोक:

दधाना करपद्माभ्याम अक्षमालाकमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ।

मां ब्रह्मचारिणी के स्वयं सिद्ध बीज मंत्र:
ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:।

मां ब्रह्मचारिणी का पूजन मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।

देवी ब्रह्मचारिणी का मंत्र
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम:

देवी ब्रह्मचारिणी का मंत्र
ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:।

देवी ब्रह्मचारिणी स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

देवी ब्रह्मचारिणी का पूजन कैसे करें?

  • देवी ब्रह्मचारिणी का व्रत और पूजन नवरात्री के दूसरे दिन किया जाता है।
  • दूसर नवरात्री पर साधक को प्रात: काल में जल्द उठना चाहिए।
  • प्रात:काल में नित्य क्रियाओं से मुक्त होकर, स्नान के पश्चात सफ़ेद वस्र धारण करने चाहिए।
  • देवी ब्रह्मचारिणी के स्वरुप का दर्शन पूजन करें। पंचामृत से उन्हें स्नान कराएं।
  • देवी को सफ़ेद वस्त्र अर्पित करें। देवी को फल, फूल, अक्षत, रोली और चन्दन भी अर्पित करें।
  • उन्हें शक्कर का भोग लगाए।
  • देवी को गुड़हल या लाल रंग के फूल पसंद है।
  • देवी ब्रह्मचारिणी के मन्त्रों का जाप करें।
  • देवी ब्रह्मचारिणी की स्तुति करें।

देवी ब्रह्मचारिणी की आरती

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।

कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो ​तेरी महिमा को जाने।

रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।