संतान प्राप्ति हेतु करें पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत, जानें इसका धार्मिक महत्व | Future Point

संतान प्राप्ति हेतु करें पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत, जानें इसका धार्मिक महत्व

By: Future Point | 15-Jan-2021
Views : 3806संतान प्राप्ति हेतु करें पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत, जानें इसका धार्मिक महत्व

पौष का महीना बहुत पावन और शुभ माना जाता है, हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। पौष मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इस दिन सुदर्शन चक्रधारी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। 

मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान की प्राप्ति होती है, इसलिए इसे पौष पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। स्त्री वर्ग में इस व्रत का बड़ा प्रचलन और महत्व है। इस व्रत को करने से संतान सम्बन्धी बाधाएं दूर हो जाती हैं और संतान की रक्षा भी होती है।

इस व्रत को निर्जला और फलाहारी दोनों तरह से रखा जा सकता है। पौष मास की शुक्ल एकादशी को संतान सुख की प्राप्ति के लिये बहुत ही खास दिन माना जाता है। इस एकादशी को पुत्रदा एकादशी भी कहा जाता है।

पौष पुत्रदा एकादशी पर सरल ज्योतिषीय उपाय जानने के लिये फ्यूचर पॉइंट पर देश भर के जाने माने ज्योतिषाचार्यों से परामर्श करें। अभी परामर्श करने के लिये यहां क्लिक करें।

पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व-

पौष मास की शुक्लपक्ष एकादशी को संतान प्राप्ति के लिये बहुत ही विशेष दिन माना जाता है। कहते हैं इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने व भगवान विष्णु की पूजा करने से संतान का सुख मिलता है। यहां तक इस एकादशी व्रत की कथा सुनने या पढ़ने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है।

पुत्रदा एकादशी व्रत विधि -

एकादशी के दिन प्रात: काल स्नानादि कर व्रत का संकल्प लेना चाहिये। भगवान विष्णु के बाल गोपाल रूप की पूजा इस दिन करनी चाहिये और उपोरक्त कथा पढ़नी या सुननी चाहिये।

पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को व्रत से पूर्व दशमी के दिन एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रती को संयमित और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

प्रातःकाल स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेकर भगवान का ध्यान करें। गंगा जल, तुलसी दल, तिल, फूल पंचामृत से भगवान नारायण की पूजा करनी चाहिए।

इस व्रत में व्रत रखने वाले बिना जल के रहना चाहिए। यदि व्रती चाहें तो संध्या काल में दीपदान के पश्चात फलाहार कर सकते हैं।

 रात्रि में भगवान का भजन कीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिये और द्वादशी के दिन प्रातः सूर्य देव को अर्घ्य देकर पूजा संपन्न करनी चाहिये।

द्वादशी के दिन ही ब्राह्मण या किसी जरुरतमंद भूखे व्यक्ति को भोजन करवाकर, वस्त्रादि दान दक्षिणा के रूप में देकर उन्हें संतुष्ट करने के पश्चात ही व्रत का पारण करना चाहिये।

आपकी कुंडली में छिपे राज योग जानने के लिए क्लिक करें

पुत्रदा एकादशी 2021 तिथि मुहूर्त -

पौष पुत्रदा एकादशी –  24 जनवरी 2021

एकादशी तिथि आरंभ – 23 जनवरी को रात 20 बजकर 56 मिनट से

एकादशी तिथि समाप्त – 24 जनवरी रात 22 बजकर 57 मिनट तक

पारण का समय – 25 जनवरी को सुबह 07 बजकर 13 मिनट से 09 बजकर 21 मिनट तक

संतान की कामना के लिए क्या करें यह कार्य -

प्रातः काल पति-पत्नी दोनों संयुक्त रूप से भगवान श्री कृष्ण की उपासना करें।

संतान गोपाल मंत्र का जाप करें।

मंत्र जाप के बाद पति-पत्नी प्रसाद ग्रहण करें।

गरीबों को श्रद्धानुसार दक्षिणा दें और उन्हें भोजन कराएँ।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रतकथा -

पुराणों के अनुसार भद्रावती नाम की एक नगरी थी जिसमें सुकेतुमान नाम के राजा का राज हुआ करता था। राजा बहुत ही न्यायप्रिय था, जनता भी उसके राज में काफी खुश थी, राजा हमेशा प्रजा की भलाई के लिए कदम उठाया करता था। लेकिन राजा सहित समस्त प्रजा को दिन प्रतिदिन एक ही चिंता सताये रहती थी कि राजा की कोई संतान नहीं थी। 

रानी शैव्या भी संतान न होने से हमेशा परेशान रहा करती थी। राजा के पितर भी सोचते रहते कि अभी तो उनका पिंडदान करने के लिये सुकेतुमान है लेकिन इसके बाद कौन करेगा? खुद राजा भी सोचता कि उसके मरने के बाद उसका उत्तराधिकारी कौन होगा, कौन उसके लिये पिंडदान करेगा? बिना संतान के पितरों व देवताओं के ऋण से उसे कैसे मुक्ति मिलेगी? कुल मिलाकर राजा का नि:संतान होना राजा व प्रजा के लिये भारी दुख का विषय था। और एक बार तो राजा इतना अधिक दुखी हुआ की उसने प्राण त्यागने तक ठान ली लेकिन फिर उन्हें अहसास हुआ कि ऐसा तो सोचना भी पापकर्म है। 

राजा तरह-तरह के कामों में खुद को व्यस्त रखते लेकिन जैसे ही थोड़े समय के लिये भी उन्हें एकांत मिलता संतान की चिंता उन्हें घेर लेती। एक दिन राजा जंगल में चले गये भटकते भटकते लगभग आधा दिन बीत गया, प्यास ने राजा को व्याकुल कर दिया थोड़ी देर भटकने के बाद एक सरोवर दिखाई दिया जिसमें कमल खिले थे, हंस विचरण कर रहे थे। तालाब के किनारे मुनियों की कुटिया बनी हुई थी। 

राजा इस नज़ारे को देखकर हैरान रह गये पहले तो उन्हें यहां पर ऐसा मंजर देखने को नहीं मिला था। वह मुनियों को दंडवत प्रणाम कर उनके पास बैठ गया और मुनियों से पूछा हे महात्माओं आप लोग कौन हैं और यहां कैसे आना हुआ है, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं। मुनियों ने कहा राजन हम विश्वदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने के लिये आये हैं। 

आज पुत्रदा एकादशी का दिन हैं। पुत्र का नाम सुनते ही राजा का सारा दुख आंसुओं के जरिये बाहर आने लगा और मुनियों से गिड़गिड़ाकर बोले हे मुनिवर मैं संतान के सुख से वंचित हूं अत: मुझे भी कोई उपाय बतायें, जिससे मेरे आंगन में भी किलकारी गूंजे। मुनियों ने कहा राजन आज का दिन बहुत शुभ है पौष मास की शुक्ल एकादशी है तुम इसका विधिपूर्वक उपवास करो, तुम्हारी मनोकामना जरुर पूरी होगी। तत्पश्चात मुनियों के कहे अनुसार ही राजा ने पुत्रदा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया व द्वादशी के दिन पारण किया। कुछ समय के पश्चात ही रानी शैव्या की गोद भर गई और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

इस प्रकार जो भी पुत्रदा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक रखता है और जो इस कथा को पढ़ता या सुनता है उसकी मनोकामनाएं भी उसी प्रकार पूर्ण हो जाती हैं जैसे राजा सुकेतुमान की हुई।