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अजा एकादशी व्रत : ये है व्रत विधि, कथा और पारण समय

By: Future Point | 04-Sep-2018
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अजा एकादशी व्रत : ये है व्रत विधि, कथा और पारण समय

भाद्रपद की कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी के रूप में मनाया जाता है। अजा एकादशी को कामिका एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। एकादशी का पर्व भगवान विष्‍णु को समर्पित है। अगर आप भगवान विष्‍णु को प्रसन्‍न कर इस संसार सभी सुखों को भोगना चाहते हैं तो इस बार अजा एकादशी का व्रत जरूर करें।

अजा एकादशी व्रत 2018

हर साल 24 एकादशियां आती हैं और महीने में दो एकादशी व्रत होते हैं। इस बार अजा एकादशी का व्रत 6 सितंबर, 2018 को मनाया जाएगा। इस दिन रात्रि जागरण और व्रत करने से भक्‍तों के सभी पाप धुल जाते हैं।

अजा एकादशी पारण का समय

7 सितंबर को पारण का समय: सुबह 6 बजे से 8 बजकर 35 मिनट तक

पारण ति‍थि के दिन द्वादशी समाप्‍त होने का समय: 9 बजकर 12 मिनट पर

एकादशी तिथि प्रारंभ: 5 सितंबर को 3 बजे

एकादशी तिथि समाप्‍त: 6 सितंबर को 12:15 बजे

अजा एकादशी की पूजन विधि

एकादशी के दिन प्रात:काल जल्‍दी उठें और नित्‍य कर्म से मुक्‍त होने के बाद पूरे घर की सफाई करें। इसके बाद तिल और मिट्टी के लेप का प्रयोग करते हुए कुशा से स्‍नान करें। स्‍नान के बाद भगवान विष्‍णु की पूजा करें।

घर में एक साफ और शुद्ध स्‍थान देखकर वहां धान्‍य रखें और धान्‍य के ऊपर कुंभ स्‍थापित करें। कुंभ को लाल रंग के वस्‍त्र से सजाएं और स्‍थापना करने के बाद कुंभ की पूजा करें। इसके बाद कुंभ के ऊपर भगवान विष्‍णु जी की प्रतिमा स्‍थापित करें और प्रतिमा के समक्ष व्रत का संकल्‍प लें। संकल्‍प लेने के बाद धूप, दीप और पुष्‍प से भगवान विष्‍णु की पूजा करें।

एकादशी तिथि पर पूरा दिन व्रत रखें और रात्रि में भगवान विष्‍णु की सच्‍चे मन से प्रार्थना करें। एकादशी के अगले दिन यानि द्वादश ति‍थि को सुबह उठकर स्‍नान करें और भगवान विष्‍णु को भोग लगाएं। पंडित जी को भोजन करवाने के बाद स्‍वयं भोजन करें और व्रत का पारण करें।

वैसे तो एकादशी के व्रत में जल का सेवन भी नहीं किया जाता है किंतु अगर आपसे ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है आप जल ग्रहण कर सकते हैं एवं व्रत में कांसे के बर्तनों में भोजन ना करें। एकादशी के दिन मूंग, मसूर, चना, कद्दू, शाक और शहद का भी प्रयोग वर्जित है।

व्रत में जिस भी वस्‍तु का सेवन करें उसे घर पर ही बनाएं और किसी और के घर का अन्‍न ग्रहण ना करें।

व्रत के दिन क्रोध आदि से दूर रहें।

झूठ ना बोलें और ना ही व्रत के दिन किसी की निंदा करें।

अजा एकादशी व्रत कथा

अजा एकादशी के व्रत की कथा राजा हरिशचंद्र से जुड़ी हुइ है। किवंदती है कि राजा हरिश्‍चंद्र अत्‍यंत प्रतापी और सत्‍यवादी राजा थे। उसने अपनी सत्‍यता एवं वचन पूर्ति हेतु पत्‍नी और पुत्र को बेचकर देता है और स्‍वयं भ एक चण्‍डाल का सेवक बन जाते हैं। इस संकट से मुक्‍ति पाने का उपाय गौतम ऋषि उन्‍हें देखते हैं। महर्षि ने राजा को अजा एकादशी के बारे में बताया। गौतम ऋषि के कथन सुनकर राजा मुनि के कहे अनुसार विधिपूर्वक व्रत करते हैं।

इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्‍ट हो गए और व्रत के प्रभाव से उन्‍हें पुन: अपना राज्‍य मिल गया। अंत में राजा अपने परिवार सहित स्‍वर्ग लोग की ओर चले गए। मान्‍यता है कि राजा को वापिस अपना राजपाट और स्‍वर्ग में स्‍थान अजा एकादशी की वजह से ही मिला था। इस एकादशी की व्रत कथा सुनने मात्र से ही अश्‍वमेघ यज्ञ के समान फल मिलता है।

अजा एकादशी का महत्‍व

समस्‍त व्रतों में अजा एकादशी का व्रत श्रेष्‍ठ माना जाता है। इस दिन व्रत रखने से अपने चित्त, इंद्रियों, आहार और व्‍यवहार पर संयम रखना होता है। यह व्रत अर्थ और काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। पौराणिक, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन ही इसका आधार हैं। इस एक उपवास को करके आप अश्‍वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्‍या, तीर्थों में स्‍नान आदि जितना लाभ सकते हैं।

जो व्‍यक्‍ति सच्‍चे मन से एकादशी का व्रत करता है उसे पुण्‍य की प्राप्‍ति होती है। भगवान विष्‍णु को प्रसन्‍न करने के लिए आप इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत से भक्‍तों को बिना मांगे ही सब सुखों की प्राप्‍ति होती है। अजा एकादशी के व्रत में दीपदान का भी बहुत महत्‍व है और रात्रि में संकीर्तन करना अत्‍यंत फलदायी माना जाता है।

अगर आप जीवन और मृत्‍यु के बंधन से मुक्‍ति पाना चाहते हैं और अपने पापों को धोकर पुण्‍य की प्राप्‍ति करना चाहते हैं तो इस 6 सितंबर को अजा एकादशी का व्रत जरूर करें। भगवान विष्‍णु की कृपा से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगीं और आपके जीवन में खुशहाली आएगी।

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