रंभा तृतीया विशेष – महत्व, कथा एवं पूजा विधि

By: Future Point | 05-Jun-2019
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रंभा तृतीया विशेष – महत्व, कथा एवं पूजा विधि

रम्भा तृतीया मुख्य रूप से उत्तर भारत में ज्येष्ठ के महीने (मई – जून) की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है, यह दिन अप्सरा रम्भा को समर्पित होता है जो कि समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से उत्पन्न हुई थी, उत्तर भारत में कुछ हिन्दू समुदायों की महिलाओं द्वारा देवी रंभा जी की पूजा की जाती है. हिन्दू पुराणों के अनुसार इस व्रत को रखने से स्त्रियों का सुहाग बना रहता है और अविवाहित स्त्रियां भी अच्छे वर की कामना से इस व्रत को रखती हैं, रम्भा तृतीया का व्रत शीघ्र फलदायी माना जाता है, इस वर्ष 2019 में रम्भा तृतीया तिथि 5 जून को पड़ रही है।

रम्भा तृतीया का महत्व -

हिन्दू मान्यता अनुसार सागर मंथन से उत्पन्न हुए चौदह रत्नों में से एक रम्भा भी थीं, रम्भा तृतीया के दिन विवाहित स्त्रियां गेहूं, अनाज और फूल से लक्ष्मी जी की पूजा करती हैं,रंभा तृतीया के दिन हिन्दू धर्म में विवाहित महिलाएं अपने सुहाग की लम्बी आयु और बुद्धिमान संतान की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं एवं कुंवारी कन्यायें अच्छे वर की प्राप्ति की कामना से यह व्रत करती हैं, इसके अलावा इस दिन देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पूरे विधि विधान से पूजा की जाती है, इस दिन स्त्रियां चूड़ियों के जोड़े की भी पूजा करती हैं, जिसे अप्सरा रम्भा और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, कई जगह पर इस दिन माता सती की भी पूजा की जाती है।

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रम्भा तृतीया कथा -

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मात्मा और दानी राजा थे. राजा का नाम मुचुकुन्द था. प्रजा उन्हें पिता के समान मानते और वे प्रजा को पुत्र के समान. राजा मुचुकुन्द वैष्ण्व थे और भगवान विष्णु के भक्त थे. वे प्रत्येक एकादशी का व्रत बड़ी ही निष्ठा और भक्ति से करते थे. राजा का एकादशी व्रत में विश्वास और श्रद्धा देखकर प्रजा भी एकादशी व्रत करने लगी. राजा की एक पुत्री थी, जिसका नाम चन्द्रभागा था. चन्द्रभागा भी पिता जी को देखकर एकादशी का व्रत रखती थी. चन्द्रभागा जब बड़ी हुई तो उसका विवाह राजा चन्द्रसेन के पुत्र शोभन के साथ कर दिया गया. शोभन भी विवाह के पश्चात एकादशी का व्रत रखने लगा. कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी आयी तो नियमानुसार शोभन ने एकादशी का व्रत रखा. व्रत के दरान शोभन को भूख लग गयी और वह भूख से व्याकुल हो कर छटपटाने लगा और इस छटपटाहट में भूख से शोभन की मृत्यु हो गयी.

राजा रानी जमाता की मृत्यु से बहुत ही दु:खी और शोकाकुल हो उठे और उधर पति की मृत्यु होने से उनकी पुत्री का भी यही हाल था. दु:ख और शोक के बावजूद इन्होंने एकादशी का व्रत छोड़ा नहीं बल्कि पूर्ववत विधि पूर्वक व्रत करते रहे. एकादशी का व्रत करते हुए शोभन की मृत्युं हुई थी अत: उन्हें मन्दराचल पर्वत पर स्थित देवनगरी में सुन्दर आवास मिला. वहां उनकी सेवा हेतु रम्भा नामक अप्सरा अन्य अप्सराओं के साथ जुटी रहती है. एक दिन राजा मुचुकुन्द किसी कारण से मन्दराचल पर गये और उन्होंने शोभन को ठाठ बाठ में देखा तो आकर रानी और अपनी पुत्री को सारी बातें बताई. चन्द्रभागा पति का यह समाचार सुनकर मन्दराचल पर गयी और अपने पति शोभन के साथ सुख पूर्वक रहने लगी. मन्दराचल पर इनकी सेवा में रम्भादि अप्सराएं लगी रहती थी अत: इसे रम्भा एकादशी कहते हैं.

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रंभा तृतीया व्रत विधि -

  • रम्भा तृतीया व्रत के लिए ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया के दिन प्रात: काल दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • भगवान सूर्य देव के लिए दीपक प्रज्वलित करें।
  • इस दिन विवाहित स्त्रियां पूजन में गेहूं, अनाज और फूल से लक्ष्मी जी की पूजा करती हैं।
  • इस दिन लक्ष्मी जी तथा माता सती को प्रसन्न करने के लिए पूरे विधि -विधान से पूजन किया जाता है और इस दिन अप्सरा रम्भा की पूजा की जाती है।
  • हिन्दू मान्यता के अनुसार सागर मंथन से उत्पन्न हुए 14 रत्नों में से एक रम्भा भी थीं। रम्भा बहुत ही सुंदर थीं, हिन्दू धर्म में कई स्थानों पर विवाहित स्त्रियां चूड़ियों के जोड़े की पूजा करती हैं, जिसे रम्भा (अप्सरा) और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।
  • पूजन के समय ॐ महाकाल्यै नम:, ॐ महालक्ष्म्यै नम:, ॐ महासरस्वत्यै नम: आदि मंत्रों का किया जाता है।

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