नवरात्री के चौथे दिन इस प्रकार कीजिये माँ कुष्मांडा की पूजा आराधना।
By : Future Point
Expert Review : Dr. Arun Bansal, Vedic Astrologer | 45+ Years Experience
Published : 06-Sep-2019
नवरात्र के चौथे दिन माता दुर्गा की पूजा 'कुष्मांडा' के रूप में की जाती है. अपनी मंद मुस्कान द्वारा 'अण्ड' यानी 'ब्रह्मांड' की उत्पत्ति करने के कारण इस देवी को कुष्मांडा कहा गया है, ऐसी मान्यता है कि जब दुनिया नहीं थी, तब इसी देवी ने अपने हास्य से ब्रह्मांड की रचना की इसीलिए इन्हें सृष्टि की आदिशक्ति कहा गया है. कुष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं और कुष्मांडा देवी के हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल -पुष्प, अमृत पूर्ण कलश, चक्र, गदा व जप माला हैं. देवी का वाहन सिंह है।
माता के इस रूप देवी कुष्मांडा का महत्व-
शांत- संयत होकर, भक्ति भाव से माता की पूजा करनी चाहिए. इनकी उपासना से भक्तों को सभी सिद्धियां व निधियां मिलती हैं. लोग नीरोग होते हैं और आयु व यश में बढ़ोतरी होती है. इस दिन माता को मालपुआ का प्रसाद चढ़ाना चाहिए. इससे बुद्धि का विकास होता है।
कैसे पड़ा माँ कुष्मांडा नाम-
ये नव दुर्गा का चौथा स्वरुप हैं. अपनी हल्की हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्माण्डा पड़ा. ये अनाहत चक्र को नियंत्रित करती हैं. मां की आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहते हैं.संस्कृत भाषा में कुष्माण्डा को कुम्हड़ कहते हैं और मां कुष्माण्डा को कुम्हड़ा विशेष रूप सेप्रिय है. ज्योतिष में मां कुष्माण्डा का संबंध बुध ग्रह से है।
माँ कुष्मांडा की कथा-
एक पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। ये ही सृष्टि की आदि- स्वरूपा, आदि शक्ति हैं और इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है, वहां निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है, इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं, मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं और इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है, मां कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं।
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माँ कुष्मांडा की पूजन विधि-
- हरे कपड़े पहनकर मां कुष्माण्डा का पूजन करना चाहिए।
- पूजन के दौरान मां कुष्मांडा को हरी इलाइची, सौंफ और कुम्हड़ा अर्पित करनी चाहिए।
- इसके पश्चात् उनके मुख्य मंत्र 'ॐ कुष्मांडा देव्यै नमः' का 108 बार जाप करना चाहिए।
- चाहें तो माँ का स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं।
- नवरात्रि के चौथे दिन कुष्मांडा माता की आराधना की जाती है, इनकी कृपा से सभी प्रकार के रोग-शोक दूर हो जाते हैं और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
- मनुष्य भाग्यशाली बन जाता है, अष्टभुजाधारी माता कुष्मांडा शेर पर सवार रहती है।
- कहते हैं माता कुष्मांडा सूर्य मंडल में निवास करती है, माता के हाथ में पुष्प, चक्र, गदा, वर देती हुई मुद्रा, जप माला और अमृत घड़ा रहता है।
- ऐसी मान्यता है कि कुम्हड़ा यानी कद्दू की बलि दी जाती है, मां को हरा रंग बहुत पसंद है।
- नवरात्रि के मानसून के बाद आती है, इसलिए चारों ओर प्रकृति हरे रंग की चुनर ओढ़े खूबसूरत सी बनी रहती है।
- इसी खूबसूरती को मां कुष्मांडा बहुत पसंद करती हैं।
- मां को प्रिय भोग मालपुए का भोग लगाया जाना चाहिए।
- मालपुए का भोग अर्पित करने से मां कूष्माण्डा बहुत प्रसन्न होती हैं।
- इसके पश्चात् प्रसाद को किसी ब्राह्मण को दान कर दें और खुद भी खाना चाहिए।
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माँ कुष्मांडा का ध्यान मन्त्र-
मां कुष्मांडा का मंत्रः ॐ देवी कुष्मांडाये नमः , इस मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए।
मां कुष्माण्डा के मंत्र-
सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
मां कुष्माण्डा का जाप मंत्र-
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
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