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नवरात्री के आठवें दिन इस प्रकार कीजिये महागौरी की पूजा आराधना।

By: Future Point | 17-Sep-2019
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नवरात्री के आठवें दिन इस प्रकार कीजिये महागौरी की पूजा आराधना।

नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरी की पूजा की जाती है, महागौरी की आराधना से भक्तों को मनचाहे फल की प्राप्ति की होती है, कई भक्त इस दिन अष्टमी का व्रत रखते हैं इससे मां की पूजा-अर्चना करने वालों के हर कष्ट दूर होते हैं और इस दिन अन्नकूट पूजा यानी कन्या पूजन का भी विधान है, कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं लेकिन अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना ज्यादा फलदायी रहता है।

महागौरी के स्वरूप का महत्व-

वृषभ वाहन पर सवार मां अम्बे की मुद्रा अत्यन्त शांन्त स्वभाव वाली है, चार भुजा वाली महागौरी की दायीं भुजा आर्शीवाद की मुद्रा में हैं तो नीचे वाली भुजा में त्रिशूल शोभित रहता है, इनकी ऊपर वाली बायीं भुजा में डमरू है तो नीचे वाली भुजा से देवी गौरी सभी भक्तों को अभयदान देती दिखती है, आज के दिन मां जगदम्बा महागौरी को सभी सुहागन महिलायें सुबह ही उठकर स्नान करने के बाद पूरा श्रृंगार चढ़ाकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती है तो वहीं कुवारी लड़कियों को मां भवानी की पूजा करने से योग्य वर की प्राप्ति होती है।

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जो पुरूष इनकी पूजा करता है तो मां उनके अंदर के पाप के जलाकर उनकी आत्मा को शुद्ध कर देती है, इस दिन यदि घरों में भजन कीर्तन किए जाए, तो मां अम्बे काफी प्रसन्म होती है, क्योंकि मां के इस रूप को संगीत व गायन काफी पसंद होते हैं, इसलिए नवरात्र के आंठवें दिन भजन कीर्तन अवश्य करना चाहिए, साथ ही छोटी- छोटी कन्याओं को एकत्रित करके उन्हें नौ देवी मान कर उनकी पूजा की जानी चाहिए, कई लोग इस दिन भी मां को प्रसाद अर्पित करने के रूप में नौ कन्याओ को भोजन करवाते हैं, स्त्रियां को शुद्ध मन से ही मां महागौरी की पूजा करनी चाहिए और उन्हें भोग लगाना चाहिए, देवी महागौरी बड़ी ही शांत और मृदुल स्वभाव वाली है, जिनके चेहरे पर करूणा, स्नेह और प्यार का भाव दिखाई देता है।

महागौरी की कथा-

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ गया, देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इन्हें स्वीकार किया और इनके शरीर को गंगा-जल से धोते गए जिससे देवी पुनः विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो गई जिसकी वजह से इनका नाम गौरी पड़ा, आपके जीवन में बदलाव लाने के लिए आज ही लग्न विघ्न यन्त्र ख़रीदे और जीवनको समृद्ध बनाएं, माता महागौरी अंत्यंत सौम्य है, मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है, मां गौरी का ये रूप बेहद सरस, सुलभ और मोहक है, महागौरी की चार भुजाएं हैं, इनका वाहन वृषभ है, इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है, ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे के बाएं हाथ में वर-मुद्रा हैं, इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है, इनकी उपासना से भक्तों को सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

महागौरी की पूजा विधि-

  • महा अष्टमी पर दुर्गा पूजा महा स्नान और षोडशोपचार पूजा से शुरू होती है जो कि काफी हद तक महा सप्तमी पूजा जैसी होती है।
  • लेकिन इसमें प्राण प्रतिष्ठा नहीं होती कि जो कि सिर्फ महासप्तमी को होती है।
  • महाष्टमी पर नौ एक जैसे छोटे बर्तन स्थापित किए जाते है और इसमें सभी नौ दुर्गाओं का आहवान किया जाता है।
  • देवी दुर्गा के सभी नौ रूपों की इस दिन पूजा होती है।
  • देश के ज्यादातर हिस्सों में इस दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है।
  • छोटी बच्चियों को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें भेंट दी जाती है।
  • इस खास दिन को दुर्गाष्टमी के रूप में भी मनाया जाता है।
  • दुर्गाष्टमी के दिन माता दुर्गा की पूजा करी जाती है।
  • मां से अपने शत्रुओं पर नियंत्रण करने के लिए विशेष प्रार्थना की जाती है। इस दिन माता दुर्गा की 32 नामावली का पाठ करना अत्यंत सौभाग्यशाली होता है। ये इस प्रकार है-

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1) दुर्गा 2) दुर्गार्तिशमनी
3) दुर्गाद्विनिवारिणी
4) दुर्गमच्छेदनी
5) दुर्गसाधिनी
6) दुर्गनाशिनी
7) दुर्गतोद्धारिणी
8) दुर्गनिहन्त्री
9) दुर्गमापहा
10) दुर्गमज्ञानदा
11) दुर्गदैत्यलोकदवानला
12) दुर्गमा
13) दुर्गमालोका
14) दुर्गमात्मस्वरुपिणी
15) दुर्गमार्गप्रदा
16) दुर्गमविद्या
17) दुर्गमाश्रिता
18) दुर्गमज्ञानसंस्थाना
19) दुर्गमध्यानभासिनी
20) दुर्गमोहा
21) दुर्गमगा
22) दुर्गमार्थस्वरुपिणी
23) दुर्गमासुरसंहंत्रि
24) दुर्गमायुधधारिणी
25) दुर्गमांगी
26) दुर्गमता
27) दुर्गम्या
28) दुर्गमेश्वरी
29) दुर्गभीमा
30) दुर्गभामा
31) दुर्गभा
32) दुर्गदारिणी ।

मां गौरी की उपासना नीचे लिखे मंत्र से करनी चाहिए।

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः |
महागौरी शुभं दद्यान्त्र महादेव प्रमोददा ||

महा गौरी का ध्यान मंत्र-

श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेतांबरधरा शुचि।
महागौरी शुभे दद्यान्महादेव प्रमोददा।।

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