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मकर संक्रांति: महत्व और इसके पीछे की कहानी

By: Rekha Kalpdev | 12-Jan-2019
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मकर संक्रांति: महत्व और इसके पीछे की कहानी

मकर संक्रांति का पर्व प्रत्येक वर्ष जनवरी माह में आता है। यह पर्व विशेष रुप से प्रकाश के देवता सूर्य देवता को समर्पित पर्व है। संपूर्ण वर्ष में छ्ठ पूजा और मकर संक्रांति ही दो ऐसे पर्व है, जिनका सीधा संबंध सूर्य देव से हैं। इन दोनों ही पर्वों पर सूर्य देव की आराधना, दान, स्नान और पूजन कार्य किए जाते है। सूर्य देव को प्रसन्न कर आराधक इन दिनों अपनी मनोकामना पूर्ण करते है। वास्तव में इस दिन को शरद ॠतु में बदलाव होना शुरु हो जाता है। इसे मौसम में परिवर्तन के रुप में भी देखा जाता है। दिन के वातावरण में तापमान बढ़ना शुरु हो जाता है और सर्दियां कम होने लगती है।

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सूर्य देव - उत्तरायण


मकर संक्रांति का शाब्दिक अर्थ मकर राशि में सूर्य के प्रवेश से है। 12 माह में सूर्य 12 राशियों में विचरण करता है। इस प्रकार सूर्य एक माह में एक राशि में रहता है। सूर्य का यह राशि भ्रमण चक्र अप्रैल माह में मेष राशि से प्रारम्भ होता है। सूर्य का राशि बदलना ही संक्रांति कहलाता है। मकर राशि सूर्य के पुत्र शनि की राशि है, इसलिए जब सूर्य का मिलन अपने पुत्र से होता है, तो वह विशेष हो ही जाता है। मकर संक्रांति इसलिए भी विशेष मानी जाती है क्योंकि इस दिन सूर्य देव दक्षिणायण से निकल कर उत्तरायण में आ जाते है। सूर्य का उत्तरायण आना धार्मिक शुभ कार्यों के लिए शुभ सूचक है। इस दिन के साथ ही शुभ कार्य संपन्न करने के मुहूर्त पुन: प्रारम्भ हो जाते है।

मकर संक्रांति -15 जनवरी 2019


संक्रांति की तिथि सूर्य के राशि बदलने से निर्धारित होती है। इस वर्ष यह पर्व 15 जनवरी 2019 को श्रद्धा, विश्वास के साथ हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। सामान्यत: हिन्दुओं के सभी पर्व-व्रत चंद्र गोचर, तिथि, नक्षत्र, योग और करण अर्थात पंचांग के आधार पर तय किए जाते है। यही वजह है कि कभी कभी मकर संक्रांति 14 जनवरी और कभी कभी 15 जनवरी को मनायी जाती है। इस वर्ष इस दिन सर्वार्थसिद्धि योग भी बन रहा है, अत: इस दिन की शुभता ओर भी अधिक बढ़ गई है। सर्वार्थसिद्धि योग के फलस्वरुप इस दिन आराधकों एवं उपासकों की मनोकामना शीघ्र पूर्ण होने के योग बनते है।

मकर संक्रांति पर्व महत्व


धार्मिक रुप से इस दिन भगवान सूर्य के लिए व्रत कर, पवित्र नदियों, सरोवरों, संगम स्थलों पर स्नान, दान और पुण्य कार्य संपन्न किए जाते है। सूर्य नमस्कार, सूर्य अर्घ्य, सूर्य मंत्र जाप, सूर्य प्रार्थना, सूर्य आदित्य स्त्रोत का पाठ और सूर्य शांति के कार्य भी इस अवसर पर करने अति शुभ और शुभफलकारी माने जाते है। मकर संक्रांति के दिन ही दक्षिण भारत का पोंगल पर्व भी इसी दिन मनाया जाएगा। मकर संक्रांति पर्व का महत्व इस वर्ष इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि इस दिन इस वर्ष प्रयाग में अर्द्धकुम्भ स्नान का शुभारम्भ होने जा रहा है। संक्रांति और कुम्भ दो पुण्य कारी पर्व एक साथ होने से इस दिन गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी और अन्य शुभ नदियों में करोड़ों लोग स्नान कर मोक्ष प्राप्ति की कामना से पवित्र जल में डूबकी लगा सकते है। स्नान के बाद दान-धर्म कार्य करना भी पुण्यदायक माना जाता है।

मकर संक्रांति का पर्व देश के विभिन्न भागों, राज्यों में विभिन्न रुपों में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति के नाम से, कर्नाटक में भी संक्रांति के नाम से, केरल में पोंगल के नाम से, पंजाब और हरियाणा में माघ मास संक्रांति के नाम से एवं राजस्थान में इस पर्व को उत्तरायण और उत्तराखंड में यह पर्व उत्तरायणी के नाम से मनाया जाता है।

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मकर संक्रांति की पौराणिक कथा


मकर राशि का स्वामित्व शनि ग्रह के पास है। मकर संक्रांति से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र से मिलने उनके घर जाते है। यह सर्वविदित है कि सूर्य भगवान शनि देव के पिता है, और पिता व पुत्र दोनों में शत्रुवत संबंध है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य-शनि का एक साथ होना, भाव की शुभता और विशेषताओं में कमी करता है। फिर भी सूर्य का शनि ग्रह की राशि में जाने पर पुत्र को पिता का सम्मान, आदरभाव करने का अवसर प्राप्त होता है, और सूर्य-शनि से संबंधित अशुभ योगों में कमी करने के लिए यह सबसे उपयुक्त दिन माना जाता है।

इस दिन से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार इस दिन देवी गंगा जी भागीरथ जी के साथ सागर से मिली थी। इसी के साथ गंगा जी की यात्रा पूर्ण हुई थी। इसके अतिरिक्त इसी दिन भागीरथ जी ने अपने पूर्वजों के मोक्ष के लिए तर्पण कार्य पूर्ण किए थे।

भागीरथ जी के पितरों का तर्पण स्वीकार करने के बाद ही गंगा जी सागर में सम्माहित हो गई थी। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए, इस दिन गंगा तट और गंगा सागर पर तर्पण कार्य पूर्ण करने का इस दिन विशेष महत्व है।

इस पर्व से जुड़ी तीसरी कथा यह कहती है कि इस दिन महाभारत युद्ध में घायल भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने के पश्चात परलोक गमन के लिए प्राण त्यागे थे।

एक अन्य कथा के अनुसार इसी दिन देव और दानवों के मध्य युद्ध में देवताओं ने दानवों का अंत कर दिया था और सदैव के लिए अशुभ शक्तियों का नाश कर दिया था। मकर संक्रांति से एक ओर कथा जुड़ी हुई है जिसके अनुसार माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण को पुत्र प्राप्ति के लिए व्रत किया था। इन पौराणिक कथाओं के अनुसार यह पर्व सूर्य देव की शुभता प्राप्ति के लिए देश भर में मनाया जाता है।

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