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क्या आपकी कुंडली में हैं यह करोड़पति योग, पढ़ें विशेष जानकारी

क्या आपकी कुंडली में हैं यह करोड़पति योग, पढ़ें विशेष जानकारी

By: Rekha Kalpdev | 02-Aug-2018
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धन के बिना जीवन को चलाना सम्भव नहीं है। धन से ही जीवन की सभी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी होती हैं। सुख-सुविधाओं, ऐश्वर्य और संपन्नता की प्राप्ति में धन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। किसी ने सच कहा है कि "बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपया" यह कहावत आज के समय में एक दम सही सिद्ध होती है। धन के बिना विलासितापूर्ण जीवन जीना और जीवन को चलना संभव नहीं है।

इसी के चलते अधिक से अधिक धन संचय करना आज के समय की मांग और लोगों का स्वभाव हो गया है। किसी व्यक्ति को जीवन में कितना धन प्राप्त होगा और कब प्राप्त होगा यह कुंडली से जाना जा सकता है। जन्मपत्री में बन रहे ग्रह योगों का अध्ययन कर यह जाना जा सकता है कि आपके लिए धन की स्थिति कैसी रहेगी।

धन संबंधित भाव - जन्मपत्री का द्वितीय भाव धन संचय भाव हैं। जीवन में जातक कितना धन संचय करेगा यह इस भाव से जाना जाता है। जीवन में स्वय अर्जित आय की जानकारी लेने के लिए एकादश भाव का विश्लेषण किया जाता है। इसके अतिरिक्त 2 रा, 6वां और 10 वां भाव अर्थ भाव कहलाते हैं। यहां अर्थ से अभिप्राय: धन से हैं। छ्ठा भाव ऋण से जुड़ा भाव है। ॠण लेन-देन के कार्य इसी भाव से किये जाते हैं।

  • व्यक्ति जन्मजात धनी होगा या नहीं इसके लिए केंद्र भाव और त्रिकोण भावों का आपस में संबंध देखा जाता है और धन के मुख्य कारक ग्रह गुरु और शुक्र है। धन कारक ग्रहों का कुंडली में बली और सुस्थित होना जीवन में धन की स्थिति उत्तम रहने का संकेत देता है।

  • ऊपर बताए गए ग्रह और भाव धन संबंधी स्थिति दर्शाते हैं- पैतृक धन संबंधी के लिए दूसरे भाव पर विचार किया जाता है। दूसरा भाव बहुत बली हो तो ऐसा कहा जाता है कि बालक मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा होता है। इस स्थिति में जातक को अपने पूर्वजों से इतनी अधिक धन संपत्ति की प्राप्ति होती है कि उसे कार्य करने की आवश्यकता ही नहीं होती है।

  • इसी तरह कुंड्ली ॠण भाव बली हो तो व्यक्ति के जीवन की सभी आवश्यकताएं ॠण से पूरी हो जाती है। आईये अब हम धन से संबंधित अन्य ज्योतिषीय योगों को जानते हैं-

  • जिस व्यक्ति की कुंडली में लग्न भाव का स्वामी धन भाव में जाकर उच्च, स्वराशि या मूलत्रिकोण राशि में स्थित हों तो व्यक्ति धनी होता है। 3, 6, 10 और 11 वें भाव को उपचय भाव तथा वृद्धि भाव कहलाते हैं। इन भावों में शुभ ग्रह हों तो धन प्राप्ति का अति शुभ योग बनता है जिसे वसुमत योग के नाम से जाना जाता है।

  • इसके अतिरिक्त पंच महापुरुष योग भी व्यक्ति को धनी, सम्मानित और सफल बनाते हैं। कुंड्ली के चतुर्थ भाव में द्वितीयेश स्थित हों तो व्यक्ति को गुप्त रुप से धन तथा छुपे हुआ खजाना मिलने के योग बनते हैं। इसके साथ ही कुंडली के अष्टम भाव में आयेश हों अथवा इस भाव में तीन से अधिक ग्रह हों तो व्यक्ति को गलत तरीके से धन की प्राप्ति होती है।

  • द्वितीयेश यदि मंगल हो और जन्मपत्रिका में उच्च स्थिति में हो तो ऐसे व्यक्ति को भूमि द्वारा गडे़ धन की प्राप्ति भी हो सकती है। - राहु-केतु को अचानक होने वाली घटनाओं का कारक ग्रह माना गया है। कुंडली में यदि राहु-केतु ग्रहों का संबंध लग्न अथवा पंचम भाव से हो और पंचम भाव अथवा राहु-केतु पर गुरु अथवा शुक्र की शुभ दृष्टि योग भी हो तो जातक को सट्टे अथवा लाॅटरी द्वारा अचानक प्रभूत धन की प्राप्ति होती है।

  • निर्धनता योग - यदि धनेश अथवा लाभेश का किसी भी प्रकार से त्रिक भाव (6, 8, 12) के स्वामियों के साथ संबंध बन जाये तो धन हानि की संभावना बनती है।

  • चतुर्थ भाव में मंगल की राशि हों और मंगल चतुर्थ भाव पर सीधी दृष्टि दें तो व्यक्ति को भूमि-भवन की कोई कमी नहीं रहती हैं। तथा अष्टम भाव में मंगल हों तो व्यक्ति को पैतृक संपत्ति की प्राप्ति किसी वसीयत के माध्यम से होती हैं।

  • आय भाव में आयेश स्थित हो या आय भाव को आयेश देखें तो धन आगमन निरंतर होता रहता है।

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