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कुम्भ महापर्व-अमृत स्नान पर्व

By: Dr. Arun Bansal | 28-Jan-2019
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कुम्भ महापर्व-अमृत स्नान पर्व

भारत वर्ष अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के लिए सम्पूर्ण विश्व में जाना जाता रहा है। विश्व-संस्कृति का उदगम् स्थल यदि भारतवर्ष को कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारत वर्ष अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के लिए सम्पूर्ण विश्व में जाना जाता रहा है। विश्व-संस्कृति का उदगम् स्थल यदि भारतवर्ष को कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। सम्पूर्ण विश्व में केवल भारत की धरा ही संत, महात्माओं एवं अवतारी महापुरुषों की जन्मभूमि रही है, इनकी चरणरज से भारत की भूमि ही पावन होती रही है। कभी यहाँ मर्यादापुरुषोतम श्रीराम ने जन्म लिया तो कभी भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लेकर गीता ज्ञान से भारत वर्ष की संस्कृति को सुशोभित किया। यहां की संस्कृति में संतों-महात्माओं के स्नेह, भाईचारे, सौहार्द, शान्ति और आध्यात्मिकता की वायु अनुभव की जा सकती है। भारत देश को सम्पूर्ण विश्व की आत्मा कहा जा सकता है और भारत में प्रयागराज को भारत का प्राण कहा जा सकता है।

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कुम्भ परिचय


हमारे देश भारत में अनेक पर्व उत्सव और मेले आयोजित होते रहते हैं। धार्मिक पर्व और उत्सवों से त्याग, तप, साधना, परोपकार, धार्मिक जागृति और आध्यात्मिक चेतना के दर्शन होते हैं। सनातन धर्मियों का हिन्दुओं का सबसे बड़ा धार्मिक पर्व कुम्भ है, जो विश्व का सबसे बड़ा मेला कहा जा सकता है। यह महापर्व कब, क्यों और कहां मनाया जाता है इसका आधार पुरानों में दी गयी समुद्र मन्थन की कथा है। देव-दानवों द्वारा समुद्र मन्थन, मन्थन से अमृत सहित 14 दिव्य रत्नों की प्राप्ति, अमृत पर अधिकार के लिए देव-दानवों में संघर्ष और संघर्ष में भारत के 4 प्रमुख तीर्थों में अमृत बिन्दु का छलक पड़ना। अमृत बिन्दु पतन से चारों तीर्थ स्थान अमर और पवित्र हो गये। वहां की पवित्र नदियां अमृतमयी हो गयी।

विष्णुद्वारे तीर्थराजे ऽवन्त्यां गोदावरी तटे।
सुधा बिन्दु विनिक्षेपात् कुम्भपर्वेति-विश्रुतम्।।

अर्थात् अमृत-बिन्दु पतन से पृथ्वी पर चार कुम्भ पर्व हरिद्वार, प्रयाग, अवंतिका और नासिक में आयोजित होते हैं।

ज्योतिषीय महत्व


गुरु जब कुम्भ राशि में हों, सूर्य मेष राशि में हो और वैशाख मास हो तो कुम्भ का आयोजन हरिद्वार में किये जाने का विधान है।

गुरु मेष या वृषभ में हो, सूर्य मकर में हो और माघ मास हो तो कुम्भ प्रयाग में होगा।

गुरु सिंह राशि में हो, सूर्य भी सिंह राशि में हों और श्रावण मास हो तो इस संयोग में कुम्भ स्थल नासिक होगा।

गुरु सिंह राशि में हो, सूर्य में राशि में हो और वैशाख मास हो तो कुम्भ का आयोजन उज्जैन में किये जाने की मान्यता है।

सूर्य, चन्द्र और गुरु की राशिगत स्थिति में चन्द्र प्रति मास व सूर्य प्रति वर्ष उसी राशि में जाता है किन्तु गुरु प्रायः 12 वर्ष और कभी-कभी 11 वर्ष में उसी राशि में जाता है अतः गुरु ग्रह की राशि पुनरावृति लगभग 12 वर्ष/11 वर्ष में होने से प्रत्येक तीर्थ में एक बार कुम्भ पर्व का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार, प्रयाग और उज्जैन में तीन-तीन वर्ष के अन्तराल पर और उज्जैन और नासिक में कुम्भ का आयोजन किया जाता है।

कुम्भ मेले की तिथियां एवं पर्व

तिथि पर्व
14 जनवरी मकर संक्रान्ति (शाही स्नान)
21 जनवरी पौष पूर्णिमा
4 फरवरी मौनी अमावस्या (द्वितीय शाही स्नान) इसे मुख्य शाही स्नान भी कहते हैं।
10 फरवरी बसन्त पंचमी (तृतीय शाही स्नान)
19 फरवरी माघ पूर्णिमा

सामाजिक महत्व


कुम्भ महापर्व पर ना सिर्फ तीनों नदियों का संगम होता है बल्कि इस समय अनेक परम्पराएं, संस्कृतियां और भाषाओं का अद्भुत मिलन हो रहा होता है। कुम्भ अवधि में संगम पर स्नान, दान और पूजन का विशिष्ठ महत्व है, साथ ही इसका पौराणिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक महत्व भी है। सरल शब्दों में कहें तो कुम्भ स्नान पुण्य और ज्ञान का अनूठा संगम है। कुम्भ महापर्व के समय अनेक शंकराचार्य, महामंडेलश्वर, साधु-संत और विभिन्न अखाड़ों के गुरु एकत्रित होकर अपनी ज्ञान चर्चा, धर्म व्याख्या और संस्कृति से आमजनों को परिचित कराते है। यह मेला दुनिया का सबसे विशाल मेला है। जिसमें आने वाले भक्तों-श्रद्धालुओं की गणना भी संभव नहीं है। धर्म-कर्म, आध्यात्म और कल्याण से जुड़ें व्यक्तियों के लिए कुम्भ महापर्व बहुत बड़ा आध्यात्मिक उत्सव है। इस पर्व की छटा ही ऐसी है की इसकी ओर पूरा विश्व खींचा चला आता है।

अध्यात्मिक महत्व


ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी
तीर्थनामुत्तमं तीर्थ प्रयागाख्यमनुत्तमम

अर्थात जिस प्रकार सूर्य और नक्षत्रों में चन्द्रमा श्रेष्ठ होता है, उसी तरह तीर्थों में प्रयाग सर्वोत्तम तीर्थ है।

यह माना जाता है की हिन्दू सनातन धर्म अनादि काल से रहा है, और यह भी माना जाता रहा है की प्रयागराज की महिमा का कोई आदि और अंत नहीं है। प्रयागराज की महिमा के विषय में कहा गया है कि- अपनी उत्कृष्टता के लिए यह प्रयाग है और अन्य सभी में प्रधानता के लिए यह राज शब्द से सुशोभित है। धर्म शास्त्रों में एक जगह वर्णन आता है कि प्रयागराज भूमि को उत्कृष्ट यज्ञ, दान-दक्षिणा आदि से संपन्न देखने के बाद श्रीहरि विष्णु और भगवान शंकर ने इस भूमि का नाम प्रयाग रखा। पावन तीर्थराज प्रयाग स्थली की महिमा का उल्लेख कई पुराणों और धर्म ग्रंथों में वर्णित हुआ है। सम्पूर्ण धरा पर एकमात्र यह ऐसा स्थान है जिसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाली स्थली कहा गया है। इसके विषय में यहाँ तक कहा गया है की प्रयाग सभी तीर्थों में सबसे श्रेष्ठ है।

प्रयाग की पावन धरा ऋषियों, मुनियों, प्राकृतिक सौंदर्य और जलधाराओं की धरा है। यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों पावन नदियाँ एक होकर बहती है। यहाँ की सकारात्मक ऊर्जा से भारतीय संस्कृति को बल मिलता रहा है।

प्रयागराज से सम्बंधित के पौराणिक मान्यता के अनुसार सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद, धन्यवाद हेतु यहाँ यज्ञ किया था। प्रथम यज्ञ का प्र और याग अर्थात यज्ञ से मिलकर प्रयाग बना और तभी से यह प्रयाग राज के नाम से विख्यात हुआ। एक अन्य मान्यता के अनुसार माघ माह में सारे तीर्थों का पुण्य प्रयाग में एकत्रित हो जाता है। इसीलिए इसे प्रयागराज की संज्ञा दी गई है।

प्रयाग स्नान के विषय में यह कहा गया है की यहां स्नान करने पर अश्वमेघ यज्ञ के समान फल मिलता है। अग्नि पुराण कहता है की यहां प्रतिदिन स्नान करने का पुण्य करोड़ों गायें दान करने से मिलने वाले पुण्य के बराबर है। एक अन्य पुराण इसके विषय में कहता है की यहाँ कुम्भ स्नान के फलस्वरूप जो फल मिलता है वह दस हजार या अधिक तीर्थों पर यात्रा के पुण्य से अधिक है। स्नानादि, दानादि और अन्य पुण्य कर्म करने के अलावा यहाँ मुंडन संस्कार कराना भी श्रेष्ठ माना गया है।

प्रयाग में स्नान के महत्व के विषय में मत्स्य पुराण में एक सन्दर्भ आता है जिसमें कहा गया है कि यहाँ पर स्नान करने वाले को दिव्य लोक की प्राप्ति होती है, उन्हें मोक्ष मिलता है। वहीं पदमपुराण कहता है की प्रयागस्थली देवताओं की यज्ञ स्थली है, इसे देवताओं द्वारा सम्मानित किया गया है। यहाँ किया गया दान करने वाले को अनंत फल की प्राप्ति होती है। कुम्भ मेले को भव्य बनाने में सम्पूर्ण भारत से आये 13 अखाड़ों के नागा बाबाओं की भूमिका विशेष होती है। प्रत्येक शाही स्नान में ये नागा बाबा सर्वप्रथम स्नान करते हैं। तत्पश्चात आमजन को स्नान की अनुमति होती है।

अखाड़ा मुख्य रूप से प्राचीन काल में भारत के साधु-सन्तों का एक ऐसा समुह होता था जो संकटकाल में राजधर्म के विरूद्ध परिस्थितियों में, राष्ट्ररक्षा और धर्मरक्षा के लिए कार्य करता था। इस कार्य के लिए अखाड़े के साधु अस्त्र विद्या का भी प्रयोग करते थे। ये 13 अखाड़े तीन मतों में बंटा हुआ है।

  • शैव संन्यासी सम्प्रदाय - इस सम्प्रदाय के पास 7 अखाड़े हैं भगवान शिव और उनके अवतारों को मानने वाले शैव कहे जाते हैं।
  • वैरागी सम्प्रदाय - इनके पास तीन अखाड़े हैं। भगवान विष्णु को इश्वर मानने वाले वैरागी सम्प्रदाय के अन्तर्गत आते हैं।
  • उदासीन सम्प्रदाय- इस सम्प्रदाय में भी तीन अखाड़े हैं। यह सिख साधुओं का सम्प्रदाय है। जिसकी शिक्षाएं सिख पन्थ से ली गयी है।
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कुम्भ के कर्मकाण्ड


कुम्भ महापर्व पर स्नान, दान, पुण्य, तीर्थवास, पापों से मुक्ति, मोक्ष आदि पारलौकिक सुख की कामनाओं से संपूर्ण विश्व से श्रद्धालु यहां एकत्रित होते हैं। कुम्भ महापर्व के समय प्रयागराज एक लघु भारत का स्वरूप प्राप्त करता है। इसमें दशनामी संन्यासी वर्ग, महन्त, महामण्डलेश्वर, वैष्णव, वैरागी, सन्त और विभिन्न अखाड़े, शंकराचार्य वर्ग, दण्डी संन्यासी, विरक्त सन्त, परमहंस, विभिन्न धर्म, पन्थ और संस्कृति के तपस्वी विद्वान, भक्तजन, अनुयायी तीर्थवास करते हैं। यहां यज्ञादि, वेद उपनिषद और पुरानों की चर्चा, सत्संग, भजन, कीर्तन, उपासना और भक्ति के विभिन्न मार्गों पर चिन्तन और प्रवचनों के माध्यम से धार्मिक जागृति की जाती है।

इसी भावना से ओतप्रोत होकर करोड़ों श्रद्धालु अमृत की त्रिवेणी में स्नान की डूबकी लगाते है। अमृत स्नान की कामना से देश और विश्व के कोने-कोने से विभिन्न संस्कृतियां इस आध्यात्मिक पर्व में भाग लेती है। वास्तव में कुम्भ स्नान देश और दुनिया के अपार जनसमूह का संगम स्थल कहा जा सकता है। यह स्नान पर्व विश्व पटल पर शान्ति, सांस्कृतिक विरासत, एकता और मिलन का प्रतीक है। इसके इसी महत्व को समझते हुए यूनेस्को ने कुम्भ पर्व को विश्व रूप में मान्यता देते हुए इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत माना है।


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