माघ मास स्नान - पुण्य और मोक्ष का मार्ग

By: Future Point | 14-Jan-2019
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माघ मास स्नान - पुण्य और मोक्ष का मार्ग

माघमासे गमिष्यन्ति गंगायमुनसंगमे।

ब्रह्माविष्णु महादेवरुद्रादित्यमरूद्गणा:।।

अर्थात

ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्य तथा मरूद्गण माघ मास में प्रयागराज के लिए यमुना के संगम पर गमन करते हैं।

प्रयागे माघमासे तुत्र्यहं स्नानस्य यद्रवेत्।

दशाश्वमेघसहस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि।।

अर्थात

प्रयाग में माघ मास के अन्दर तीन बार स्नान करने से जो फल होता है वह फल पृथ्वी में दस हज़ार अश्वमेध यज्ञ करने से भी प्राप्त नहीं होता है।

कार्तिक मास में एक हज़ार बार यदि गंगा स्नान करें और माघ मास में सौ बार स्नान करें, बैशाख मास में नर्मदा में करोड़ बार स्नान करें तो उन स्नानों का जो फल होता है वह फल प्रयाग में कुम्भ के समय पर स्नान करने से प्राप्त होता है।

माघे निमग्ना: सलिले सुशीते

विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।।

माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ-कहीं भी जल हो, वह गंगा जल के समान होता है। इस मास में शीतल जल के भीतर डुबकी लगाने वाले मनुष्य पाप मुक्त हो जाते हैं।

माह माह स्नान की विशेषता


पदम पुराण में माघ स्नान का महत्व बताते हुए महादेव जी ने कहा है कि चक्रतीर्थ में श्रीहरि का और मथुरा में श्रीकॄष्ण का दर्शन करने से मनुष्य को जो फल मिलता है, वही माघ मास में केवल स्नान करने से मिल जाता है। जो जितेंद्रिय, शांतचित्त और सदाचारयुक्त होकर माघ मास में स्नान करता हैं, वह फिर कभी संसार बंधन में नहीं पड़ता।

हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ माह वर्ष का एकादश माह हैं। इस मास में कल्पवास का विशेष महत्व है। यहां कल्पवास से अभिप्राय: इस समयावधि में संगम तट पर निवास करने से हैं।

कल्प अर्थात वेदो, यज्ञ और यज्ञादिक कर्म। कल्पवास का वर्णय हिन्दू पौराणिक धर्म ग्रंथों में कई बार मिलता है। एक मत के अनुसार कल्पवास की अवधि पौष शुक्ल एकादशी से शुरु होकर माघ शुक्ल द्वादशी पर्यंत तक एक मास तक का विधान है। एक अन्य मत के अनुसार पौष पूर्णिमा से शुरु होती है। पद्म पुराण के अनुसार माघ माह का आरम्भ पौष पूर्णिमा से ही माना जाता है। इस मास में स्नान करने वाले और मास स्नान के पुण्य का लाभ उठाने वाले व्यक्ति का सदाचारी, मन शांत और जितेन्द्रिय होना आवश्यक है। वास्तव में माघ मास में स्नान करने वाले व्यक्ति में संयम, अहिंसा एवं श्रद्धा होनी चाहिए, यही कल्पवास का मूल है।

पद्म पुराण के अतिरिक्त अन्य अनेक धर्म ग्रंथों में माघ मास के महत्व का वर्णन मिलता हैं। इसमें से कुछ का वर्णन इस प्रकार हैं-

  • कार्तिक मास में एक हज़ार बार यदि गंगा स्नान करें और माघ मास में सौ बार स्नान करें, बैशाख मास में नर्मदा में करोड़ बार स्नान करें तो उन स्नानों का जो फल होता है वह फल प्रयाग में कुम्भ के समय पर स्नान करने से प्राप्त होता है। यहां सभी स्नानों में कुम्भ स्नान को अधिक महत्व दिया गया है।
  • माघ शुक्ल चतुर्थी को उमा चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व के दिन व्रत का पालन किया जाता हैं और व्रती सफेद रंग के फूलों से देवी उमा का श्रृंगार और पूजन करना चाहिए। साथ ही उनको गुड़, लवण तथा जौ भी समर्पित किये जाते हैं। व्रती को सधवा महिलाओं, ब्राह्मणों तथा गौओं का सम्मान करना चाहिए।
  • माघ महीने की शुक्ल पंचमी से ही वसंत ऋतु का आगमन होता है।
  • माह मास में स्नान पर्व में स्नानी को विशेष पुण्य़ की प्राप्ति हेतु तिल चतुर्थी, रथसप्तमी एवं भीष्माष्टमी के व्रत का पालन करना चाहिए।
  • माघ कृष्ण द्वादशी को यम ने तिलों का निर्माण किया और दशरथ ने उन्हें पृथ्वी पर लाकर खेतों में बोया, तदनन्तर देवगण ने भगवान विष्णु को तिलों का स्वामी बनाया। अतएव मनुष्यों को उस दिन उपवास रखकर तिलों से भगवान का पूजन कर तिलों से ही हवन करना चाहिए। तदुपरान्त तिलों का दान कर तिलों को ही खाना चाहिए।
  • कुछ अन्य धर्म ग्रंथों के अनुसार माघ माह में स्नान और अन्य धर्म स्थलों पर स्नान में कोई अंतर नहीं माना गया है। इस विषय में अनेकामत सामने आते हैं।
  • सबसे शुभ पुण्य प्रदाता माघ स्नान गंगा तथा यमुना के संगम स्थल का माना जाता है।

माघ स्नान का शुभ मुहूर्त


माघ मास में सूर्योदय से पूर्व गंगाजी अथवा अन्य किसी पवित्र धारा में स्नान करना परम प्रशंसनीय माना जाता है। इसके लिए सर्वोत्तम काल ब्रह्म मुहूर्त है। जब नक्षत्र दर्शनीय रहते हैं। उससे कुछ कम उत्तम काल वह है जब तारागण टिमटिमा रहे हों। किन्तु सूर्योदय न हुआ हो। अधम काल सूर्योदय के बाद स्नान करने का है। माघ मास का स्नान पौष शुक्ल एकादशी अथवा पूर्णिमा से आरम्भ कर माघ शुक्ल द्वादशी या पूर्णिमा को समाप्त होना चाहिए। एक अन्य मत के अनुसार माघ स्नान संक्रांति से शुरु करना चाहिए, जब सूर्य माघ मास में मकर राशि पर स्थित हो। समस्त नर-नारी इस व्रत का पालन करने का अधिकार रखते हैं। सबसे महान् पुण्य प्रदाता माघ स्नान गंगा तथा यमुना के संगम स्थल का माना जाता है।

माघ शुक्ल सप्तमी स्नान विधि-विधान

माघ महीने की शुक्ल पंचमी से वसंत ऋतु का आरंभ होता है। माघ मास में कुछ महत्त्वपूर्ण व्रत होते हैं, यथा– तिल चतुर्थी, रथसप्तमी, भीष्माष्टमी।

माघ मेला


माघ स्नान हिन्दुओं की धार्मिक एवं सांस्कॄतिक विरासत का अद्भुत सामंजस्य है। प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम स्थाल पर लगने वाला माघ मेला संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है। हिन्दू पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति के पावन अवसर के दिन माघ मेला आयोजित होता है। इस अवसर पर संगम स्थल पर स्नान करने का बहुत मह्त्व है। प्रयागराज के माघ मेले की ख्याति पूरे विश्व में फैली हुई है।

माघ माह स्नान कथा


स्कंदपुराण के रेवाखंड में माघ माह के स्नान के महत्व को बताते हुए एक कथा का वर्णन आता है। कथा इस प्रकार हैं- प्राचीन काल में नर्मदा के तट पर शुभव्रत नाम के एक ब्राह्मण निवास करते थे। वे सभी वेद और शास्त्रों को अच्छे से समझते थे। उनका ज्ञान उनके स्वभाव के आगे कमजोर हो जाता था, उनका अधिक ध्यान धन संग्रह करने में अधिक रहता था। उन्होनें बहुत धन एकत्रित कर लिया था। वृद्धावस्था के दौरान उन्हें कई रोगों ने जकड़ लिया। इस परेशानी में पड़ने के बाद उन्हें पश्चताप होने लगा कि धन एकत्रित करने में उन्होनें अपना पूरा जीवन लगा दिया लेकिन परलोक सुधारने के लिए कोई शुभ काम नहीं किया। परलोक कैसे सुधारा जाए इस बात को लेकर वो चिंतित हो गए। सोचने के बाद उन्हें श्लोक याद आया जिसमें माघ स्नान की विशेषता बताई गई थी।

" माघे निमग्ना: सलिले सुशीते। विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।। "


इस श्लोक को याद करने के बाद उन्होनें माघ माह में स्नान करने का निर्णय लिया। माघ माह के आने के बाद वो नर्मदा में स्नान करने लगे। नौ दिनों तक लगातार पवित्र नदी नर्मदा में स्नान करने के बाद दसवें दिन उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई। शुभव्रत ने जीवन में कोई शुभ काम नहीं किया था लेकिन माघ माह में स्नान करने से उनके कर्म और मन इतने पवित्र हो गए कि मृत्यु के बाद बिना किसी परेशानी के बाद उनकी आत्मा को स्वर्ग की प्राप्ति हुई। जीवन के अंत में उन्हें शांति की प्राप्ति हुई। मान्यता है कि जो कोई इस महीने पवित्र स्थलों पर स्नान करते हैं उन्हें स्वर्ग में लाभ अवश्य मिलता है और पापों से मुक्ति मिलती है।

माघ स्नान माह पर्व की शुभ तिथियां


साथ ही इस मास की शुभ तिथियों को स्नान, व्रत और दान करने से सबसे अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त माघ माह में स्नान के अतिरिक्त इस माह अवधि में कुछ अन्य तिथियों का भी विशेष महत्व हैं -

21 जनवरी

- पौष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा- माघ माह स्नान पर्व का प्रारम्भ होगा और 19 फरवरी माघ पूर्णिमा स्नान तक यह पर्व रहेगा।

31 जनवरी

- षष्ठतिला एकादशी- स्नान एवं व्रत पालन- शास्त्रों में षष्ठतिला एकादशी के दिन का विशेष महत्व है। इस दिन काले तिल को जल में मिलकर स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन सबसे खास महत्व किसी पवित्र नदी में स्नान करने का है। साथ ही इस दिन दान का भी बहुत अधिक महत्व है। इस दिन गरीबों की बीच दान करने से दरिद्रता का नाश होता है।

14 जनवरी

- मकर संक्रांति - इस दिन ही सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के दिन स्नान और दान का सबसे अधिक महत्त्व है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन तिल युक्त जल से स्नान करने से जीवन के सारे पाप धुल जाते हैं। साथ ही इस दान पवित्र नदी में स्नान करने का भी बहुत अधिक महत्व है। इतना ही नहीं इस दिन दान का भी विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन तिल और गुड़ का दान करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन भोजन में तिल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

04 फरवरी

- माघी अमावस्या - माघी अमावस्या को कृष्णपक्ष की मौनी अमावस्या भी कहा जाता है। यह शुभ तिथि पितरों के तर्पण और दान के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन त्रिवेणी संगाम और गंगा तट पर स्नान करना चाहिए। स्नान के पश्चात् तिल, गुड़ इत्यादि का दान करना चाहिए।

09 फरवरी

- उमा चतुर्थी - माघ शुक्ल चतुर्थी 'उमा चतुर्थी' कही जाती है, क्योंकि इस दिन पुरुषों और विशेष रूप से स्त्रियों द्वारा सफेद रंग के फूलों तथा कुछ अन्य पुष्पों से देवी उमा का पूजन किया जाता है। पूजन के साथ ही उनको गुड़, लवण तथा जौ भी समर्पित किये जाते हैं। व्रती को सधवा महिलाओं, ब्राह्मणों तथा गौओं का सम्मान करना चाहिए।

10 फरवरी

- वसंत पंचमी - इस दिन ही विद्या और बुद्धि की देवी की पूजा होती है। इस दिन पवित्र जल से स्नान के बाद माता सरस्वती को केसरिया चावल का भोग लगाने से विशेष फल मिलता है।

12 फरवरी

- अचला सप्तमी- माघ शुक्ल सप्तमी को इस माघ शुक्ल सप्तमी व्रत का अनुष्ठान होता है। सूर्योदय से पूर्व मनुष्य को अपने सिर पर सात बरगद वृक्ष के और सात आक के वृक्ष के पत्ते रखकर किसी नदी अथवा सरोवर में स्नान करना चाहिए। तदनन्तर जल में सात बरगद के फल, सात आक के पत्ते, अक्षत, तिल, दूर्वा, चावल, चन्दन मिलाकर सूर्य को अर्ध्य देना चाहिए तथा उसके बाद सप्तमी को देवी मानते हुए नमस्कार कर सूर्य को प्रणाम करना चाहिए। इस दिन सूर्य को जल अर्पण करने और पूजा करने के विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन को स्नान-दान और पितरों को तर्पण करने से वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। मान्यता ऐसी भी है कि इस दिन व्रत रखने से साल भर किए गए रविवार व्रत के बराबर फल मिलता है।

17 फरवरी

- माघ कृष्ण द्वादशी- इस दिन यम ने तिलों का निर्माण किया और दशरथ ने उन्हें पृथ्वी पर लाकर खेतों में बोया, तदनन्तर देवगण ने भगवान विष्णु को तिलों का स्वामी बनाया। अतएव मनुष्यों को उस दिन उपवास रखकर तिलों से भगवान का पूजन कर तिलों से ही हवन करना चाहिए। तदुपरान्त तिलों का दान कर तिलों को ही खाना चाहिए।

16 फरवरी

- जाया एकादशी- इस दिन को भीष्म एकादशी भी कही जाती है। इस दिन सूर्यास्त के समय तुलसी के पास दीपक जलाने से साक्षात लक्ष्मी और विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रीय मान्यता है कि इस दिन स्नान-दान और पूजा से मनुष्य के सारे पाप कट जाते हैं।

19 फरवरी

- पूर्णिमा - इस दिन पवित्र नदी में स्नान कर गरीबों को दान करने से अत्यंत शुभ फल प्राप्त होते हैं। इस दिन चन्द्र ग्रहण भी पड़ेगा। अत: स्नान का फल दौगुना हो जाएगा।


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