नवरात्रि नवदेवी और दसमहाविद्याओं में क्या अंतर है? नवरात्रि में 10 महाविद्याओं को कैसे सिद्ध करें? | Future Point

नवरात्रि नवदेवी और दसमहाविद्याओं में क्या अंतर है? नवरात्रि में 10 महाविद्याओं को कैसे सिद्ध करें?

By: Acharya Rekha Kalpdev | 10-Apr-2024
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नवरात्रि नवदेवी और दसमहाविद्याओं में क्या अंतर है? नवरात्रि में 10 महाविद्याओं को कैसे सिद्ध करें?

नवरात्रि के नौ दिनों में जिन नौ देवियों का दर्शन पूजन किया जाता है, वह सभी देवियां नवदुर्गा / नवदेवी के नाम से जानी जाती है। माता पार्वती ही अलग अलग रूपों में नौ देवी होती है और वही दस रूपों में दस महाविद्या होती है। मूल रूप में नवदेवियों और दस महाविद्याओं में कोई अन्तर नहीं है। सभी एक ही देवी के विभिन्न रूप है। दस महाविद्या में देवी के अलग अलग दस रूपों की व्याख्या और उनकी आराधना की विधि, भोग, और प्रकृति का वर्णन किया गया है।

देवी पुराण के अनुसार अप्सरा, यक्षिणी, डाकिनी, शाकिनी और पिशाचिनी में सबसे अधिक जिस रूप का दर्शन पूजन किया जाता है वह देवी का रूप है। देवी रूप में माता सबसे अधिक सात्विक स्वरुप है। देवी स्वरुप का साधना, आराधना करना सबसे अधिक उत्तम माना गया है। भगवान् शिव कैलाशवासी है उनकी अर्धांगिनी देवी पार्वती देवी शक्ति का मूल रूप है। देवी पार्वती की दो संतानें है। देवी पार्वती पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री थी, उनका नाम सती था। देवी सती और देवी पार्वती दोनों एक ही देवी है। पूजा-साधना के माध्यम से हिन्दू धर्म में देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

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ऐसी मान्यता है कि दस महाविद्याओं के दस रूपों कि जो व्यक्ति नित्य नियम से आराधना करता है, उसके सारे काम सफल होते है। दस महाविद्याएं रोग, शोक और दुःख का निवारण करने वाली शक्तियां है। भूत प्रेत, पराशक्तियां, बुरी घटनाएं, गृह कलह, शनि कलह, बेरोजगारी और तनाव आदि दूर होते हैं। दस महाविद्याओं कि आराधना करने से संकट दूर होते है। दस महाविद्याओं कि साधना आराधना कल्प वृक्ष के समान कही गई है। इनकी पूजा से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।

उत्पत्ति कथा - कथा के अनुसार देवी सती प्रजापति दक्ष कि पुत्री थी। देवी सती ने पिता कि आज्ञा के बिना भगवान् शिव से विवाह किया। प्रजापति दक्ष ने अपने घर में यज्ञ किया और उसमें भगवान् शिव और देवी सती को आमंत्रित नहीं किया। यज्ञ कि जानकारी मिलने पर देवी सती ने जाने कि जिद कि और अपने दस शक्ति स्वरूपों का दर्शन भगवान् शिव को कराया। देवी शक्ति का ऐसा स्वरुप देख कर भगवान शिव भी घबरा गए है। देवी से उनके दस रूपों के बारे में भगवान् शिव ने पूछा तो देवी ने अपने दस रूपों के बारें में विस्तार से बताया।

यज्ञ में राजा दक्ष ने भगवान् शिव का अपमान किया जिससे दुखी होकर देवी सती ने हवन कि अग्नि में कूद कर जान दे दी। इस पर देवी सती ने यज्ञ में जाने की जिद कर ली। यज्ञ में अपना भाग लेने के लिए देवी सती हवन में गई और पति का अपमान होने पर यज्ञ में कूद कर देवी ने अपनी जान दे दी। एक कृष्ण रंग की काली है। नीले रंग वाली तारा है। पश्चिम में छिन्नमस्ता, उसके साथ में भुवनेश्वरी, उसके बाद में बगलामुखी, पूर्व में बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में धूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोड़शी हैं और भैरवी। इस प्रकार देवी सती ने अपने दस रूपों का परिचय भगवान् शिव को दिया। दस महाविद्याओं वास्तव में दस प्रकार की शक्तियां है। माता पार्वती ने इन्हीं दस स्वरूपों की शक्तियों का उपयोग दैत्यों और राक्षसों का वध करने के लिए किया था।

नवरात्रि में नौ देवियों का दर्शन पूजन करने का विधि विधान है। नवरात्रि में जिन नौ देवियों का पूजन किया जाता है वो है – 1 शैलपुत्री, 2 ब्रह्मचारिणी, 3 चंद्रघंटा, 4 कुष्मांडा, 5 स्कंदमाता, 6 कात्यायनी, 7 कालरात्रि, 8 महागौरी और 9 सिद्धिदात्री हैं और दस महाविद्याओं के नाम इस प्रकार है - 1 काली, 2 तारा, 3 त्रिपुरसुंदरी, 4 भुवनेश्वरी, 5 छिन्नमस्ता, 6 त्रिपुरभैरवी, 7 धूमावती, 8 बगलामुखी, 9 मातंगी और 10 कमला।

दस महाविद्याओं को उनके स्वरुप और प्रकृति के हिसाब से तीन वर्गों में बांटा गया है।
सौम्य वर्ग - देवी त्रिपुरसुन्दरी, देवी भुवनेश्वरी, देवी मातंगी, देवी कमला
उग्र वर्ग - देवी काली, देवी छिन्नमस्ता, देवी धूमावती, देवी बगलामुखी
सौम्य और उग्र मिश्रित वर्ग - देवी तारा और देवी त्रिपुर भैरवी है।

1 देवी काली मां

दस महाविद्या के स्वरुप और उनके मन्त्रों की जानकारी यहाँ दी जा रही है -

देवी काली - देवी काली, दस महाविद्याओं का पहला रूप है। इस रूप में देवी उग्र रूप में है और शक्ति का यह रूप जागृत है। दस महाविद्याओं में देवी काली सर्वोच्च स्थान रखती है। देवी काली का कभी भी किसी भी रूप में भूलकर भी अपमान नहीं करना चाहिए। महादैत्यों का वध करने के लिए देवी काली ने यह रूप लिया था। देवी काली को सिद्ध करने के लिए उग्र भाव के साथ साधना करने का विधि विधान है। देवी काली तुरंत प्रसन्न होने वाली और तुरंत नाराज होने वाली देवी है। इसलिए देवी काली की साधना किसी गुरु के सानिध्य में ही करनी चाहिए। अन्यथा नियमों में गलतियां होने की संभावना भी रहती है। देवी काली की साधना करने के लिए सात्विक जीवन शैली होनी आवश्यक है। देवी काली की पूजा में ब्रह्मचर्य का पालन और सात्विकता बहुत आवश्यक है। देवी काली को शांत करने के लिए भगवान् शिव को इनके चरणों में लेटना पड़ा था।

इनका एक नाम देवी कालिका है। देवी के हाथों में तलवार और त्रिशूल है। दिन शुक्रवार, तिथि अमावस्या, देवी ग्रंथ - कालिका पुराण है। मां काली के भी चार रूप है - दक्षिणा काली - जिसे देवी दक्षिणेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। शमशान काली, मातृ काली और महाकाली।

देवी कालिका का मंत्र - ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा

देवी काली ने कौन से राक्षसों का वध किया था - रक्तबीज और महिषासुर।

देवी कालिका के तीन प्रमुख धर्म स्थल है - कालीघाट, गढ़कालिका, महाकाली ये दिन मंदिर देवी काली शक्ति के जागृत मंदिर है। देवी काली को प्रसन्न करने के लिए हकीक की माला पर ऊपर दिए गए मंत्र का 9 माला जाप नित्य करना चाहिए।

2 देवी तारा मां

दस महाद्विद्याओं में मां काली के बाद अगली मां तारा मां है। मां तारा तंत्र विज्ञानं की देवी है। और तांत्रिक के द्वारा इनकी पूजा प्रमुखता के साथ की जाती है। मां तारा अपने नाम के अनुसार अपने भक्तों को फल देती है। देवी तारा को तारने वाली देवी कहा गया है। देवी काली की तरह ही देवी तारा के भी तीन रूप है- तारा, एकजटा और नील सरस्वती जी। देवी तारा का रंग कृष्ण है। और देवी तारा की सबसे पहले आराधना महर्षि वशिष्ठ जी ने की थी। देवी तारा शत्रुओं का नाश करने वाली देवी है। देवी तारा की साधना रूप, सौंदर्य और ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए भी की जाती है। इसके साथ ही देवी तारा की आराधना करने से आर्थिक उन्नति, लाभ, भोग और मोक्ष देने वाली देवी है।

तारापीठ बंगाल में देवी सती के नयन गिरे थे। इसलिए तारापीठ को नयन तारा पीठ के नाम से भी जाना जाता है। महर्षि वशिष्ठ जी ने देवी तारा की साधना की थी, साधना से प्रसन्न होकर देवी ने वशिष्ठ जी को सिद्धियां प्रदान की थी। हिन्दू धर्म में दस महाविद्याओं की देवियों का बहुत महत्व् है। हिमाचल में भी देवी तारा का एक अन्य प्रसिद्द मन्दिर है। देवी तारा की साधना के लिए नीले कांच की गोलियों की माला लें, निम्न मंत्र का नित्य 12 माला जाप करें।

देवी तारा मंत्र - ऊँ ह्नीं स्त्रीं हुम फट

देवी तारा की साधना और आराधान मुख्य रूप से चैत्र मास की नवमी तिथि के दिन की जाती है। इसके अतिरिक्त शुक्ल पक्ष में भी देवी तारा की पूजा करने का विधि विधान है। सिद्धि प्राप्ति के लिए देवी तारा की पूजा विशेष रूप से की जाती है। देवी तारा तुरंत प्रसन्न होने वाली देवी है। जो भी साधक मन से देवी को साधता है, उसके मन की सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है।

3 मां त्रिपुर सुंदरी

10 महाविद्याओं में तीसरी देवी मां त्रिपुर सुंदरी है। देवी त्रिपुर सुंदरी स्वयं में विशेष है। इनके तीन नेत्र और चार हाथ है। मां त्रिपुर सुंदरी के अनेक नाम है- देवी ललिता, देवी राज राजेश्वरी और त्रिपुर सुंदरी के नाम से यह देवी जानी जाती है। मां त्रिपुर सुंदरी सोलह कलाओं से युक्त होने के कारण देवी षोडसी के नाम से भी जानी जाती है। त्रिपुरा राज्य में देवी त्रिपुर सुंदरी का विशेष मंदिर है। ऐसा माना जाता है की यहाँ देवी सती के वस्त्र गिरे थे। त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ भारत के ५२ शक्तिपीठों में से एक है। त्रिपुर सुंदरी देवी के भी कई रूप है - त्रिपुरा भैरवी, त्रिपुरा, त्रिपुर सुंदरी। प्रमुख है।

देवी त्रिपुर सुंदरी को प्रसन्न करने के लिए रुद्राक्ष माला पर 10 माला निम्न मंत्र का जाप करें।

देवी त्रिपुर सुंदरी का मन्त्र - ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:

4 देवी भुवनेश्वरी मां

10 महाविद्याओं की चौथी देवी भुवनेश्वरी मां है। मां भुवनेश्वरी देवी को आद्या शक्ति के नाम से भी जाना जाता है।

देवी भुवनेश्वरी को शताक्षी और शाकम्भरी के नाम से भी प्रसिद्द है। देवी भुवनेश्वरी का यह स्वरुप सौम्य है। देवी अपने भक्तों को अभयदान देने वाली और सिद्धियां देने वाली देवी है। देवी भुवेश्वरी की पूजा विशेष रूप से पुत्र रत्न प्राप्ति के लिए भी की जाती है। देवी भुवनेश्वरी की साधना से तेज और ऊर्जा प्राप्त होती है। देवी कृपा से धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
देवी भुवनेश्वरी की आराधना स्फटिक माला पर 9 माला निम्न मंत्र का जाप कर की जा सकती है -

देवी भुवनेश्वरी मंत्र - ह्नीं भुवनेश्वरीयै ह्नीं नम:

5 देवी छिन्नमस्तिका मां

10 महाविद्याओं में पांचवी देवी, छिन्नमस्तिका मां है। देवी का स्वरुप अपने नाम के अनुरूप है। देवी कबंध रूप में है और उनका सिर स्वयं उनके हाथों में है। उनके कबंध (बिना धड़ के सिर से) रक्त की तीन धाराएं बह रही है। देवी छिन्नमस्तिका की तीन आँखें और चार हाथ है। देवी अपने पैरों से कामदेव और रति को रोंध रही है। देवी उग्र रूप में है, देवी के आसपास उनकी दो भक्त है।

देवी छिन्नमस्तिका के गले में मुंडमाला है और यज्ञोपवीत है। देवी छिन्नमस्तिका का स्वरुप गोपनीय है। इनकी साधना भी गोपनीय है। संध्या काल में देवी छिन्नमस्तिका की आराधना करने से साधक को देवी सरस्वती जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। देवी छिन्नमस्तिका देवी को पलाश के फूल और बेलपत्र अर्पित किये जाते है। देवी का आशीर्वाद प्राप्त होने पर साधक की बुद्धि और लेखन क्षमता में वृद्धि होती है। देवी छिन्नमस्तिका की पूजा करने से रोग, शोक सदैव के लिए दूर होते है। सभी शत्रु शांत रहते है और साधक को योग, ध्यान और साधना में सफलता मिलती है। छिन्नमस्तिका देवी को प्रसन्न करने के लिए रुद्राक्ष माला पर निम्न मंत्र का 10 माला जाप नित्य करना शुभ रहता है।

छिन्नमस्तिका मंत्र - श्रीं ह्नीं ऎं वज्र वैरोचानियै ह्नीं फट स्वाहा

6 देवी त्रिपुर भैरवी मां

देवी त्रिपुर भैरवी की साधना उपासना से साधक जीवन के सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। देवी त्रिपुर भैरवी बंधनों से मुक्त करने वाली देवी है। देवी त्रिपुर भैरवी के अनेक स्वरुप है। जिसमें से कुछ नाम - त्रिपुरा भैरवी, सिद्ध भैरवी, कामेश्वरी देवी, भद्र भैरवी आदि। देवी त्रिपुर भैरवी मां की चार भुजाएं और तीन नेत्र है। देवी को त्रिपुर षोडशी के नाम से भी जाना जाता है। देवी षोडशी श्रीविद्या के नाम से प्रसिद्द है। देवी त्रिपुर भैरवी मां की साधना करने से मुक्ति मिलती है। देवी जल, थल और नभ तीनों स्थानों में व्याप्त है। देवी की आराधना करने से आराधक धनी होकर ऐश्वर्य का भोग करता है। आजीविका, भाग्य और स्वास्थ्य के लिए देवी त्रिपुर भैरवी मां की पूजा की जाती है। मनोवांछित जीवन साथी पाने के लिए देवी त्रिपुर भैरवी की आराधना की जाती है। देवी त्रिपुर भैरवी मां की पूजा करने वाला कभी भी कष्ट में नहीं रहता है। देवी त्रिपुर भैरवी मां का साधना मूंगे की माला से 15 माला जाप करने पर सिद्ध मानी जाती है।

देवी त्रिपुर भैरवी मां मंत्र - ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:

7 देवी धूमावती मां

10 महाविद्याओं में देवी धूमावती मां का क्रम 7 वां है। देवी धूमावती मां स्वामी रहित होने के कारण विधवा रूप में है। देवी धूमावती की साधना करने से साधक साहसी और निडर बनता है। यह देवी आत्मबल भी बढ़ाती है। देवी ढंकावती मां की शक्ति से साधक को ख्याति की प्राप्ति होती है। देवी धूमावती अपने साधक के रोग, अरिष्ट और सहत्रुओं का नाश करती है। देवी को ऋग्वेद में सुखपूर्वक तारने वाली देवी कहा गया है। देवी की आराधना में घी में तिल मिलाकर हवन किया जाता है। देवी धूमावती की आराधना करने वाले साधक को नियम, संयम और सत्यनिष्ठा से रहना चाहिए। साधक को शराब और मांस से आजीवन दूरी रखनी चाहिए। देवी धूमावती की साधना मोती की माला पर निम्न मंत्र का नौ माला जाप कर की जाती है।

देवी धूमावती का मन्त्र - ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:

8 देवी बगलामुखी मां

देवी बगलामुखी मां की आराधना मुख्य रूप से शत्रुओं को शांत करने के लिए और युद्ध में सफलता अर्जित करने के लिए की जाती है। देवी बगलामुखी का उल्लेख महाभारत काल में भी मिलता है। द्वापर युग में भगवान् श्रीकृष्ण जी और अर्जुन ने देवी आराधना की थी। देवी बगलामुखी मां की पूजा वाकसिद्धि और शत्रुओं से भय मुक्ति के लिए की जाती है। भगवान् श्रीकृष्ण जी के अतिरिक्त सप्तऋषियों ने भी देवी बगलामुखी मां की आराधना की थी। देवी कोर्ट कचहरी के मामलों में सफलता दिलाने, विरोधियों को शांत करने, और हर प्रकार के शत्रु को परास्त करने के लिए देवी बगलामुखी मां की पूजा की जाती है। देवी पूजन से कुछ ही दिनों में साधक शत्रुरहित होकर प्रसन्नचित हो जाता है। देवी बगलामुखी की आराधना हल्दी या पीले रंग के कांच की माला पर निम्न मंत्र का ८ माला जाप करने से पूर्ण होती है।

देवी बगलामुखी मंत्र - ॐ ह्नीं बगुलामुखी देव्यै ह्नीं ॐ नम:

9 देवी मातंगी मां

10 महाविद्याओं में देवी मातंगी मां नवीं महाविद्या देवी है। मतंग भगवान् शिव का नाम है। देवी मातंगी मां भगवती का ही एक रूप है। देवी मातंगी मां दोषों का संहार करने वाली और साधकों का कल्याण करने वाली देवी है। यह देवी अपने साधकों को मनचाहा वरदान देती है। गृहस्थ जीवन की परेशानियों को दूर करने के लिए देवी मातंगी की साधना की जाती है। देवी मातंगी मां की जयंती अक्षय तृतीया तिथि पर होती है। देवी मातंगी कृष्ण वर्ण की है और देवी ने चंद्र को धारण किया हुआ है। देवी वाग्देवी के ही पूरक देवी मां मातंगी को माना गया है। देवी मातंगी का दर्शन पूजन करने से आकर्षण शक्ति की वृद्धि होती है। मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करने पर खेल, कला और संगीत में प्रवीणता प्राप्त होती है। इसके साथ ही देवी वशीकरण सिद्धि देने का सामर्थ्य रखती है। देवी मातंगी मां की साधना करने के लिए स्फटिक माला पर निम्न मंत्र का 12 माला जाप करने का विधि विधान है।

देवी मातंगी मां मंत्र - ॐ ह्नीं ऐ भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:

10 देवी कमला मां

10 महाविद्याओं में 10 वीं देवी है। देवी कमला मां देवी लक्ष्मी का ही स्वरुप है। देवी कमला गरीबी, गृह कलह और अशांति को दूर करती है। देवी कमला की साधना आराधना करने से साधक को धन धान्य और सुख समृद्धि आदि की किसी भी प्रकार की कमी नहीं रहती है। देवी कमला महाविद्या में मां कमल पर आसीन है। मां कमला के हाथों में भी कमल है। देवी कमला जी की साधना अपने आराधक को समृद्धि, धन, संतान, पत्नी और सभी सुख प्रदान करने वाली देवी है। देवी कमला की आराधना जल में आकंठ तक डूब कर की जाती है। देवी आराधना से अकूत धन की प्राप्ति होती है।

देवी कमला मां की आराधना निम्न मन्त्र कमलगट्टे की माला पर नित्य 10 माला जाप करने से होती है।

देवी कमला मां मंत्र - हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:


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