सप्तम नवरात्र की देवी - माता कालरात्रि, कथा, मंत्र और पूजा विधि

By: Acharya Rekha Kalpdev | 01-Apr-2024
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सप्तम नवरात्र की देवी - माता कालरात्रि, कथा, मंत्र और पूजा विधि

नवरात्र का सातवां दिन देवी कालरात्रि को समर्पित है। देवी कालरात्रि रूद्र रूप में है, देवी का यह रूप बहुत भयानक और क्रोध वाला है। देवी कालरात्रि अपने नाम के अनुरूप फल देती है। माता कालरात्रि काल का संहार करने वाली है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी आदिशक्ति के नौ रूपों का दर्शन-पूजन किया जाता है। सातवें दिन की देवी माता कालरात्रि काली मां के नाम से भी जानी जाती है। सातवें नवरात्र के दिन साधक का साधना चक्र सहस्त्र चक्र में स्थित होता है।

देवी कालरात्रि रूप में माता बहुत ही भयानक स्वरुप धारे हुए है। देवी साधकों की सभी मनोकामनाएं देवी कालरात्रि के दर्शन पूजन से पूरी होती है। देवी इस रूप में काले रंग में है,काले रंग में होने के कारण इन्हें काली माता का नाम भी प्राप्त है। इनके केश भी काले और लम्बे, घने है। जो चारों और बिखरे हुए है। देवी कालरात्रि की चार भुजाएं है, जिसमें एक भुजा वरदमुद्रा में है। एक अन्य हाथ उनका अभय मुद्रा में है। उनके एक हाथ में खडग, और तलवार है। दुष्टों और असुरों के लिए देवी काल समान है। खडग और तलवार से देवी असुरों का संहार करती है। देवी कालरात्रि रंग और वेश में भगवन शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप में तांडव करती दृष्ट हो रही है। माता गले में मुंडमाला धारण किये हुए है।

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क्रोध में लाल बड़े बड़े नेत्र है जो आकाश की तरह फैले हुए है। नेत्रों से क्रोध के कारण लाल रंग की ज्वाला निकलती हुई प्रतीत हो रही है। देवी के सांस छोड़ने और लेने पर अग्नि की ज्वालायें निकल रही है। देवी के इस रूप को देख कर कोई भी डर जाएगा। इस भयानक और रूद्र रूप को देख कर दानव सभी भयभीत रहते है। देवी इस रूप में दुष्टों का नाश करती है और साधकों का कल्याण करती है। इनके रूप को देख का देव और दानव सभी डरते है। देवता भी देवी के इस रूप का सामना नहीं कर सके थे। पर साधकों के लिए देवी उनके रोग, कष्ट और शत्रुओं का संहार करती है।

माता कालरात्रि अनेक नामों से जानी जाती है। माता का एक नाम शुम्भकारी, महायोगीश्वरी और महायोगिनी भी है। भले ही देवी का रूप भयानक और रौद्र है, फिर भी माता अपने भक्तों का कल्याण करने में किसी भी प्रकार की कमी नहीं करती है। देवी कालरात्रि की आराधना आराधक को निर्वाण के निकट लाने का कार्य करती है। कालरात्रि के रूप में देवी गर्दभ की सवारी करती है। माता इस रूप में डरावनी अवश्य लगती है, परन्तु देवी अपने भक्तों को तारने वाली है।

देवी काली की उपासना तंत्र क्रियाओं और शत्रुओं को रोकने के लिए भी की जाती है। देवी काली के भक्त गृहस्थ भी है और तंत्र क्रियाओं के जानकारों के लिए भी काली देवी का उपासना बहुत उत्तम कही गई है। तंत्र सिद्धियां पाने के लिए जो भक्त देवी काली का उपासना करते है, उन्हें, किसी गुरु के सानिध्य में ही यह कार्य करना चाहिए। नौ देवियों की आराधना का पर्व नवरात्रि देवी आराधना का पर्व है। नवरात्रि में देवी पूजा दिन और रात्रि दोनों समय की जा सकती है कालरात्रि माता के आराधना के लिए रात्रि का समय भी प्रयोग किया जा सकता है। रात्रि १२:०० की पूजा को विदेश बताया गया है। यदि आप को तंत्र की जानकारी नहीं है तो आप को तंत्र क्रियाओं को करने से बचना चाहिए। पूर्ण जानकारी होने पर ही तंत्र क्रियाओं को करना सही रहता है।

जिन लोगों के परिवार में अकाल मृत्यु होती रहती हो, या हुई हो, उन लोगों को कालरात्रि देवी की पूजा करने से लाभ मिलता है। देवी काली की उपासना से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। तंत्र और मन्त्र में सिद्धियां प्राप्त करने के लिए देवी कालरात्रि की आराधना करना शुभ कहा गया है। माता कालरात्रि का एक नाम निशा रात्रि भी है। कालरात्रि असुरों का संहार करती है। दुष्ट व्यक्तियों को असुरों से डरना चाहिए। जो भक्त माता की पूर्ण विश्वास और आस्था से पूजा करता है, उसके सभी कार्य पूर्ण होते है। देवी कृपा से साधक के सभी मनोरथ सिद्ध होते है। देवी कालरात्रि की पूजा करने से पराशक्तियों, तांत्रिक क्रियाओं, टोटकों और आसुरी शक्तियों का प्रभाव समाप्त होता है। कोर्ट, कचहरी, शत्रु, विरोधी, और रोग-शोक का भी देवी रोकथाम लगती है।

माता कालरात्रि जन्म कथा

पौराणिक कथा के अनुसार शुम्भ, निशुम्भं, रक्तबीज नाम के असुरों ने एक बार आतंक मचा रखा था। असुरों से परेशान होकर, देवता भगवन शिव के पास पहुंचे। देवताओं की विनती सुनकर भगवन शिव के अर्धांग्नी देवी पार्वती जी ने देवी दुर्गा का रूप लिया और असुर शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज का संहार किया। रक्तबीज का रक्त जहाँ जहाँ भूमि पर गिरा, वहां वहां नए रक्तबीज उत्पन्न हो गए। इस पर देवी दुर्गा का क्रोध और बढ़ गया। क्रोध के कारण देवी का रंग श्यामल हो गया। इसी श्यामल रंग से देवी काली का जन्म हुआ। देवी कालरात्रि ने एक बार फिर से रक्तबीज को मारा और उसके शरीर से निकलने वाली रक्त को देवी अपने मुंह में लेती रही। रक्त की एक भी बूँद धरा पर नहीं गिरी, इस प्रकार रक्तबीज और अन्य असुरों का अंत हो गया। इसी कारण माता का एक नाम शकुम्भरी भी है।

मां कालरात्रि को क्या भोग लगना चाहिए?

सप्तम नवरात्रि में देवी को गुड़ और गुड़ से बनी वस्तु मालपुआ आदि का भोग लगाना चाहिए। गुड़ से बनी वस्तुओं का भोग पाकर देवी काली प्रसन्न होती है और अपने साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती है। पूजा एक देवी को गुलदाउदी के फूलों की माला भेंट स्वरुप चढ़ाएं।

देवी कालरात्रि की पूजा विधि

सातवें नवरात्र पर देवी पूजन का प्रारम्भ करने से पहले यह सुनिश्चित कर लें, कि साधक स्नान आदि कर शुद्ध हो, और स्वच्छ वस्त्र धारण किये हुए हो। देवी काली की पूजा करते समय एक पहले पूजा में प्रयोग किये हुए फूल चौकी से हटा दे। दीपक में तेल और बत्ती बदल दें। अपने बैठने के लिए लाल कम्बल का आसन प्रयोग करें। प्रतिमा और चौकी के आसपास गंगाजल का छिड़काव करें। देवी के सम्मुख घी के तेल का दीपक जलाएं। देवी को गुड़हल के फूलों कि माला पहनाएं। साथ ही देवी को रोली, अक्षत, और फूल अर्पित करें। अग्यारी (हवन अग्नि) में लौंग, बताशे, गुग्गल, हवन सामग्री अर्पित करें। देवी को मालपुआ का भोग लगाए, और हवन अग्नि में भी कुछ भोग अर्पित करें।

कपूर जलाकर देवी की आरती करें, और देवी के जयकारे लगाएं। नवरत्रि में दुर्गा चालीसा और दुर्गा कवच का पाठ वैसे तो नित्य ही करना चाहिए, फिर भी सप्तमी तिथि को दुर्गा चालीसा का पाठ अवश्य करें। देवी दुर्गा के मन्त्रों का जाप भी इस दिन विशेष रूप से किया जा सकता है। मन्त्र जाप के लिए रक्त चन्दन की माला का प्रयोग करने, अन्यथा, रुद्राक्ष की माला का जाप भी किया जा सकता है।

माता कालरात्रि के मंत्र , स्तुति, प्रार्थना

माता कालरात्रि का मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः
माता कालरात्रि का अन्य मन्त्र
ॐ कालरात्र्यै नम:


माता कालरात्रि का ध्यान

करालवन्दना घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिम् करालिंका दिव्याम् विद्युतमाला विभूषिताम्॥
दिव्यम् लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयम् वरदाम् चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम्॥
महामेघ प्रभाम् श्यामाम् तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवम् सचियन्तयेत् कालरात्रिम् सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

माता कालरात्रि का स्तोत्र

हीं कालरात्रि श्रीं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

माता कालरात्रि का कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयम् पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततम् पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनाम् पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशङ्करभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

माता कालरात्रि की प्रार्थना

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा।
वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

माता कालरात्रि की स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

माँ कालरात्रि का स्तोत्र -

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

देवी कालरात्रि के कवच -

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥


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