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वास्तु शास्त्र में ग्रहों की भूमिका का महत्व

वास्तु शास्त्र में ग्रहों की भूमिका का महत्व

By: Future Point | 14-Jun-2018
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सामान्य तौर पर हम देखते हैं, मकान का निर्माण कराना भी स्वयं के अनुकूल ग्रह-स्थिति के कारण ही संभव हो पाता है। समान आय-व्यय वाले दो व्यक्तियों में केवल एक ही स्वयं का मकान बना पाता है, दूसरा नहीं, क्यों? कुछ व्यक्ति पुश्तैनी मकान-जमीन भी बेच डालते हैं। कुछ का जीवन, किराये के मकानों में ही व्यतीत हो जाता है। कुछ व्यक्तियों को बना-बनाया मकान धनादि मिल जाता है। कुछ व्यक्ति दूसरों के सहयोग या कर्ज से मकान बना पाते हैं। स्पष्ट है कि यह सब हमारे ग्रहों एवं उनकी अनुकूलता और प्रतिकूलता पर शत प्रतिशत निर्भर करता है।

जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव से भूमि- भवन एवं संपदा आदि के बारे में ज्ञात किया जाता है। द्वितीय (धन) भाव, दशम (कर्म) भाव और भावेश, लग्न और लग्नेश की कुंडली में स्थिति और अन्य ग्रहों, राशियों आदि के साथ उनके संबंधों आदि के अध्ययन से इस बात की जानकारी प्राप्त की जा सकती है कि किस व्यक्ति का मकान किस प्रकार का बनेगा? क्या व्यक्ति कर्ज लेकर मकान बनायेगा?व्यक्ति गृह-स्वामित्व का सुख प्राप्त कर पायेगा या नहीं?

गृह-सुख योग के सूत्र:

गृह (घर/मकान) का कारक मंगल, धन का कारक चंद्र एवं संपदा का कारक शुक्र को माना गया है। इन ग्रहों की शुभत्व की स्थिति बताती है कि किन स्थितियों में व्यक्ति बिना किसी रूकावट और कष्ट के मकान सुख पाएगा या विपरीत स्थिति में व्यक्ति गृह-सुख से वंचित रहेगा, चाहे वह कितना भी कर्म क्यों न कर ले।

  • चतुर्थेश केंद्र अथवा त्रिकोण में शुभ ग्रहों की दृष्टि-युति के साथ बैठा हो।
  • चतुर्थ एवं चतुर्थेश, लग्न एवं लग्नेश, मंगल एवं शुक्र की कुंडली में शुभ स्थिति हो, तो व्यक्ति को उत्तम गृह-सुख प्राप्त होता है।
  • चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह हो, चतुर्थेश किसी शुभ ग्रह के भाव में शुभ स्थिति में बैठा हो तथा मंगल व शुक्र की स्थिति भी कुंडली में सुदृढ़ स्थिति में होने से उत्तम गृह तथा उत्तम वाहन का योग बनता है।
  • चंद्र, शुक्र, चतुर्थ भावस्थ हों, इनमें से कोई एक ग्रह उच्च राशिस्थ भी हो, चतुर्थेश केंद्र या त्रिकोणस्थ हो, शुभ भी हो। यदि मंगल भी सुदृढ़ स्थिति में हो तो जातक को विशाल भूखंड का स्वामी बनाता है। ऐसा जातक मकान के मामले में अत्यंत सुखी होता है।
  • लग्नेश व चतुर्थेश में स्थान परिवर्तन हो, तो व्यक्ति अपने श्रम की कमाई से मकान बनवाता है। यदि ये दोनों किसी भी भाव में युति करें तो भी गृह का सुख प्राप्त होता है।
  • यदि चतुर्थेश एवं राज्येश त्रिकोण भाव अथवा केंद्रस्थ होकर शनि एवं मंगल के साथ युति करते बैठे हों तो ऐसा व्यक्ति कई भवनों का स्वामी होता है। वह व्यावसायिक परिसर भी बनाता है।
  • यदि लग्नेश एवं सप्तमेश, चतुर्थ भावस्थ हों, साथ ही उनपर शुभ ग्रहों की दृष्टि भी हो तो जातक को बिना परिश्रम किये ही भवन का सुख विरासत में मिलता है। कभी-कभी ऐसे जातक को दहेज के रूप में भी भवन प्राप्त होता है।
  • यदि द्वितीयेश एवं द्वितीय भाव, षष्ठ भाव और उसके स्वामी ग्रह का संबंध हो, तो जातक कर्ज लेकर घर बनाता है।
  • यदि लग्नेश एवं चतुर्थेश एक ही भाव में युति करें तो व्यक्ति को अचानक ही भवन का स्वामी बना देता है।

भवन निर्माण-काल:

जिस समय व्यक्ति को अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ लगे, व्यक्ति को विंशोत्तरी दशा के माध्यम से जिस ग्रह की महादशा चल रही हो, उसी ग्रह की राशि को लग्न मानकर उसे लग्न-कंुडली एवं चतुर्थांश कुंडली में देखना चाहिए। यदि चतुर्थ भाव अथवा मंगल से उसका किसी प्रकार का संबंध बन रहा हो तो उस दशाकाल में व्यक्ति का मकान बनेगा अन्यथा नहीं। मारक ग्रह की दशा मकान को तोड़ने अथवा बेचने वाली होती है। यदि कुंडली में चतुर्थ भाव, उसका स्वामी और संपदा कारक ग्रह मंगल व शुक्र कमजोर हों, अस्त अथवा दुष्प्रभावित हों तथा दुःस्थानों (6-8-12) में स्थित हों, तो जातक के गृह-निर्माण संबंधी प्रयास असफल रहते हैं।

गृह नाश योग:

यह विषय भी अत्यंत आवश्यक है कि घर तो बना लिया या किसी तरह से गृह हो भी गया तो, क्या हम अपने मकान भूमि आदि को सदैव बनाये रख सकते हैं, क्या?

  • चतुर्थेश यदि द्वादश भाव में अशुभ ग्रहों के साथ हो या अशुभ ग्रहों की उस पर दृष्टि हो, तो व्यक्ति का बनाया गया मकान बिक जाता है।
  • चतुर्थेश जिस भाव में बैठा हो, यदि उस भाव का स्वामी नवांश कुंडली में 12वें भाव में स्थित हो तो जातक अपना मकान गंवा देता है।
  • लग्नेश पंचम अथवा दशम भाव में होने पर व्यक्ति अपना घर-सम्पदा त्यागकर, वैरागी बन जाता है।
  • यदि लग्नेश राहु या केतु के साथ युत हो, तो मकान को आग का भय होता है।
  • यदि अष्टमेश अपनी ही राशि में बैठा हो तथा उस पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो या अष्टमेश सूर्य, शनि अथवा चंद्र के साथ युति करे तो जातक के मकान का विनाश हो जाता है।
  • यदि कुंडली में द्वितीयेश, षष्ठेश, सप्तमेश तथा भाग्येश स्वगृही हो और उन पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो, तो जातक अपना मकान बेच डालता है।
  • यदि सूर्य, शनि, बुध, मंगल में से कोई भी तीन ग्रह एक साथ चतुर्थ भाव में स्थित हों तो जातक विरासत में मिली हुई संपत्ति भी नष्ट कर डालता है।

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