Baisakhi 2024: बैसाखी पर्व और खालसा पंथ का सम्बन्ध, खालसा पंथ की स्थापना कैसे हुई? पंच प्यारे कौन थे?

By: Acharya Rekha Kalpdev | 12-Mar-2024
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Baisakhi 2024: बैसाखी पर्व और खालसा पंथ का सम्बन्ध, खालसा पंथ की स्थापना कैसे हुई? पंच प्यारे कौन थे?

Baisakhi 2024: बैसाखी का त्यौहार नई फसल, उमंग और तरंग का पर्व है। वैसे तो बैसाखी पूरे उत्तर भारत का प्रमुख पर्व है। वैशाखी का पर्व विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा राज्य में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों में बैसाखी की धूम देखी जा सकती है। बैसाखी त्यौहार किसान और कृषि से जुड़ा पर्व है। इस त्यौहार पर नई फसल घर आने के बाद ख़ुशी मनाने का पर्व है। हर साल बैसाखी पर्व 14 अप्रैल के आसपास मनाया जाता है। इस वर्ष बैसाखी पर्व 13 अप्रैल, 2024, शनिवार को मनाया जाएगा।

वैशाखी पर्व कई नामों से जाना जाता है। कुछ लोग बैसाखी, वैशाखी और बाशाखी, वशाखी, पंजाबी नववर्ष इसके नाम हैं। देश के दूसरे हिस्सों में बैसाखी को नबा बरशा के नाम से जाना जाता है। तमिलनाडू में जाकर इसका नाम पूंथाडु हैं। असम में बैसाखी को बिहू, बिहुइन नाम से जाना जाता है। बंगाल में बैसाखी को पोइला कहा जाता है। केरल में बैसाखी को विशु के नाम से विख्यात है।

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बैसाखी पर्व का ऐतिहासिक महत्व

सिखों के लिए बैसाखी पर्व इसलिए भी महत्व रखता है क्योंकि वर्ष 1699 में इसी दिन सिखों के दशवें गुरु श्रीगुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगलों के अत्याचारों से बचने के लिए आंनदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना के थी। इसके अलावा 1875 में आर्य समाज के प्रवर्तक श्री दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना की थी। बौद्ध धर्म के लिए भी बैसाखी महत्त्व रखती है। बेखाशी एक दिन ही बौद्ध पंथ के प्रवर्तक भगवान् बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। 

बैसाखी पर्व पर ढोल नगाड़ों के साथ नाचने गाने की परम्परा है। सिख समुदाय में इस दिन विशेष उत्साह और प्रसन्नता रहती है। गुरुद्वारों को भी बैसाखी के अवसर पर रोशनी से सजाया जाता है। विशेष प्रार्थना और पाठ की व्यवस्था की जाती है। इस अवसर पर लोग एक दूसरे के घर जाकर, एक दूसरे को नए साल और बैसाखी की बधाइयाँ देते है। साथ ही त्यौहार पर बनाये गए व्यंजनों का परिवार के सभी सदस्य साथ में बैठकर आनंद लेते है।

बैसाखी पर्व मुख्य रूप से पकी फसल के घर आने का उत्सव है। साथ ही इस दिन सिख पंथ के 10वें गुरु श्री गोविन्द जी ने पंच प्यारे और खालसा पंथ की स्थापना कर सिख पंथ को एक नया स्थान दिया था। इन्हें ही गुरु पंथ, पंच प्यारे और गुरु अवतार का नाम भी दिया गया था। खालसा पंथ सिखों के धर्म चिन्ह और गुरु नानक जी के दवारा बताएं गए आदर्शों की स्थापना के लिए खालसा पंथ कार्य करता है। खालसा पंथ खालिस शब्द से बना है।

बैसाखी पर्व का ज्योतिषीय महत्त्व

बैसाखी पर्व का ज्योतिषीय महत्त्व भी है। इस दिन सूर्य ग्रह मेष राशि में प्रवेश करते है। सूर्य संक्रांति होने के कारण यह पर्व अपना ज्योतिषीय महत्व भी रखता है। नवग्रहों में सूर्य राजा का स्थान रखता है। सूर्य प्रत्येक माह की 13,14,15 तारीख को राशि परिवर्तित करते है। सूर्य का राशि बदलना ही सूर्य सक्रांति के नाम से जाना जाता है। वैसे तो सूर्य एक साल में बारह राशि बदलते है, परन्तु इन बारह राशियों में सूर्य का मकर राशि में गोचर, मेष राशि में गोचर और सिंह राशि में गोचर विशेष समझा जाता है। इसलिए बैसाखी पर्व अपना आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक और ज्योतिषीय महत्त्व रखता है।

बैसाखी पर्व का आध्यात्मिक महत्त्व

बैसाखी पर्व के दिन भंगड़ा और गिद्धा नृत्य का आयोजन किया जाता है। बैसाखी मेले पर बड़े-बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। मेलों में पंजाबी धर्म, संस्कृति सम्बंधित विषयों का प्रदर्शन किया जाता है। खालसा पंथ से जुडी विद्यावान का भी इस दिन प्रदर्शन किया जाता है। बैसाखी के पर्व पर लोग गुरुद्वारे में जाकर गुरु ग्रन्थ साहेब के दरबार में माथा टेकते है, प्रसाद बांटते हैं। गुरुद्वारों में लंगर की व्यवस्था की जाती है। इस दिन देश के पवित्र सरोवर और पवित्र नदियों में स्नान और दान के कार्य भी किये जाते है। इस दिन स्नान कार्य करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। सूर्य संक्रांति पर भी नदियों में स्नान और दान करने के कार्य किये जाते है।

बैसाखी पर्व का सामाजिक महत्त्व

भारत देश कृषि प्रधान देश है। घर में नई फसल आना यहाँ एक उत्सव ही होता है। फसल आने के बाद, फसल का कुछ भाग अग्नि में होम के रूप में अर्पित किया जाता है। और फसल का कुछ भाग गुरुद्वारों, मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर अन्न का कुछ भाग दान किया जाता है। इसी श्रंखला में अन्न का कुछ भाग जरूरतमंदों को भी दान किया जाता है। सूर्य ग्रह की वस्तु गेंहूं है, इस दिन गेंहू की वस्तु दान करने से सूर्य दोष कम होता है। साथ ही इस दिन सूर्य संक्रांति होने से सूर्य का दर्शन पूजन किया जाता है, और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य के सामने सूर्य आदित्य स्त्रोत का पाठ किया जाता है और गायत्री मंत्र, सूर्य मंत्र का जाप भी उगते सूर्य के सामने किया जाता है। बैसाखी के दिन जब ढोल नगाड़ों की थाप पर सजे धजे युवक युवतियां जब झूम के नाचते गाते है तो सारा माहौल उमंग और उत्साह का हो जाता है।

बैसाखी पर्व रंग बिरंगे वस्त्र पहनकर भांगड़ा और गिद्धा करने पर्व है। इस पर्व को रंग रंगीला और नृत्य करने का पर्व है। इस दिन रबी की फसल का स्वागत घर में किया जाता है। बैसाखी पर्व खेती का पर्व हैं। बैसाखी पर्व भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में मनाया जाता है। बैसाखी पर्व को सिर्फ सिखों का पर्व या पंजाब का पर्व कहना गलत होगा। यह पर्व देश के कोने-कोने में मनाया जाता हैं। हाँ यह जरूर है की इस पर्व की धूम पंजाब और हरियाणा में विशेष रूप से देखी जाती है। इस पर्व का आध्यात्मिक, धार्मिक और ज्योतिषीय महत्त्व है। बैसाखी पर्व की धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविन्द जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। खालसा पंथ सिख धर्म के आदर्शों की स्थापना और मुगलों के अत्याचारों से सिख धर्म को बचाने के लिए स्थापित किया गया था।

खालसा पंथ क्या है? खालसा पंथ की स्थापना किस लिए कि गई?

खालसा पंथ अपने नाम के अर्थ रखता है। खालसा शब्द उर्दू के "खालिस" शब्द से बना है। खालिस का अर्थ शुद्ध, निर्मल, ऐसा पंथ जो मन, वचन और कर्म से शुद्ध हो, वही खालसा है। गुरु गोविन्द जी सिखों के अंतिम और दसवें गुरु थे। मात्र 9 वर्ष की आयु में ही गुरु गोविन्द जी को सिखों के दसवें गुरु का स्थान प्राप्त हो गया था। सिख धर्म के इतिहास में यह सबसे बड़ी घटना है। खालसा पंथ अपने धर्म और समाज के अधिकारों को बनाये रखने के लिए बनाया गया था। खालसा पंथ एक विचार है जो धर्म, समाज की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछवर अर्पित करने के लिए तत्पर रहता है। निर्धनों, असहायों और अनाथों की सहायता के लिए आगे आता है।

पंच प्यारे कौन हैं?

खालसा पंथ का ही एक भाग पंच प्यारे हैं। 1699 में जब गुरु गोविन्द जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी, उस समय पांच स्वयं सेवक गुरु जी कि एक आवाज पर अपना सिर कटवाने के लिए तैयार हो गए थे। इन्हें ही प्रथम पंच प्यारे का स्थान प्राप्त है। जब भी गुरु ग्रन्थ साहेब जी कि पालकी निकाली जाती है तो उसके आगे पंच प्यारे चलते है। पंच प्यारों को यह विशेष स्थान प्राप्त है।

खालसा पंथ की स्थापना कैसे हुई?

जिस दिन खालसा पंथ की स्थापना हुई, वह शुभ दिन बैसाखी का ही दिन था। गुरु गोविन्द जी ने सिखों को  बैसाखी के दिन आनंदपुर साहेब में आने के लिए कहा। वहां सभा में गुरु गोविन्द जी ने सब को सम्बोधित किया। सम्बोधन के पश्चात् गुरु जी ने अपनी तलवार निकाली और धर्म के लिए अपना सिर देने के लिए कहा, सभा में से एक युवक सामने आया, गुरु उस युवक को लेकर एक तम्बू में लेकर गए, कुछ देर बाद गुरु गोविन्द जी तम्बू से अकेले बाहर आये उनकी तलवार में खून लगा हुआ था। एक बार फिर से सभा में उपस्थित युवकों से एक और सिर देने के लिए कहा इस प्रकार एक एक कर पांच युवकों को गुरु गोविन्द जी तम्बू में लेकर गए, और हर बार खून से सनी तलवार लेकर बाहर आये। अंतिम बार में गुरु गोविन्द जी तम्बू से बाहर पांचों स्वयं सेवकों के साथ आये। इन्हीं ही पंच प्यारों का नाम दिया गया। इन पांच प्यारों को प्रथम खालसा का स्थान प्राप्त है। इन पांचों पंच प्यारों को गुरु गोविन्द जी ने अपने हाथों से अमृत पान कराया था, और पंच प्यारों ने भी गुरु गोविन्द जी को अपने हाथों से अमृत पान कराया था। 

बैसाखी का पर्व सिख धर्म के पांच सिद्धांतों के लिए भी जाना जाता है। सिख धर्म धारण करने वाले व्यक्ति को पांच वस्तुएं सदैव अपने पास रखनी होती है। केश, कड़ा, कृपाण, कच्चा और कंघा। इन पांच वस्तुओं को सिखों को हमेशा अपने साथ रखना होता है। इस प्रकार खालसा पंथ की स्थापना के समय में ये पंच सिद्धांत भी निश्चित किये गए।


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