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राहुकाल क्या है और राहुकाल में क्या करें, क्या न करें

राहुकाल क्या है और राहुकाल में क्या करें, क्या न करें

Rekha Kalpdev
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राहुकाल को अशुभ मुहूर्तों की श्रेणी में रखा जाता है। यही कारण है कि हिन्दु धर्म में कोई भी शुभ कार्य करते समय राहुकाल का विशेष रुप से विचार किया जाता है। ज्योतिष में राहु/केतु को छाया और अशुभ ग्रह माना गया है। हमारे यहां प्राचीन काल से ही प्रत्येक शुभ कार्य करने से पहले शुभ मुहूर्त देखा जाता है। शुभ मुहूर्त में कार्य करने से एक तो कार्यसिद्धि की प्राप्ति होती है दूसरे कार्य भी बिना बाधाओं के पूरे होता है। इसके विपरीत होने पर कार्य में व्यर्थ की बाधाएं आने की संभावनाएं बनी रहती है।

यह भी माना जाता है कि शुभ समय में किया गया कार्य ही सफल व शुभ होता है, प्रत्येक दिन में कुछ घंटों के लिए ऐसा समय आता है जिस समय किसी भी शुभ कार्य को शुरु करना सही नहीं माना जाता है। ऐसे ही समय को राहुकाल के नाम से जाना जाता है। दक्षिण भारत में इसे राहुकालम भी कहा जाता है।

प्रत्येक दिन में 90 मिनट के अवधि ऐसी होती है जिसमें कोई भी शुभ कार्य शुरु करने से बचना चाहिए। यह भी माना जाता है कि यदि राहुकाल शुरु होने से पूर्व कोई कार्य शुरु कर भी दिया गया है तो उस कार्य को फिर रोका नहीं जाता है बल्कि उसे करते रहा जाता है। यदि राहुकाल में व्यापार आरंभ किया जाय तो प्राय: यह देखा जाता है कि घाटे में आकर व्यापार बंद कर दिया जाता है।

इस काल में खरीदा गया वाहन, मकान, जेवरात आदि कोई भी वस्तु शुभ फलकारी नहीं होती है। राहु की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यन्तर दशा में नकारात्मक प्रभाव को दूर करने के लिए स्तोत्र पाठ और राहु शांति यज्ञ किए जा सकते हैं। राहुकाल में किए गए पूजा-प्रार्थना का अपूर्ण फल प्राप्त होता है।

किस वार को किस समय राहुकाल होता है?

राहुकाल की यह विशेषता है कि यह प्रत्येक वार के लिए अलग अलग समय पर होता है। राहुकाल का निर्धारण वार के आधार पर निर्धारित किया जाता है। परन्तु प्रत्येक वार को इसकी समयावधि लगभग 90 मिनट की ही होती है। दिन में यह कभी सुबह के समय होता है, कभी यह दोपहर के समय होता है और कभी यह शाम के समय होता है। परन्तु यह कभी भी सूर्यास्त के बाद नहीं होता है।

राहुकाल जानने के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त के मध्य का समय निकालकर उसका 8वां भाग निकाला जाता है। यह आठवां भाग ही राहुकाल कहा जाता है। धर्म शास्त्रों में यह माना जाता है कि राहुकाल में किसी भी तरह का शुभ कार्य आरंभ करने से बचना चाहिए।

वार के अनुसार राहुकाल का समय

  • वार राहुकाल का आरंभ राहुकाल का अंत
  • रविवार सायं 4:30 बजे सायं 6 बजे
  • सोमवार प्रात: 7:30 बजे पूर्वाह्न 9 बजे
  • मंगलवार अपराह्न 3 बजे सायं 4:30 बजे
  • बुधवार मध्याह्न 12 बजे अपराह्न 1:30 बजे
  • गुरुवार अपराह्न 1:30 बजे अपराह्न 3 बजे
  • शुक्रवार पूर्वाह्न 10:30 बजे मध्याह्न 12 बजे
  • शनिवार पूर्वाह्न 9 बजे पूर्वाह्न 10:30 बजे

राहुकाल गणना

राहुकाल वास्तव में दिनमान का वह आठवां हिस्सा हैं जिसका स्वामी राहु होता है। इसी दिनमान के भाग को राहुकाल कहा जाता है। राहुकाल ज्ञात करने के लिए स्थानीय दिनमान के समान आठ भाग करके इस अष्टमांश को वार के गुणक से गुणा करें। इस गुणनफल को स्थानीय सूर्योदय में जोड़ देने से राहुकाल का प्रारंभिक समय ज्ञात हो जाता है।

इस समय में दिन के अष्टमांश को जोड़ देने से राहुकाल का समाप्ति काल निकल आता है। उदाहरण के लिए यदि सूर्योदय को प्रात: 6 बजे मान लिया जाये तो सूर्यास्त भी सायं 6 बजे ही होगा। ऐसी स्थिति में दिन का मान 12 घंटे होगा। इसे आठ भागों में बांटने से एक भाग (खंड) डेढ़ घंटे का होगा।

किसी भी वार का प्रथम भाग कभी भी राहुकाल नहीं होता, सोमवार के दिन दूसरा भाग, शनिवार के दिन तीसरा भाग, शुक्रवार के दिन का चौथा भाग, बुधवार के दिन का पांचवा भाग, गुरुवार के दिन का छ्ठा भाग, मंगलवार के दिन का सातवां भाग और रविवार के दिन आठवां भाग राहुकाल होता है।

राहुकाल की गणना का आधार सूर्योदय होने के कारण इसका समय स्थानीय सूर्योदय के अनुसार बदलता रहता है। सामान्यत: प्रत्येक दिन में राहुकाल की अवधि लगभग 90 मिनट के आसपास होती है। यहां ध्यान देने योग्य बात है कि राहुकाल केवल दिन में ही माना जाता है।

इस विषय में विभिन्न विद्वानों में दो मत सामने आते हैं। एक अन्य मत के अनुसार राहुकाल रात्रिकाल में भी होता है। इन विद्वानों के अनुसार रात्रि में भी वही खंड होता है जो दिन में होता है। यदि मंगलवार को अपराह्न 3 बजे से सायं 4:30 बजे तक राहुकाल है तो वही समय रात्रि में भी माना जायेगा।

राहु काल में क्या नहीं करना चाहिए

  • कार्यों को बाधारहित पूरा करने के राहुकाल में शुरु न करें।
  • इस समय में किसी भी प्रकार का क्रय-विक्रय करने पर हानि की संभावनाएं बढ़ जाती है। हानि होने के योग भी बढ़ जाते हैं।
  • प्रत्येक प्रकार के शुभ कर्म जैसे-हवन, यज्ञ या सिद्धि कार्यं शुरु करने के लिए भी इसे अनुकूल नहीं माना जाता है। यह माना जाता है कि राहु काल शुभ कार्यों में बाधक का कार्य करता है। जिसके फलस्वरुप कार्य बार बार बाधाएं आने के बाद ही संपन्न होता है।
  • विशेष कार्यो चाहे वह महत्वपूर्ण कार्य ही क्यों न हो, इस समय में घर से बाहर नहीं जाने से बचना चाहिए।
  • व्यवसायिक हों या व्यक्तिगत किसी भी उद्देश्य से यात्रा का प्रारम्भ करना शुभ नहीं माना जाता है।
  • इसके विपरीत यदि राहुकाल शुरु होने से पहले ही यात्रा शुरु कर दी गई है तो उसे मध्य में नहीं रोकना चाहिए।
  • किसी भी प्रकार की बड़ी खरीदारी के लिए इस काल का पूर्णत: त्याग करना चाहिए। विशेष रुप से वाहन, मकान, मोबाइल, कम्प्यूटर, टेलीविज़न, आभूषण या अन्य कोई भी बहुमूल्य वस्तु नहीं खरीदनी चाहिए।
  • यदि इस समय में सावधानी न रखते हुए खरीदारी की जाती है तो वस्तु के जल्द खराब होने, चोरी होने या खोने का हमेशा भय बना रहता है।
  • राहुकाल में सोलह संस्कार कार्य जिसमें विवाह, सगाई, विवाह, सगाई, धार्मिक कार्य या गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए।
  • इसके अतिरिक्त इस समय का निवेश कार्यों के लिए भी त्याग करना चाहिए। ऐसा न करने पर लाभ के स्थान पर हानि की संभावनाएं अधिक रहती है।
  • राहुकाल में शुभ कार्यों को न केवल शुरु करने से बचना चाहिए बल्कि इस समय में नए व्यापार से जुड़ी योजनाओं पर भी कार्य नहीं करना चाहिए।

राहु काल में क्या करना चाहिए

  • राहुकाल केवल शुभ कार्यों के लिए वर्जित है। इस समय में राहुकाल से संबंधित कार्य शुरु किये जा सकते है। इस प्रकार के कार्यों के फलों के लिए यह सकारात्मक माना जाता है।
  • राहु ग्रह की शांति के लिए यज्ञ अनुष्ठान के कार्य किए जा सकते हैं।
  • राहु से निर्मित कालसर्प दोष से संबंधित पूजा-पाठ और अनुष्ठान करने के लिए राहुकाल का प्रयोग किया जा सकता है।
  • राहु ग्रह के दोष दूर करने के कर्म जैसे- चींटी या पशु-पक्षियों को अनाज देना या मंत्र पाठ करने के कार्य किये जा सकते हैं।
  • राहु का यंत्र धारण या राहु यंत्र दर्शन कार्य भी राहुकाल में करना अनुकूल फलदायक रहता है।
  • मंगलवार के दिन शुभ चौघडिया का प्रयोग करते समय राहुकाल का त्याग करना चाहिए। इस दिन शुभ चौघडिया और राहुकाल दोनों एक ही समय पर होता है। इसलिए इसका विचार अवश्य कर लेना चाहिए।



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