नाड़ी दोष क्या है, इसका परिहार और उपाय

By: Future Point | 25-Mar-2020
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नाड़ी दोष क्या है, इसका परिहार और उपाय

विवाह संस्कार मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार मे बंधने से पूर्व वर एवं कन्या के जन्म नामानुसार गुण मिलान करके की परिपाटी है। गुण मिलाने हेतू मुख्य रूप से अष्टकूटों का मिलान किया जाता है। ये अष्टकूट है, वर्ण, वश्य, तारा, योनी, ग्रहमैत्री,गण, राशि, और नाड़ी। कुंडली मिलान के लिए गुण मिलान की प्रक्रिया में बनने वाले दोषों में से नाड़ी दोष को सबसे अधिक अशुभ दोष माना जाता है नाड़ी जो कि व्यक्ति के मन एवं मानसिक ऊर्जा की सूचक होती है, व्यक्ति के निजी सम्बंध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते हैं, जिन दो व्यक्तियों में भावनात्मक समानता, या प्रतिद्वंदिता होती है, उनके संबंधों में ट्कराव पाया जाता है, वैदिक ज्योतिष अनुसार आदि, मध्य तथा अंत्य- ये तीन नाड़ियां यथाक्रमेण आवेग, उद्वेग एवं संवेग की सूचक हैं, जिनसे कि संकल्प, विकल्प एवं प्रतिक्रिया जन्म लेती है, मानवीय मन भी कुल मिलाकर संकल्प, विकल्प या प्रतिक्रिया ही करता है और व्यक्ति की मनोदशा का मूल्यांकन उसके आवेग, उद्वेग या संवेग के द्वारा होता है,

इस प्रकार मेलापक में नाड़ी के माध्यम से भावी दम्पती की मानसिकता, मनोदशा का मूल्यांकन किया जाता है, गुण मिलान की प्रक्रिया में आठ कूटों का मिलान किया जाता है जिसके कारण इसे अष्टकूट मिलान भी कहा जाता है तथा ये आठ कूट हैं, वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी, अकेली नाड़ी के 8 गुण होते हैं, जो वर्ण, वश्य आदि 8 कूटों की तुलना में सर्वाधिक हैं, इसलिए मेलापक में नाड़ी दोष एक महादोष माना गया है, प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुंडली में चन्द्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में उपस्थिति से उस व्यक्ति की नाड़ी का पता चलता है, नक्षत्र संख्या में कुल 27 होते हैं तथा इनमें से किन्हीं 9 विशेष नक्षत्रों में चन्द्रमा के स्थित होने से कुंडली धारक की कोई एक नाड़ी होती है, नाड़ी जो कि व्यक्ति के मन एवं मानसिक ऊर्जा की सूचक होती है। व्यक्ति के निजी सम्बंध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते हैं, जिन दो व्यक्तियों में भावनात्मक समानता, या प्रतिद्वंदिता होती है, उनके संबंधों में ट्कराव पाया जाता है।

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नाड़ी दोष-

नाड़ी दोष होने पर यदि अधिक गुण प्राप्त हो रहें हो तो भी गुण मिलान को सही माना जा सकता, अन्‍यथा उनमें व्यभिचार का दोष पैदा होने की सभांवना रहती है। मध्य नाड़ी को पित स्वभाव की मानी गई है। इस लिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमे परस्पर अंह के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते। उनमें विकर्षण की सभांवना बनती है। परस्पर लड़ाई -झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है। विवाह के पश्चात संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है।

अन्त्य नाड़ी को कफ स्वभाव का माना जाता है, इस प्रकार की स्थिति मे प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें, जिस प्रकार वात प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए वात नाड़ी चलने पर, वात गुण वाले पदार्थों का सेवन एवं वातावरण वर्जित होता है, अथवा कफ प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए कफ नाड़ी के चलने पर कफ प्रधान पदार्थों का सेवन एवं ठंडा वातावरण हानिकारक होता है, ठीक उसी प्रकार मेलापक में वर-वधू की एक समान नाड़ी का होना, उनके मानसिक और भावनात्मक ताल-मेल में हानिकारक होने के कारण वर्जित किया जाता है।

अर्थात लड़का- लड़की की एक समान नाड़ियां हों तो उनका विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी मानसिकता के कारण, उनमें आपसी सामंजस्य होने की संभावना न्यूनतम और टकराव की संभावना अधिकतम पाई जाती है, इसलिए मेलापक में आदि नाड़ी के साथ आदि नाड़ी का, मध्य नाड़ी के साथ मध्य का और अंत्य नाड़ी के साथ अंत्य का मेलापक वर्जित होता है। जब कि ल़ड़का-लड़की की भिन्न-भिन्न नाड़ी होना उनके दाम्पत्य संबंधों में शुभता का द्योतक है। यदि वर एवं कन्या की नाड़ी अलग-अलग हो तो नाड़ी शुद्धि मानी जाती है। सामान्य नाड़ी दोष होने पर ये उपाय दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

  • आदि नाड़ी- अश्विनी, आर्द्रा पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी,हस्ता, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पुर्वाभाद्रपद,
  • मध्य नाड़ी- भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पुर्वाफाल्गुनी,चित्रा, अनुराधा, पुर्वाषाढा, धनिष्ठा, उत्तरासभाद्रपद,
  • अन्त्य नाड़ी- कृतिका, रोहिणी, अश्लेशा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढा, श्रवण, रेवती, आदि नाड़ी ,मध्य नाड़ी व अन्त्य नाड़ी का यह विचार सर्वत्र प्रचलित है,

ल़ड़का-लड़की की भिन्न-भिन्न नाड़ी होना उनके दाम्पत्य संबंधों में शुभता का द्योतक है, यदि वर एवं कन्या कि नाड़ी अलग-अलग हो तो नाड़ी शुद्धि मानी जाती है, यदि वर एवं कन्या दोनों का जन्म यदि एक ही नाड़ी मे हो तो नाड़ी दोष माना जाता है, नाड़ी दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार वर-वधू दोनों की नाड़ी आदि होने की स्थिति में तलाक या अलगाव की प्रबल संभावना बनती है तथा वर-वधू दोनों की नाड़ी मध्य या अंत होने से वर-वधू में से किसी एक या दोनों की मृत्यु की प्रबल संभावना बनती है,

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नाड़ी दोष परिहार-

ल़ड़का-लड़की की एक राशि हो, लेकिन जन्म नक्षत्र अलग-अलग हों या जन्म नक्षत्र एक ही हों परन्तु राशियां अलग हो तो नाड़ी दोष नहीं होता है,

  • ज्योतिष के अनुसार-नाड़ी दोष विप्र वर्ण पर प्रभावी माना जाता है, यदि वर एवं कन्या दोनों जन्म से विप्र हो तो उनमें नाड़ी दोष प्रबल माना जाता है, अन्य वर्णो पर नाड़ी दोष पूर्ण प्रभावी नहीं रहता,
  • विशाखा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवति, हस्त, स्वाति, आर्द्रा, पूर्वाभद्रपद इन आठ नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र मे वर कन्या का जन्म हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है,
  • वर एवं कन्या ल़ड़का-लड़की के राशिपति यदि बुध, गुरू, एवं शुक्र में से कोई एक अथवा दोनों के राशिपति एक ही हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है,
  • सप्तमेश स्वगृही होकर शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो एवं वर कन्या के जन्म नक्षत्र चरण में भिन्नता हो तो नाड़ी दोष नही रहता है। इन परिहार वचनों के अलावा कुछ प्रबल नाड़ी दोष के योग भी बनते हैं, जिनके होने पर विवाह न करना ही उचित हैं।

नाड़ी दोष उपाय-

  • वर एवं कन्या की मध्य नाड़ी हो तो पुरुष को प्राण भय रहता है, ऐसी स्थिति मे पुरुष को महामृत्यंजय जाप करना या करवाना अतिआवश्यक है, यदि वर एवं कन्या दोनो की नाड़ी आदि या अन्त्य हो तो स्त्री को प्राणभय की सम्भावना रहती है, इसलिए इस स्थिति मे कन्या महामृत्युजय का पाठ अवश्य करवाए|
  • नाड़ी दोष होने पर संकल्प लेकर किसी ब्राह्मण को गोदान या स्वर्णदान करना चाहिए|
  • अपनी सालगिराह पर अपने वजन के बराबर अन्न दान करें, एवं साथ मे ब्राह्मण भोजन कराकर वस्त्र दान करें|
  • वर एवं कन्या मे से जिसे मारकेश की दशा चल रही हो उसको दशानाथ का उपाय दशाकाल तक अवश्य करना चाहिए|

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