ललिता जयंती - 19 फरवरी, मंगलवार 2019

By: Future Point | 16-Feb-2019
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ललिता जयंती - 19 फरवरी, मंगलवार 2019

दस महाविद्याओं में से एक देवी मां ललिता है। ललिता देवी जी की जयंती 19 फरवरी, मंगलवार, 2019 को मनायी जाएगी। यह दिन मां ललिता के भक्तजनों के लिए विशेष और उत्साहवर्द्धक होता है। माता के भक्त इस दिन ललिता देवी का जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। देवी ललिता अपने भक्तों पर अपनी कॄपा का आशीर्वाद बनाए रखती है। इससे भक्त के सभी कष्ट दूर होते है, और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस दिन मां ललिता देवी के सभी मंदिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है। लोग बढ़-चढ़ कर इस दिन देवी का पूजन-दर्शन करते है। देवी मंदिरों को सुंदर सजाया जाता है। रोशनी की जाती है, और देवी को भोग लगाने के लिए विभिन्न भोग बनाए जाते है। इस दिन देवी ललिता के मंदिरों की छ्टा देखने योग्य होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन का देवी का पूजन-अनुष्ठान करने का विशेष महत्व है। इस दिन को ललिता देवी जयंती व्रत के रूप में भी जाना जाता है। देवी ललिता का स्वरूप प्रबुद्ध और शांत माना जाता है। माता की भक्ति, समर्पण और शुद्ध हृदय से की जानी चाहिए।

प्रसिद्ध कथा


देवी पुराण के अनुसार ललिता देवी आदिशक्ति है। कथा के अनुसार-पौराणिक काल में देवी सती पिता दक्ष की पुत्री थी। पिता दक्ष के द्वारा अपने पति भगवान शिव का अपमान होने पर देवी सती ने प्रायश्चित स्वरुप स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया। यह देख भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हुए, और देवी का अधजला पार्थिव शरीर कंधों पर उठाकर पृथ्वी पर यहां-वहां घूमने लगे। भगवान शिव का भयानक रुप देखकर देवतागण डर गये। इस स्थिति में भगवान विष्णु ने अपने चक्र से शव के अनेक टुकड़े कर दिये। जो पृथ्वी के विभिन्न भागों पर गिरे। जहां जहां शव के भाग गिरें, वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इन शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ मां ललिता का है। यह माना जाता है कि देवी सती ही ललिता देवी है।

इसी संबंध में एक अन्य कथा प्रचलित है कि ललिता देवी का जन्म उस समय हुआ, जब ब्रह्मा जी के नाराज होने पर उनके द्वारा चक्र छोड़ा गया। जिसके फलस्वरुप सम्पूर्ण पाताल नष्ट होने लगा। यह देख देव और ऋषि-मुनि सभी भयभीत हो गए। पृथ्वी पाताल के धरातल में समाने ही वाली थी, कि सभी देव और ऋषि-मुनियों ने देवी ललिता को याद कर उनकी प्रार्थना करनी शुरु की। प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी ललिता ने सृष्टि को बचा लिया।

माता ललिता के प्रादुर्भाव में इस दिन सभी जगह सुंदर मेले लगते है, जिसमें हजारों-लाखों की संख्या में आराधक भाग लेते है और इस शक्ति पर्व को श्रद्धा के साथ मनाते है। वैसे तो देवी ललिता का दर्शन पूजन कभी भी किया जा सकता है। नित्य दर्शन पूजन करना तो विशेष लाभप्रद होता ही है। यह माना जाता है कि इस दिन देवी ललिता ने राक्षस भांडा का वध किया था। इस राक्षस की उत्पत्ति देव कामदेव की शरीर की भस्म से हुई थी। ललिता जयंती के अवसर पर देवी के भक्त पूर्ण विधि-विधान से पूजन कर, मां को प्रसन्न करते है। इस दिन भगवान शंकर और माता गौरी का भी पूजन किया जाता है।

जयंती के दिन पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उपवास करना चाहिए। पुराणों में देवी के रुप का वर्णन कुछ इस प्रकार से किया गया है। देवी दो भुजाओं से युक्त, गोरे रंग और लाल रंग के कमल पर आसीन है। जो जातक देवी ललिता का श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजन करता है उसे धन और समृद्धि की सहज प्राप्ति होती है। देवी ललिता मां दुर्गा का ही एक रुप है। शास्त्रों के अनुसार मां का पूजन तीन रुपों में किया जाता है। 8 वर्ष से छोटी कन्याओं का पूजन बाल सुंदरी के रुप में किया जाता है। 8 से 16 वर्ष की कन्याओं का पूजन देवी षोडशी त्रिपुर सुंदरी के रुप में किया जाता है। तथा युवा स्वरुप में देवी ललिता त्रिपुर सुंदरी का पूजन किया जाता है। देवी ललिता की साधना अत्यंत कठिन कही गई है। इनकी साधना करने पर शुरु में आर्थिक कष्ट आते हैं जो बाद में सुख-समृद्धि का रुप ले लेते है। कुछ धार्मिक शास्त्रों में मां को काली का रुप भी माना गया है।

10 महाविद्याओं की आराधना व्यक्ति को भोग और मोक्ष दोनों दे सकती है। कुछ महाविद्याओं का दर्शन पूजन करना भोग विलास देता है तो कुछ का महाविद्याओं का पूजन आराधक को मोक्ष के मार्ग की ओर लेकर जाता है। देवी ललिता को मोक्ष देने वाली देवी कहा गया है। कहीं इन्हें देवी चंडी के नाम से भी पुकारा गया है। ललिता देवी की पूजा करने से व्यक्ति को सफलता मिलती है। ऐसा माना जाता है कि देवी ललिता अपने भक्तों को इस दिन आशीर्वाद देती हैं यदि वे पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ उनकी पूजा करते हैं। वह जीवन भर खुशी और संतोष प्रदान करती है।


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