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जानें क्या है सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे धार्मिक, वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय तथ्य और विश्वास ।

By: Future Point | 23-May-2019
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जानें क्या है सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे धार्मिक, वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय तथ्य और विश्वास ।

हिंदुस्तान में जितना महत्व भगवान् को दिया जाता है उतना ही महत्व सूर्य को भी दिया जाता है, सूर्य देव जो कि पूरे ब्रह्माण्ड को रोशन करते हैं, संसार से अंधकार को ख़त्म करते हैं. सूर्य को सभी ग्रहों में से श्रेष्ठ माना जाता है क्यों कि सभी ग्रह सूर्य के ही चक्कर लगाते हैं इसलिए सभी ग्रहों में सूर्य को सर्व श्रेष्ठ माना जाता है. सूर्य को ज्योतिष में आत्मा का कारक माना जाता है, सकारात्मक ऊर्जा पाने के लिए सूर्य देव की पूजा एवं अर्घ्य देने से व्यक्ति के अंदर गजब का आत्मविश्वास पैदा होता है और उसके ऊपर तन्त्र, मन्त्र का भी कोई प्रभाव नही पड़ता है, अतः सूर्य को अर्घ्य देने के धार्मिक, वैज्ञानिक व ज्योतिषीय महत्व के बारे में आपको बताते हैं।

सूर्य देव को अर्घ्य देने का धार्मिक महत्व-

हिन्दू धर्म में सूर्य का बहुत महत्व बताया गया है, सदियों से हमारी परम्परा में प्रातः स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देने अर्थात जल चढ़ाने का नियम है, सूर्य को सभी ग्रहों में से खास माना जाता है, हिन्दू धर्म में सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है, ऐसा माना जाता है कि अगर सूर्य देवता आपसे प्रसन्न हैं तो बाकि किसी ग्रह का बुरा प्रभाव आप पर नही पड़ता है इसलिए सूर्य देव की पूजा, उपासना एवं अर्घ्य देने को बहुत ही शुभ व फलदायी माना गया है, रविवार को सूर्य देव का दिन माना गया है और इस दिन सूर्य देव की उपासना करने से जीवन सफल होता है।

सूर्य को अर्घ्य देने का ज्योतिषीय महत्व –

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रति दिन सूर्य देव को अर्घ्य देने से व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह की मजबूती स्थिति बनती है इसके अलावा सूर्य देव को जल चढ़ाने से व्यक्ति की कुंडली में शनि ग्रह का हानिकारक प्रभाव भी कम होता है, यदि कोई व्यक्ति ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने के पश्चात् स्वच्छ कपड़े पहन कर सूर्य देव को जल चढ़ाये तो उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. जिस वक्त सूर्य उदय होता है उस वक्त लालिमा युक्त सूर्य को जल चढ़ाने से ज्यादा लाभ मिलता है इससे हमारे शरीर को रोगों से भी मुक्ति मिलती है।

सूर्य देव को अर्घ्य देने का वैज्ञानिक महत्व –

सूर्य को जल चढ़ाने के धार्मिक व ज्योतिषीय महत्व के साथ -साथ वैज्ञानिक महत्व भी बहुत बड़ा होता है, वैज्ञानिकों के अनुसार जब कोई व्यक्ति सुबह के समय सूर्य को जल चढ़ाता है तो सूर्य से निकलने वाली किरणे उस व्यक्ति को कई स्वास्थ्य लाभ देती हैं, सुबह के समय सूर्य की जो किरणे निकलती हैं वे हमारे शरीर में होने वाले रंगो के असन्तुलन को सही करती हैं, विज्ञान के अनुसार सुबह के समय सूर्य को जल चढ़ाते इन किरणों के प्रभाव से ये रंग संतुलित हो जाते हैं जिससे शरीर की प्रति रोधक शक्ति बढ़ जाती है, इसके अलावा दूसरा वैज्ञानिक महत्व है कि सुबह के समय सूर्य से निकलने वाली किरणों से हमारे शरीर में विटामिन डी की कमी नही होती है, और इसके अलावा सूर्य की सुबह की रौशनी शरीर की सुंदरता बढ़ाने का भी काम करती है और सूर्य की किरणों से आँखों को भी स्वास्थ्य लाभ मिलता है।

सूर्य देव को अर्घ्य देने की विधि -

  • सर्वप्रथम प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व शुद्ध होकर स्नान करें इसके पश्चात् उदय होते सूर्य के समक्ष कुश का आसन लगाएं।
  • आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें और उसी जल में मिश्री भी मिलाएं, ऐसा माना जाता है कि सूर्य को मीठा जल चढ़ाने से यदि व्यक्ति की जन्म कुंडली में मंगल का दुष्प्रभाव है तो वो दूर हो जाता है और यदि मंगल शुभ हो तो उसकी शुभता में वृद्दि होती है।
  • जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्या उदय की पहली नारंगी किरणें प्रस्फूटित होती दिखाई दें, आप दोनों हाथों से तांबे के पात्र को पकड़ कर इस तरह जल चढ़ाएं कि सूर्य जल चढ़ाती धार से दिखाई दें।
  • प्रात:काल का सूर्य कोमल होता है उसे सीधे देखने से आंखों की ज्योति बढ़ती है।
  • सूर्य देव को जल का धीरे -धीरे से इस तरह से अर्घ्य दें कि जल की धारा आसन पर आ गिरे ना कि जमीन पर, जमीन पर जल धारा गिरने से जल में समाहित सूर्य-ऊर्जा धरती में चली जाएगी और सूर्य अर्घ्य का संपूर्ण लाभ आप नहीं पा पाएंगे।
  • सूर्य देव कोअर्घ्य देते समय इन मन्त्रों में से किसी एक का जाप अवश्य करें
  • ‘ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते।

    अनुकंपये माम भक्त्या गृहणार्घ्यं दिवाकर:।।‘ इस मन्त्र का जाप 11 बार करना चाहिए.

    ‘ ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय।

    मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा: ।।‘ इस मन्त्र का जाप 3 बार करना चाहिए.

  • इसके पश्चात् दायें हाथ की अंजूरी में जल लेकर अपने चारों ओर छिड़कें और अपने स्थान पर ही तीन बार घूम कर परिक्रमा करें।
  • इसके पश्चात् आसन उठाकर उस स्थान को नमन करें ।

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