चैत्र नवरात्र की चौथी देवी - मां कूष्मांडा की स्तुति मंत्र, प्रार्थना, बीज मंत्र और आरती

By: Acharya Rekha Kalpdev | 23-Mar-2024
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चैत्र नवरात्र की चौथी देवी - मां कूष्मांडा की स्तुति मंत्र, प्रार्थना, बीज मंत्र और आरती

नवरात्र आदि शक्ति की आराधना का पर्व है। शक्ति आराधना हमें सृष्टि और ईश्वर से जोड़ती है। उनके नियमों पर चलना सिखाती है। असुर प्रवृत्तियों से हमारी रक्षा करती है। इस प्रकार नवरात्र हमें कुमार्ग से हटा कर सद्मार्ग पर चलाते है। देवी के नवरात्र हमने स्त्रियों का मान करना सिखाता है। अपनी राष्ट्र माता से स्नेह करना सिखाती है। नवरात्र वास्तव में नौ दिन के नवरात्र नहीं अपितु देवी आराधना की नौ रात्रियाँ है। नवरात्री के नौ रात्रियों को साधक को कम से कम सोकर अधिक से अधिक देवी के पाठ ओर भजनों का गायन करना चाहिए। देवी, शक्ति आराधना करने वाले की कभी भी असमय मृत्यु नहीं होती है। देवी अपने भक्तों का कल्याण करती है। यहाँ हमें यह समझना होगा की देवी देवताओं की पूजा आराधना में श्रद्धा ओर विश्वास दीपक में तेल की तरह आवश्यक है। भक्ति सकाम करने की जगह निष्काम भक्ति अधिक फल देती है।

व्रत रखना क्यों आवश्यक है?

व्रत रखने से व्यक्ति की संकल्प शक्ति बढ़ती है। साथ ही उसका धैर्य ओर सहनशीलता में भी वृद्धि होती है। शरीर की पाचन क्षमता को आराम मिलता है। चिंता ओर निराशा का नाश होता है। शारीरिक सुख भी बढ़ता है, आरोग्यता बेहतर होती है। व्रत जीवन को सुमार्ग पर ले जाने का एक सरल साधन है। आप के बात अनुभव कर सकते है कि जी लोग शक्ति आराधना करते है, वो स्त्रियों का मान करने वाले ओर असहायों की मदद करने का व्यवहार करने वाले स्वभाव के होते है। धर्म ओर आस्था आपको नैतिक बनाती है, सही आचरण पर चलने का सन्देश देती है। आपके आचार व्यवहार में सुधार करती है। अगर आपको अपनी संतान, पुत्र, पुत्री या किसी अपने कि जीवन शैली में चमत्कारिक बदलाव लाना है ओर आप को समझ नहीं आ रहा है कि आप क्या करें तो आप उन्हें एक बार नवरात्र आराधना से जोड़ने का कार्य करें। बाकी सब नवदुर्गा देवी स्वयं कर लेंगी।

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सनातन धर्म में शक्ति आराधना का क्या महत्त्व है ?

हम सब इस बात को जानते है, और इसमें किसी को कोई संदेह भी नहीं है, कि हम सब का जन्म एक स्त्री शक्ति के द्वारा ही हुआ है। हम सब को जन्म देने वाली मां देवी शक्ति का ही एक रूप है। बालक के जन्म के समय जन्म देनी वाली माता काबी भी दूसरा जन्म होता है। शक्ति सृजन और विध्वंस दोनों का कार्य करती है। शक्ति को ही प्रकृति भी कहा गया है। मां, शक्ति और प्रकृति सब एक समान है, सब में एक दूसरे का रूप है और एक दूसरे की सब पूरक भी है। प्रकृति भी मां का ही एक रूप है, प्रकृति भी मां की तरह सृजन और विध्वंस दोनों कार्य करती है। वेद, पुराणों में नवरात्री को आराधना शक्ति का पर्व कहा गया है।

नवरात्र में रात्रि आराधना क्यों करनी चाहिए?

नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवरात्र में व्रत ओर नियम का पालन करने से देवी प्रसन्न होती है ओर अपने साधक की मनोकामना पूर्ण करती है। नवरात्रि आराधना वास्तव में देवी शक्ति को सिद्ध करने का पर्व है। जिसे व्रत, उपवास, मंत्र ओर पाठ के द्वारा सिद्ध किया जाता है। वैदिक काल में भी ऋषि मुनि साधना, ध्यान ओर आराधना के लिए रात्रि और एकांत स्थान का चयन करते थे। रात्रि समय में बाहरी वातावरण में शांति अधिक होती है। प्रकृति, परिवार और समाज की बाधाएं नहीं होती है। बार-बार साधना के बाधित होने की संभावनाएं कम होती है।

नवरात्री पर्व ब्रह्मा जी के एक भक्त महिषासुर को मारकर देवी शक्ति दुर्गा ने स्त्री शक्ति को संसार भर में स्थापित किया था। उनका मान बढ़ाया था। नवरात्री में देवी के अलग अलग रूपों की आराधना की जाती है। नवरात्रि में साधकों को चाहिए कि देवी के एक निश्चित मन्त्र का जाप नवरात्री के नवरात्रियों में नित्य करें। एक निश्चित समय पर करें, और संभव हो तो रात्रि समय 12:00 से 01:00 के मध्य करें। नवरात्रि में दुर्गा सप्तसती का पाठ विशेष रूप से करने के लिए कहा गया है। इसके अलावा आप अलग अलग दिन देवी को ध्यान में रखते हुए भी मंत्र जाप कर सकते है।

नवरात्रि व्रत / उपवास करने से कौन से लाभ होते है?

नवरात्रियों में मानव शरीर के नौ द्वार - दो आँख, दो नासिका छिद्र, दो कान, एक मुख, दो मल और मूत्र के द्वार और नवग्रह - नवग्रह सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु है। नवरात्रि सिद्धि, बुद्धि और समृद्धि देने वाली देवता है। तन, मन और धन को देवी शुद्ध करती है। अंतर्मन भी शुद्ध होता है। मन, वचन, कर्म को शुद्ध करने के लिए नवरात्रि पर्व का प्रारम्भ हुआ है।

  • उपवास मनोबल हो बढ़ाता है।
  • रोग, शोक, और विकारों का नाश होता है।
  • रोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है।
  • जीवन में रुकावटें दूर होती है।
  • शरीर को एक नई ऊर्जा और शक्ति प्राप्ति होती है।
  • देवी आराधना के पर्व नवरात्री में देवी पूजन धन और सुख समृद्धि में भी वृद्धि होती है।
  • देवी आराधना बाहरी और आतंरिक हर प्रकार के शत्रु का नाश करती है।
  • आत्मचेतना, आत्ममंथन, और चेतना शक्ति को जागृत करने के लिए नवरात्रि आराधना सरल मार्ग है।
  • देवी आराधना के नौ दिन देवी के विभिन्न रूपों की पूजा करने से नवग्रह जनित दोष भी दूर होते है।
  • नवदुर्गा नवरात्रि आराधक के दोषों को दूर करती है। देवी आराधना से देवता और मानव सभी शक्तिशाली बनते है।
  • इस संसार में जो कुछ भी है वह सभी देवी आराधना के कारण ही है। कला , संस्कृति और कौशल सब देवी शक्ति की ही दें है।
  • इस संसार की सभी स्त्रियां देवी शक्ति का ही रूप है। देवी आराधना स्त्रियों को मान देना सिखाती है।
  • देवी आराधना तंत्र और मंत्र दोनों को सिद्ध करने का सबसे शुभ पर्व देवी आराधना है।

देवी आराधना में माता की चौकी स्थापित करने का महत्व?

पुराणों में देवी शक्ति की आराधना के लिए नवरात्रि का उल्लेख मिलता है। देवी के नौ रूपों की आराधना से साधक का जीवन सफल होता है। वैसे तो देवी पूजा साल के 365 दिन की जा सकती है। परन्तु नवरात्रि पर देवी आराधना का विशेष महत्त्व बताया गया है। नवरात्रि में प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर नवमी तिथि तक पूरे नौ दिन शक्ति आराधना के लिए सुनिश्चित किये गए है। नवरात्रि पर देवी की चौकी नवरात्रि के प्रथम दिन स्थापित की जाती है। उसे नौ दिन तक हटा कर कहीं और नहीं रखा जाता। एक बार चौकी को स्थापित करने के बाद उसे नौ दिन तक हिलाया नहीं जाता है। सम्पूर्ण नवरात्रि में नौ दिनों तक देवी की मन, आस्था और विश्वास के साथ नियम पूर्वक आराधना करें।

माता कुष्मांडा चैत्र नवरात्र की चौथी देवी है। नवरात्र के चौथे दिन देवी कुष्मांडा की आराधना की जाती है। इस वर्ष चौथा नवरात्र 12 अप्रैल 2024 का रहेगा। 12 अप्रैल 2024 का दिन देवी कुष्मांडा के लिए व्रत, उपवास और आराधना का रहेगा। देवी कुष्मांडा जीवन की विकत परिस्थितियों में मुख पर दिव्य मुस्कान रखने का सन्देश देती है। देवी कुष्मांडा की मुस्कान से इस सृष्टि का जन्म होने का वर्णन मिलता है। देवी कुष्मांडा के नाम का पूर्ण अर्थ हम इस प्रकार जान सकते है - देवी कुष्मांडा थोड़ी गर्मी (ऊर्जा) और ब्रह्माण्ड की देवी है।

देवी कुष्मांडा के जन्म से जुडी एक कथा प्रसिद्द है - कथा के अनुसार बात उस समय की जब इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी नहीं था। इस संसार में जीवन नहीं था, एक दिन अचानक से एक दिव्य प्रकाश किरण प्रकट हुई और उस दिव्य प्रकाश ने सब कुछ अपने में ले लिया। प्रारम्भ में इस प्रकाश का अपना कोई प्रकाश नहीं है। देवी कुष्मांडा ने अपने में त्रिदेवों को समाहित कर लिया और एक न ख़त्म होने वाली शक्ति के रूप में प्रकट हुई। देवी कुष्मांडा आठ भुजाओं वाली है। इन्हें अष्टभुआ रूपी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी सवारी सिंह है, उनके चारों हाथों में कमंडल, धनुष, तीर और कमल है। देवी के दूसरे हाथ में माला, गदा, अमृत कलश और चक्र है। देवी कुष्मांडा आयु, यश, बल, बुद्धि और समृद्धि देने वाली देवी है।

मां कूष्मांडा की स्तुति मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां कूष्मांडा की प्रार्थना

सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

मां कूष्मांडा बीज मंत्र

ऐं ह्री देव्यै नम:

मां ​कूष्मांडा की आरती

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी मां भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदम्बे।
सुख पहुंचती हो मां अम्बे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
मां के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो मां संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥

देवी कुष्मांडा कवच

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥

देवी कुष्मांडा का स्त्रोत

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

माता कुष्मांडा ध्यान मन्त्र

वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥
भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥


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