वर्तमान दुर्गासप्तशती की कुछ विकृतियाँ

By: Ankur Nagpal | 18-Nov-2017
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वर्तमान दुर्गासप्तशती की कुछ विकृतियाँ

दीर्घकाल से अद्यतन जिन धार्मिक, सांस्कृति, सामाजिक तथा प्रशासनिक तन्त्रों व महानुभावों ने सर्वभूतहृदय भगवान् श्रीरामचन्द्र की प्रसन्नता हेतु सनातन शास्त्रीय-परम्परा के अन्तर्गत श्रीदुर्गासप्तशती को वैदिक, पौराणिक, तान्त्रिक तथा ऐतिहासिक और सांस्कृति पोषित करते हुए इसके अस्तित्व व आदर्श को उद्दीप्त रखने में सहयोग प्रदान किया, वे सर्वथा सराहनीय हैं। ऐसे महानुभाव भगवान् की कृपाकटाक्ष से निरन्तर तृप्त रहें – ऐसी हमारी पवित्र भावना है।

मार्कण्डेयपुराण (अध्याय ८१-९३) के अन्तर्गत श्रीदुर्गासप्तशती का प्रकाश हुआ तथा इसकी विस्तृत उपासना-प्रक्रिया श्रीकात्यायनीतन्त्र आदि में प्रदर्शित है, जिसका संकेत श्रीभास्करराय, श्रीनागेशभट्टाचार्य आदि महानुभावों ने किया है। कालक्रम से दुर्गासप्तशती की पाठविधि में जो कतिपय विकृतियाँ प्रसक्त हुईं, उनके संशोधन व परिष्कार हेतु कृत प्रस्तुत प्रयास के क्रम में प्रकाशित निम्नोक्त बिन्दु सभी सनातनी-महानुभावों द्वारा सर्वथा विचारणीय हैं; इन पर विचार करके विद्वान् महानुभाव सप्तशती-पाठ करके, भगवती जगज्जननी की उपासना से, सर्वाभीष्ट सिद्ध करें


१. प्रचलित प्रतियों में तन्त्रोक्त-रात्रिसूक्त तथा तन्त्रोक्त-देवीसूक्त के पाठ की चर्चा सुलभ है, जबकि यह सर्वथा निराधार है। इसके दो कारण हैं — प्रथम तो यह कि ‘विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीम्’ तथा ‘नमो देव्यै महादेव्यै’ — ये दोनों सूक्त मूलसप्तशती में प्रदर्शित ही हैं, अतः इनकी पुनरावृत्ति की कोई अपेक्षा नहीं। इसके अतिरिक्त:

विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥


इस पद्य में गुप्त अथवा प्रकट कोई तिङन्तपद/क्रियापद परिलक्षित नहीं होता। शब्दकल्पद्रुमकार ने ‘वाक्य’ को परिभाषित करते हुए कहा : ‘तिङ्सुबन्तयोश्चयः समुदायः कारकान्विता क्रिया च वाक्यम्’। अतः वाक्य में तिङन्त व सुबन्त — दोनों प्रकार के पदों की अपेक्षा होती है। तथाकथित तन्त्रोक्त-रात्रिसूक्त में कोई क्रियापद नहीं है; जबकि सप्तशती के पाठक्रम में इसके पूर्वश्लोक में विद्यमान ‘विबोधनार्थाय’ पद से इसकी संगति अन्वय करते समय लग पाना ही सम्भव है। सम्भवतः इसीलिए भास्करराय महाभाग के द्वारा गुप्तवतीटीका के उपोद्घात में इन दोनों सूक्तों के पाठ को समीचीन नहीं माना गया, यथा — ‘विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीमिति स्तवो रात्रिसूक्तम्। नमो देव्यै महादेव्या इति स्तवो देवीसूक्तमिति कश्चित्। तन्न।’ इसके अतिरिक्त; उक्त महानुभाव ने ही ‘रात्रिसूक्तदेवीसूक्ते ऋग्वेदे शाकल्यसंहितायां प्रसिद्धे; तथेत्यनेन जपोक्तक्रमः सम्पुटाकारो निर्दिश्यते’ कहकर वैदिक-सूक्तद्वय का पाठ ही समीचीन माना है। अतः केवल वैदिकसूक्तों का ही पाठ करना चाहिए। और वह भी तभी करना चाहिए कि यदि पाठकर्ता द्वारा स्वयं गुरुमुख से उक्त वैदिकसूक्तों का श्रवण किया गया हो, क्योंकि यही श्रुतिपरम्परा की मर्यादा भी है। अन्यथा दोनों सूक्तों का पाठ न ही करें, यह सहृदयतापूर्वक परामर्श है।


२. प्रचलित प्रतियों में प्रायः देव्यथर्वशीर्ष को सप्तशती-पाठक्रम में ही रख दिया जाता है, यह सर्वथा शास्त्रविरुद्ध है। एक तो इस पक्ष में यह है कि हमें इस मत के पोषण में कहीं कोई विधिवाक्य प्राप्त नहीं होता और पुनः पाठक्रम में इसका पाठ बीच में कर देने से सप्तशतीपाठ का क्रम खण्डित हो जाएगा। मूल-चण्डीपाठ (१३ अध्याय) के पूर्व तीन अंग (कवच, अर्गला, कीलक) तथा अनन्तर तीन अंग (रहस्यत्रय — प्राधानिक, वैकृतिक व मूर्ति) हैं; संख्या की दृष्टि से इनकी परस्पर समता हो गई। वैदिकसूक्तद्वय की भी परस्पर समता हो गई तथा १००-१०० नवार्णजप का भी सम्पुट हो गया; अत एव सर्वत्र समता परिलक्षित है। ऐसी स्थिति में देव्यथर्वशीर्ष बीच में रखने पर विषमता हो जाती है; अतः यह श्रेयस्कर नहीं है।

३. प्रचलित प्रतियों में प्रायः समग्र चण्डीपाठ का विनियोग, न्यास आदि सप्तशतीमहान्यास के रूप में एक-साथ ही आरम्भ में लिख दिया जाता है। ऐसी स्थिति में पुनः प्रत्येक चरित्र के साथ जो विनियोग मुद्रित हुआ देखा जाता है, वह सर्वथा अयुक्त है।

४. दुर्गाप्रदीप, गुप्तवती, चतुर्धरी, शान्तनवी, नागेश्वरी आदि किसी भी टीका में प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में ध्यान का निर्देश नहीं है। कारण स्पष्ट ही है कि पहले एक बार विनियोग-न्यासपूर्वक ध्यान किया जा चुका है, तो प्रत्येक अध्याय में पुनः-पुनः ध्यान करने की आवश्यकता क्या है? इससे पाठ का क्रम खण्डित ही माना जाएगा। पुनः


ध्येये सक्तं मनो यस्य ध्येयमेवानुपश्यति ।
नान्यं पदार्थं जानाति ध्यानमेतत्प्रकीर्तितम् ।।
ध्येये मनो निश्चलतां याति ध्येयं विचिन्तयन् ।
यत्तद्ध्यानं परं प्रोक्तं मुनिभिर्ध्यानचिन्तकैः ।।


इत्यादि गरुडपुराणोक्त (१.२३५.३०-३२) वचनों से यह सिद्ध है कि ध्यान तो ध्येय का ही होता है। पूर्व में महान्यास करते समय ‘दुर्गां त्रिनेत्रां भजे’ कहकर दुर्गादेवी को जहाँ ध्येय कह दिया गया, तो प्रचलित प्रतियों के सातवें अध्याय में मातंगी का ध्यान क्यों रखा गया, जबकि मातंगी का नाम पूरी सप्तशती में कहीं नहीं सुना जाता। इसी प्रकार अर्धानारीश्वर-शिव का ध्यान नवम-अध्याय में किया गया है — ‘अर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि’। अष्टम-अध्याय में ‘अरुणां करुणातरंगिताक्षीम्’ इत्यादि ध्यान का हेतु भी स्पष्ट नहीं होता; कारण कि सौन्दर्यलहरी (३०) में ‘स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितोः’ की व्याख्या में प्रायः सभी टीकाकारों ने इस पद्य को उदाहृत करते हुए इसे दत्तात्रेय की रचना कहा है। अतः यह अष्टम-अध्याय का ध्यान कैसे बन गया? इसी से प्रत्येक अध्याय में ध्यान की परम्परा सर्वथा असंगत व शास्त्रविरुद्ध है।

५. प्रचलित प्रतियों में प्रायः चरित्रारम्भ के अध्याय से इतर] कवच, अर्गला, कीलक, रहस्यत्रय आदि सहित प्रत्येक अध्याय प्रणव (‘ॐ’) से सम्पुटित हैं। यह शास्त्रसम्मत नहीं है, कारण कि इसमें कोई विधिवाक्य प्राप्त नहीं होता।

६. प्रचलित प्रतियों में मूलचण्डीपाठ के पश्चात् सप्तशतीन्यास व नवार्णजप का क्रम विलोमरूप से लिख दिया गया है। कारण कि जब पाठारम्भ में पहले नवार्णजप, पीछे सप्तशतीन्यास हुआ, तो पाठान्त में पहले सप्तशतीन्यास, पीछे नवार्णजप होना चाहिए; किन्तु प्रचलित प्रतियों में क्रम विपरीत ही है।

७. प्रचलित प्रतियों में कहीं-कहीं १००८ नवार्णजप का संकेत सुलभ है, जबकि डामरतन्त्र में ‘शतमादौ शतं चान्ते जपेन्मन्त्रं नवार्णकम्’ इत्यादि वचनानुसार में केवल १०८ जप का ही विधान प्राप्त होता है।

८. शापोद्धार में विविध प्रक्रियाएँ देखी जातीं हैं; किन्तु सभी में पाठारम्भ व विश्रामकाल में ‘ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा’ इत्यादि शापोद्धार-मन्त्र के ७-७ जप तथा ‘ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा’ इत्यादि उत्कीलन-मन्त्र का केवल पाठारम्भ में २१ बार जप करना सर्वथा शास्त्रानुकूल है।

९. सप्तशती के सात-सौ श्लोकों अथवा मन्त्रों के विषय में बहुशः शास्त्रार्थ होते रहे हैं। इसमें; कवच, अर्गला, कीलक, मूलचण्डीपाठ (१३ अध्याय), प्राधानिकरहस्य, वैकृतिकरहस्य व मूर्तिरहस्य — इन सबके क्रमशः ५६ + २५ + १४ + ५३५ + ३१ + ३९ + २५ — यह सबका योग ७२५ है। उदाहरणतया, मूल श्रीमद्भगवद्गीता में ७४४ (६२० + ५७ + ६७ +१) श्लोक थे :


षट्शतानि सविंशानि श्लोकानां प्राह केशवः ।
अर्जुनः सप्तपञ्चाशत्सप्तषष्टिं तु सञ्जयः ।
धृतराष्ट्रः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते ।।


पर जगद्गुरु भगवान् श्रीशंकराचार्यजी ने अपने गीताभाष्य के उपोद्घात में ‘वेदव्यासः सर्वज्ञो भगवान् गीताख्यैः सप्तभिः श्लोकशतैरुपनिबबन्ध’ कहकर लगभग ७०० श्लोकों की संख्या घोषित की और संयोग से श्रीमद्भगवद्गीता का ७०० श्लोकों की आनुपूर्वी वाला संस्करण ही प्रचलित हो गया [जो आज तक सर्वत्र उपलब्ध होता है]। इसी न्याय से हम यह समझते हैं कि अंगसहित चण्डीपाठ के ७२५ को लगभग ७०० श्लोकों मानकर ही इसे सप्तशती कहा गया होगा। मूल तेरह अध्याय का समवेत सप्तशती नहीं, अपितु देवीमाहात्म्य अथवा चण्डीपाठ कहलाता है। इसका संकेत मूल में ही विविध स्थलों पर आया है — ‘एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तम्’, ‘देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम्’ इत्यादि।

१०. होम की दृष्टि से कवच, अर्गला आदि अंगों की प्रत्येक श्लोकानुसार आहुति का निषेध है — ‘रक्षाकवचगैर्मन्त्रैर्होमं तत्र न कारयेत्’। अतः तन्त्रपरम्परा में पूर्वाचार्यों ने प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर मूल तेरह अध्याय में ही ७०० मन्त्रों का अनुसन्धान किया। इसीलिए ‘सप्तशती’ का अर्थ सात सौ श्लोकों का समाहार नहीं, अपितु सात-सौ मन्त्रों का समाहार है – ऐसा समझना चाहिए। इसी से श्रीवंशीधराचार्यजी ने श्रीमद्भागवत (१.१.१) की व्याख्या में इसी बात का संकेत देते हुए कहा – ‘यद्वा चण्डीसप्तशतीन्यायेन मन्त्रविभागेनापीयं संख्या सम्भाव्यते’। और वह भी आहुति के सन्दर्भ में ही विचारणीय है, सम्पुट आदि में नहीं। जैसा कि ‘नमस्तस्यै’ को मन्त्र मानने में के सन्दर्भ में जगच्चन्द्रचन्द्रिकाटीका में कहा गया — ‘तथाऽहि – या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै स्वाहेत्येको मन्त्रः। नमस्तस्यै स्वाहेति द्वितीयो मन्त्रश्चतुरक्षरः। नमस्तस्यै नमो नमः स्वाहेत्यष्टाक्षरकस्तृतीयः’। इसी क्रम में भास्करराय व नागेशभट्ट — इन दो आचार्यों द्वारा कृत सप्तशती का मन्त्रविभाग अतीव प्रचलित है। तत्रापि नागेशभट्टोक्त मन्त्रविभाग समीचीन नहीं है, वरन् भास्करराय कृत मन्त्रविभाग अतीव प्रामाणिक है। कारण कि भास्करराय तन्त्रपरम्परा के मूर्धन्य विद्वान् हैं। आज समस्त आगम व शाक्तपरम्परा भास्करराय के अनुगत होने से उनकी ऋणी है, जबकि नागेशभट्ट के किसी तान्त्रिक-परम्परा के अनुगत होने का कोई प्रमाण नहीं है। अतः जिन प्रतियों में गुप्तवती के आधार पर मन्त्रविभागपूर्वक संख्याकन किया गया है, वे तो ठीक ही हैं; शेष अशुद्ध हैं।

११. प्रचलित प्रतियों में रहस्यत्रय का विनियोग इस प्रकार है : ‘अस्य श्रीसप्तशतीरहस्यत्रयस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप् छन्दः, महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः’ इत्यादि। प्रत्युत् प्राचीन प्रतियों में ‘अस्य श्रीरहस्यत्रयस्य ब्रह्माऽच्युतरुद्रा ऋषयः नवदुर्गा देवता अनुष्टुप् छन्दः महालक्ष्मीर्बीजं श्रीः शक्तिः’ इत्यादि पाठ मिलता है, जो कि समीचीन है।

१२. सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र को सप्तशती का एक महत्त्वपूर्ण सम्प्रति सभी लोग मानते हैं तथा श्रद्धापूर्वक इसका पाठ भी करते हैं। पर प्राचीन टीकाकार व दुर्गापाठ-सम्बन्धी ग्रन्थ इसपर मौन हैं। जो लोग सप्तशतीपाठ क्रम में सिद्धकुञ्जिका के पाठ को बीच में रखते हैं, वे स्वयं ही अपना पाठ खण्डित कर लेते हैं। अतः रहस्यत्रय के बाद व क्षमापन से पूर्व सिद्धकुञ्जिका पढने में कोई हानि नहीं, किन्तु इससे पूर्व पढना सर्वथा असंगतप्राय ही होगा।

पूर्वोक्त विषयों के अतिरिक्त ऐसे अनेकों रहस्य हैं, जिनका लेख के रूप में प्रकाश कर पाना असम्भवप्राय है। इस लेख के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि सप्तशती के वर्तमान संस्करणों में विद्यमान त्रुटियों पर साधकों का ध्यान केन्द्रित हो तथा वे सब विषयों पर चिन्तन करके प्राचीन ग्रन्थों के अवलोकन में प्रवृत्त हों। दुर्गासप्तशती के एक ऐसे विशुद्ध-संस्करण की अपेक्षा है, जिसको प्रकाशित करते समय सभी वेदानुकूल सम्प्रदायों के मान्य आचार्यों की सम्मति व प्रशस्ति प्राप्त हो तथा जो सप्तशती-परम्परा में पिछले २०० वर्षों से आयी विकृतियों को दूर करने के लिए आदर्शरूप में स्थित होकर समाज का मंगल करे। भगवत्कृपा से इस कार्य को करने हेतु हम कृतसंकल्प हैं तथा निरन्तर शोध में प्रवृत्त रहने से इस कार्य को शीघ्र ही हरि-गुरु-कृपा के अमोघ प्रभाव से पूर्ण करने हेतु निरत हैं। नारायणस्मृतिः।।


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