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भारत के प्रसिद्ध वास्तुसम्मत और वास्तु दोषयुक्त मंदिर

भारत के प्रसिद्ध वास्तुसम्मत और वास्तु दोषयुक्त मंदिर

Rekha Kalpdev
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भारत में अनेक धर्म एवं जातियां हैं तथा वे सभी किसी न किसी शक्ति की पूजा आराधना करते हैं। सबकी विधियां अलग हैं परंतु सभी एक ऐसे एकांत स्थान पर आराधना करते हैं, जहां पूर्ण रूप से ध्यान लगा सकें, मन एकाग्र हो पाए। इसीलिए मंदिर निर्माण में वास्तु का बहुत ध्यान रखा जाता है। यदि हम भारत के प्राचीन मंदिरों पर नजर डालें तो पता चलता है कि सभी का वास्तुशिल्प बहुत अधिक सुदृढ़ था। वहां भक्तों को आज भी आत्मिक शांति प्राप्त होती है। वैष्णो देवी मंदिर, बद्रीविशाल जी का मंदिर, तिरुपति बालाजी का मंदिर, नाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी का मंदिर व उज्जैन स्थित भगवान महाकाल का मंदिर कुछ ऐसे मंदिर हैं जिनकी ख्याति व मान्यता दूर दूर तक, यहां तक कि विदेशों में भी, है। ये सभी मंदिर वास्तु नियमानुसार बने हैं तथा प्राचीनकाल से वैसी ही स्थिति में खड़े हैं।

भारत विभिन्न संस्कृतियों का देश है और विश्व में इसके संबंध में कई प्रकार की आस्थाएं जुड़ी हुई हैं। इनमें हिन्दुओं का सबसे पुराना धर्म शामिल है। भारत में, इसका पालन हजारों सालों से असंख्य मंदिरों में किया जा रहा है। परंतु इनमें दक्षिण भारत का पहाड़ों पर मंदिर स्थित है जिसमें सबसे अधिक हिन्दु भक्त दर्शन के लिएआते हैं। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुमला पहाड़ पर स्थित मंदिर भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्री वेंकटेश्वर को समर्पित है। ऐसा कहा जाता है कि कलियुग द्वारा दी जा रही यातना और संकट से मानव जाति को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अवतार लिया।

इसमें ऐसी शक्ति है जो विश्व भर के विभिन्न जाति के भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है। यह आध्यात्मिक एकता की भूमि है, जहां पर पवित्र नदियाँ कलंक धोती हैं। यह देवी और देवताओं की भूमि है, यहाँ पर आने वाले भक्तों को भीतरी आनंद और सुख शांति की प्राप्ति होती है। जीवन के सभी पहलू पवित्र और पावन हैं इसलिए हर पल को हंसी खुशी से भगवान का प्रसाद समझकर इसे सम्मान देते हुए पालनहार की इच्छा से जीवन बितायें। भगवान वेंकटेश्वर को बालाजी, गोविन्दा और श्रीनिवास के नाम से भी जाना जाता है।

तिरुपति बालाजी मंदिर

विश्व का सबसे प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर वास्तु और उसके सिद्धांतों का पालन करने वाला जीवंत उदाहरण है। वास्तु शास्त्र के सिद्धांत को अमल में लाने के कारण ही इसकी प्रसिद्धि और समृद्धि बढ़ी, जिसके लिए आभार प्रकट करते हैं। यह भारत का सबसे प्राचीन मंदिर है। कलियुग के देवता के नाम से विख्यात भगवान वेंकटेश्वर की प्राण प्रतिष्ठा शंकराचार्य के कर कमलों द्वारा की गयी। यहाँ महत्वपूर्ण है कि वास्तु की दृष्टि से यह सात पहाड़ों से घिरा है।

दक्षिण छोर की सबसे ऊँची पहाड़ी पर भगवान की मूर्ति पश्चिम दिशा में लगी है जिनका मुख पूर्व की ओर है। पहाड़ी की ऊँचाई पश्चिम की ओर है और जैसे ही हम पूर्वी दिशा में आते हैं, तो पहाड़ों की ऊँचाई कम होती जाती है और मैदान दिखाई देने लगते हैं। पूर्वी दिशा की घाटियाँ और दक्षिण और पश्चिम की ओर पहाड़ियाँ आर्थिक समृद्धि और सम्पदा का इशारा करती हैं। इसी प्रकार भगवान स्वयं ही पूरे युग के वित्त को नियंत्रित करते हैं।

जो कोई भी भक्त वहाँ अपनी इच्छा लेकर जाता है उसकी इच्छा पूर्ण होती है और वहाँ रात्रि में रहने से रिचार्ज हो जाता है। रिचार्ज हो जाने के बाद वह आधुनिक युग की चुनौतियों से संघर्ष करने में सक्षम हो जाता है और आगे बढ़ता जाता है। मंदिर से प्राप्त होने वाली ऊर्जा भक्तों को बार-बार अपनी ओर आकर्षित करती है और भगवान बालाजी उसकी अन्य इच्छा की पूर्ति कर देते हैं। इसको स्वयं महसूस करने के लिए मंदिर से सीधे नीचे आने की बजाय 4000 सीढ़ियों से आयें जिसके लिए 3-4 घंटे लगेंगे।

लोगों से वहाँ बात करें और उन्हें हुए लाभ को जानंे और आपको लोगों के स्वस्थ जीवन, शिक्षा में सफलता या नौकरी में पदोन्नति या वैवाहिक जीवन की सफलता से संबंधित कई कहानियाँ सुनने को मिलेंगी। भक्त भगवान से माँगता है और भगवान उसकी सभी इच्छा पूरी कर देते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वहाँ वास्तु की ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है। बालाजी मंदिर विश्व का सबसे बड़ा आश्चर्य है और पूरे ब्राह्मण्ड में वास्तु की आभा प्रदर्शित करता है। भक्त न केवल भगवान बालाजी का आशीर्वाद प्राप्त करता है, बल्कि वहाँ जाकर मंदिर की स्थलाकृति का स्वयं अध्ययन करता है। वास्तु के सिद्धांत को देखने मंदिर काॅम्प्लेक्स की डिजायन और लोगों की सुरक्षा और समारोह कैसे होते हैं इनकी जानकारी प्राप्त करता है।

बृहदेश्वर मंदिर

बृहदेश्वर मंदिर को पेरुवुडयार कोविल, राजराजेश्वरम् भी कहा जाता है जिसे ग्याहरवीं सदी में चोल सम्राट राज राजा-प् ने तत्तकालीन गंगईकोंडा चोलापुरम में बनवाया था जो वर्तमान में तमिलनाडु राज्य में स्थित तंजावुर है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है। यह मंदिर ग्रेनाइट की विशाल चट्टानों को काटकर वास्तु शास्त्र के हिसाब से बनाया गया है। इसमें एक खासियत यह है कि दोपहर बारह बजे इस मंदिर की परछाईं जमीन पर नहीं पड़ती।

सोमनाथ मंदिर

गीता, स्कंदपुराण और शिवपुराण जैसी प्राचीन किताबों में भी सोमनाथ मंदिर का जिक्र मिलता है। सोम का मतलब है चन्द्रमा और सोमनाथ का मतलब, चन्द्रमा की रक्षा करने वाला। एक कहानी के अनुसार सोम नाम का एक व्यक्ति अपने पिता के श्राप की वजह से काफी बीमार हो गया था। तब भगवान शिव ने उसे बीमारी से छुटकारा दिलाया था, जिसके बाद शिव के सम्मान में सोम ने यह मंदिर बनवाया। यह मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है जो सौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र में है। ऐसी मान्यता है कि यह वही क्षेत्र है जहां कृष्ण ने अपना शरीर त्यागा था। यह मंदिर अरब सागर के किनारे बना हुआ है और साउथ पोल और इसके बीच कोई जमीन नहीं है।

केदारनाथ मंदिर

हिमालय की गोद, गढ़वाल क्षेत्र में भगवान शिव के अलौकिक मंदिरों में से एक केदारनाथ मंदिर स्थित है। एक कहानी के अनुसार इसका निर्माण पांडवों ने युद्ध में कौरवों की मृत्यु के प्रायश्चित के लिए बनवाया था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने इसका जीर्णोद्वार करवाया। यह उत्तराखंड के छोटे चार धामों में से एक है जिसके लिए यहां आने वालों को 14 किलोमीटर के पहाड़ी रास्तों पर से गुजरना पड़ता है। यह मंदिर ठन्डे ग्लेशियर और ऊंची चोटियों से घिरा हुआ है जिनकी ऊंचाई लगभग 3,583 मीटर तक है। सर्दियों के दौरान यह मंदिर बंद कर दिया जाता है। सर्दी अधिक पड़ने की सूरत में भगवान शिव को उखीमठ ले जाया जाता है और पांच-छः महीने वहीं उनकी पूजा की जाती है।

जगन्नाथ मंदिर

बारवीं सदी में बना यह मंदिर उड़ीसा के पुरी में बना हुआ है जिस कारण इसे जगन्नाथ पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर भगवान कृष्णा के साथ-साथ उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा को समर्पित है। इस मंदिर में गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है।

मीनाक्षी टेम्पल, मदुरई

मदुरई का मीनाक्षी मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध है बल्कि यह कला के दीवानों के लिए भी किसी जन्नत से कम नहीं है। यह मंदिर देवी पार्वती और उनके पति शिव को समर्पित है। मंदिर के बीचों बीच एक सुनहरा कमल रुपी तालाब है। मंदिर में करीब 985 पिल्लर हैं, हर पिल्लर को अलग-अलग कला कृतियों द्वारा उकेरा गया है। इस मंदिर का नाम विश्व के सात अजूबों के लिए भी भेजा जा चुका है।

अक्षरधाम मंदिर

यमुना का किनारा जहां एक ओर दिल्ली को दो भागों में बांटता है, वहीं अक्षरधाम मंदिर आस्था के जरिये दिल्ली के दोनों किनारों को आपस में जोड़ता है। अक्षरधाम मंदिर, वास्तुशास्त्र और पंचशास्त्र के नियमों को ध्यान में रख कर बनाया गया है। इसका मुख्य गुम्बद मंदिर से करीब 11 फीट ऊंचा है। इस मंदिर को बनाने में राजस्थानी गुलाबी पत्थरों का उपयोग किया गया है। यहां पर होने वाला लाइट और म्यूजिक शो मंदिर की सुन्दरता में चार चांद लगा देता है।

श्री पद्मनाभस्वामी टेम्पल

केरला के तिरुवनंतपुरम में श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर स्थित है जो कि भगवान विष्णु को समर्पित है। यहां केवल हिन्दू ही प्रवेश कर सकते हैं। इस मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को सिर्फ धोती, जबकि औरतों को साड़ी पहनना जरुरी होता है।

द्वारकाधीश मंदिर

जैसा कि इस मंदिर के नाम से प्रतीत होता है, यह द्वारका में है और भगवान कृष्ण को समर्पित है। इसको जगत मंदिर भी कहा जाता है। यहां के प्रवेश द्वार को स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार भी कहते हैं।

कोणार्क सूर्य मंदिर के ध्वंस का कारण - वास्तु दोष पीड़ित

यह मंदिर अपने वास्तु दोषों के कारण मात्र 800 वर्षों में ही ध्वस्त हो गया। यह इमारत वास्तु-नियमों के विरुद्ध बनी थी। मंदिर का निर्माण रथ आकृति होने से, पूर्व दिशा एवं आग्नेय एवं ईशान कोण खंडित हो गए। पूर्व से देखने पर पता लगता है, कि ईशान एवं आग्नेय कोणों को काटकर यह वायव्य एवं र्नैत्य कोणों की ओर बढ़ गया है। कालापहाड़ कोणार्क मंदिर के गिरने से संबंधी एक अति महत्वपूर्ण सिद्धांत, कालापहाड़ से जुड़ा है। उड़ीसा के इतिहास के अनुसार कालापहाड़ ने सन् 1508 में यहां आक्रमण किया, और कोणार्क मंदिर समेत उड़ीसा के कई हिन्दू मंदिर ध्वस्त कर दिये।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मदन पंजी बताते हैं, कि कैसे कालापहाड़ ने उड़ीसा पर हमला किया, कोणार्क मंदिर सहित उसने अधिकांश हिन्दू मंदिरों की प्रतिमाएं भी ध्वस्त कर दिए। हालांकि कोणार्क मंदिर की 20-25 फीट मोटी दीवारों को तोड़ना असम्भव था, उसने किसी प्रकार से दधिनौति (मेहराब की शिला) को हिलाने का प्रयोजन कर लिया, जो कि इस मंदिर के गिरने का कारण बना। दधिनौति के हटने के कारण ही मंदिर धीरे-धीरे गिरने लगा, और मंदिर की छत से भारी पत्थर गिरने से, मूकशाला की छत भी ध् वस्त हो गयी।

उसने यहां की अध् िाकांश मूर्तियां और कोणार्क के अन्य कई मंदिर भी ध्वस्त कर दिये। कोण् ाार्क का सूर्य मंदिर, भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी जिले के पुरी नामक शहर में स्थित है। कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर सूर्य देव के रथ के रूप में निर्मित है। इसको पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बहुत ही सुंदर बनाया गया है। संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया है। मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है। आज इसका काफी भाग ध्वस्त हो चुका है। इसका कारण वास्तु दोष एवं मुस्लिम आक्रमण रहे हैं।

ध्वस्त होने का कारण अनेक वास्तु दोष

इस मंदिर के मुख्य वास्तु दोष इस प्रकार हैं-

वास्तु नियमों के विरुद्ध बना होने से विश्व की प्राचीनतम इमारतों में से एक यह सूर्य मंदिर, जो पाषाण कलाकृति का अनुपम व बेजोड़ उदाहरण है, समय से पूर्व ही धाराशायी हो गया। यह मंदिर अपना वास्तविक रूप खो चुका है। वर्तमान में यह विश्व सांस्कृ तिक विरासत के रूप में संरक्षित है। इससे थोड़ी दूर पर समुद्र है जो चंद्रभागा के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र की दंतकथा के कारण भी प्रसिद्ध है।

कोणार्क सूर्य मंदिर के मुख्य वास्तु दोष दक्षिण-पश्चिम कोण में छाया देवी मंदिर की नींव प्रधानालय की अपेक्षा काफी कम ऊंचाई में है। उसके र्नैत्य भाग में मायादेवी का मंदिर और नीचे भाग में है। पूर्व से देखने पर पता लगता है कि ईशान, आग्नेय को काटकर वायव्य, र्नैत्य की ओर बढ़ा हुआ है। प्रधान मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने नृत्यशाला है जिससे पूर्व द्वार अनुपयोगी सिद्ध हुआ। क्षेत्र में विशाल कुआं स्थित है। दक्षिण एवं पूर्व दिशाओं में विशाल द्वार हैं, जिस कारण मंदिर का वैभव एवं ख्याति क्षीण हो गई है।

भारत के ईशान और पूर्वी भाग पश्चिम से कुछ नीचे झुके हुए तथा बढ़े हुए होने के कारण ही यह देश अपने आध्यात्म, संस्कृति दर्शन तथा उच्च जीवन मूल्यों एवं धर्म से समस्त विश्व को सदैव प्रभावित करता रहा है। वास्तु का प्रभाव मंदिरों पर भी होता है, विश्व प्रसिद्ध तिरूपति बालाजी का मंदिर वास्तु सिध्दांतों का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, वास्तुशास्त्र की दृष्टि से यह मंदिर शत प्रतिशत सही बना हुआ है।

इसी कारण यह संसार का सबसे धनी एवं ऐश्वर्य सम्पन्न मंदिर है जिसकी मासिक आय करोड़ों रुपये है। यह मंदिर तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है किन्तु उत्तर और ईशान नीचा है। वहां पुष्करणी नदी है, उत्तर में आकाश गंगा तालाब स्थित है जिसके जल से नित्य भगवान की मूर्ति को सृजन कराया जाता है। मंदिर पूर्वमुखी है और मूर्ति पश्चिम में पूर्व मुखी रखी गई है।

इसके ठीक विपरीत कोणार्क का सूर्य मंदिर है। अपनी जीवनदायिनी किरणों से समस्त विश्व को ऊर्जा, ताप और तेज प्रदान करने वाले भुवन भास्कर सूर्य के इस प्राचीन अत्यन्त भव्य मंदिर की वह भव्यता, वैभव और समृद्धि अधिक समय तक क्यों नहीं टिक पायीं? इसका कारण वहां पर पाये गये अनेक वास्तु दोष हैं।

मुख्यतः मंदिर का निर्माण स्थल अपने चारों ओर के क्षेत्र से नीचा है। मंदिर के भूखण्ड में उत्तरी वायव्य एवं दक्षिणी र्नैत्य बढ़ा हुआ है जिनसे उत्तरी ईशान एवं दक्षिणी आग्नेय छोटे हो गये हैं। रथनुमा आकार के कारण मंदिर का ईशान और आग्नेय कट गये हैं तथा आग्नेय में कुआं है। इसी कारण भव्य और समृद्ध होने पर भी इस मंदिर की ख्याति, मान्यता एवं लोकप्रियता नहीं बढ़ सकी।



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