शनिदेव की असीम कृपा पाने के लिए इस प्रकार कीजिए व्रत विधि । | Future Point

शनिदेव की असीम कृपा पाने के लिए इस प्रकार कीजिए व्रत विधि ।

By: Future Point | 21-Nov-2019
Views : 6579
शनिदेव की असीम कृपा पाने के लिए इस प्रकार कीजिए व्रत विधि ।

शनिदेव की पूजा करने से कष्टों का निवारण होता है क्योंकि वह व्यक्ति के कर्मों के अनुसार फल देते हैं. अगर आप अपने जीवन में दुखो से घिरे हुए हैं तो शनिदेव का व्रत और पूजन करने से आपके जीवन में खुशियों की आगमन अवश्य होगा।

शनि व्रत की कथा-

एक समय ब्रह्मांड के नवग्रहों में आपस में विवाद हो गया। वे सभी तय करना चाहते थे कि उनमें सबसे बड़ा कौन है? इस विवाद का हल निकालने वे सभी देवराज इंद्र के पास पहुंचे। इंद्र ने विवाद से बचने के लिए नवग्रहों से कहा कि धरती पर उज्जैन में विक्रमादित्य नाम का राजा है, जो सदा न्याय करता है। वही आपके विवाद का निर्णय कर सकता है। इंद्र की बात मान नवग्रह राजा विक्रमादित्य के पास अपना मामला लेकर पहुंचे। राजा जानते थे कि वे जिसे छोटा बताएंगे, वही कुपित हो जाएगा, पर वे न्याय की राह नहीं छोड़ना चाहते थे। राजा ने नव धातुओं के नौ सिंहासन बनाए और हर ग्रह को उनके अनुरूप क्रमशः स्थान ग्रहण करने को कहा।

इस तरह लोहे का सिंहासन सबसे बाद में था, जो शनिदेव का था। इस तरह शनिदेव को सभी ग्रहों में अंतिम स्थान मिला। इससे शनिदेव राजा पर कुपित हो गए और अपना समय आने पर विक्रमादित्य को दुख देने की चेतावनी देकर चले गए। समय के साथ राजा विक्रमादित्य की कुंडली में शनि की साढ़े साती आई। इसी समय शनिदेव घोड़े के सौदागर बन कर राजा के पास आए। राजा विक्रमादित्य एक घोड़ा पसंद कर जैसे ही उसकी सवारी करने लगे, वह राजा को लेकर जंगल में भाग गया और गायब हो गया। जंगल में भटककर राजा किसी नए देश जा पहुंचे। वहां एक शहर में एक सेठ से बात करने लगे। सेठ के यहां उनके पहुंचते ही खूब सामान बिका, तो वह प्रसन्न होकर राजा को भोजन कराने घर ले गया।

भोजन करते हुए राजा ने देखा कि एक खूंटी पर हार लटका है और वह खंूटी ही उसे निगल रही है। राजा के भोजन करने पर सेठ ने खूंटी पर हार ना पाया, तो उसे अपने राजा के यहां कैद करवा दिया। राजा ने चोरी के आरोप में विक्रमादित्य के हाथ कटवा दिए। इसके बाद विकलांग राजा को एक तेली अपने घर ले गया और कोल्हू के बैलों को हांकने का काम दे दिया। इस तरह साढ़े सात साल बीत गए और एक रात शनि की महादशा समाप्त होते ही विक्रमादित्य ने ऐसा राग छेड़ा कि राज्य की राजकुमारी ने उनसे विवाह का प्रण ले लिया। लाख समझाने पर भी राजकुमारी ना मानी तो राजा ने विकलांग विक्रमादित्य से अपनी राजकुमारी का विवाह कर दिया। रात्रि में शनिदेव ने विक्रमादित्य के सपने में आकर कहा कि तुमने मुझे सबसे छोटा ठहराया था ना।

Book Online Shani Shanti Puja

अब देखो मेरा ताप और बताओ कि किस ग्रह में मेरे जितना प्रकोप है? राजा ने शनिदेव से माफी मांगी, शनिदेव ने उन्हें माफ कर हाथ लौटा दिए। सुबह सब तरफ राजा विक्रमादित्य और शनिदेव की कथा की चर्चा होने लगी। विक्रमादित्य की जानकारी मिलते ही वह व्यापारी भी माफी मांगने आया और उन्हें फिर भोजन का निमंत्रण दे गया। राजा जब उसके यहां भोजन कर रहे थे तो उसी खूंटी ने सबके सामने हार वापस उगल दिया। इस तरह सभी के सामने स्पष्ट हो गया कि राजा ने चोरी नहीं की थी। व्यापारी ने राजा से कई बार माफी मांगी और अपनी कन्या का विवाह उनके साथ कर दिया। राजा विक्रमादित्य अपनी दोनों रानियों और ढेर सारे उपहारों के साथ उज्जैन वापस आए और राजकार्य संभाल लिया। इसके साथ ही उन्होंने घोषणा की कि सभी ग्रहों के राजा सूर्यदेव अवश्य हैं लेकिन कर्मफलदाता शनिदेव हैं। उनके अनादर से मेरी इतनी दुर्दशा हुई। इससे बचने के लिए राज्य में सभी जन शनिदेव को प्रसन्न रखने के लिए शनिवार का व्रत रखेंगे। शनिदेव की कृपा से राजा ने पूरे राज्य समेत सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया।

शनिवार व्रत पूजन-

    • ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नहा धोकर और साफ कपड़े पहनकर पीपल के वृक्ष पर जल अर्पण करें।
    • लोहे से बनी शनि देवता की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं।
    • फिर मूर्ति को चावलों से बनाए चौबीस दल के कमल पर स्थापित करें।
    • इसके बाद काले तिल, फूल, धूप, काला वस्त्र व तेल आदि से पूजा करें।
    • पूजन के दौरान शनि के दस नामों का उच्चारण करें- कोणस्थ, कृष्ण, पिप्पला, सौरि, यम, पिंगलो, रोद्रोतको, बभ्रु, मंद, शनैश्चर।
    • पूजन के बाद पीपल के वृक्ष के तने पर सूत के धागे से सात परिक्रमा करें।
    • इसके बाद शनिदेव का मंत्र पढ़ते हुए प्रार्थना करें...

शनैश्चर नमस्तुभ्यं नमस्ते त्वथ राहवे। केतवेअथ नमस्तुभ्यं सर्वशांतिप्रदो भव॥

किनते दिन तक करें पूजा-

  • इसी तरह सात शनिवार तक व्रत करते हुए शनि के प्रकोप से सुरक्षा के लिए शनि मंत्र की समिधाओं में, राहु की कुदृष्टि से सुरक्षा के लिए दूर्वा की समिधा में, केतु से सुरक्षा के लिए केतु मंत्र में कुशा की समिधा में, कृष्ण जौ, काले तिल से 108 आहुति प्रत्येक के लिए देनी चाहिए।
  • इसके पश्चात अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर लौह वस्तु धन आदि का दान अवश्य करें।
  • शनिवार के दिन शनि देव का व्रत कोई भी कर सकता है। चाहे वो स्त्री हो या पुरुष। इस व्रत को करने का सबसे अच्छा समय श्रावण मास के श्रेष्ठ शनिवार का है क्योंकि इस दिन व्रत आरंभ करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है।

शनिवार व्रत के दौरान क्या करना चाहिए-

  • स्नान करने के पश्चात पीपल पेड़ या शमी के पेड़ के नीचे गोबर से लीप ले और वह बेदी बनाकर कलश और शनिदेव की मूर्ति स्थापित करें।
  • शनिदेव की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराए और प्रतिमा को काले पुष्प , धुप , दीप , प्रसाद चढांए।
  • शनिदेव की पूजा करते समय उनके दस नाम का ध्यान करें- कोणास्थ , पिंगलो, बभु , कृष्णों , रौद्रोंतको , यम , सौरि , शनैश्चर , मन्द , पिप्पला।
  • शनिदेव की पूजा करने के बाद पीपल के पेड़ को सूत का धागा लपेटते हुए सात बार परिक्रमा करे और साथ ही पेड़ की भी पूजा करें।
  • इसके बाद हाथ में चावल और फूल ले कर भगवान शनिदेव की व्रत कथा सुने और पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद सभी को बांटे।
  • महीने के पहले शनिवार को उड़द का भात , दूसरे शनिवार को खीर , तीसरे शनिवार को खजला और अंतिम शनिवार को घी और पूरी से शनिदेव को भोग लगाए।
  • अगर आप शनिदेव की पूजा करते हैं तो उस समय काले वस्त्र को धारण करना काफी शुभ माना जाता है।
  • इस दिन काले कुते और कौए को तेल की चुपड़ी रोटी और गुलाब जामुन खिलाया तो अति लाभकारी होता है।

Previous
Wearing these Gemstones Can Bring Good Luck in your Life!

Next
Get a brilliant love life with solutions by Expert Astrologers