राधाअष्टमी विशेष- महत्व, कथा एवं पूजा विधि। | Future Point

राधाअष्टमी विशेष- महत्व, कथा एवं पूजा विधि।

By : Future Point
Expert Review : Dr. Arun Bansal, Vedic Astrologer | 45+ Years Experience
Published : 27-Aug-2019राधाअष्टमी विशेष- महत्व, कथा एवं पूजा विधि।

हिन्दू शास्त्र में भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है. इस वर्ष 2019 में 6 सिंतबर को राधाष्टमी का त्योहार मनाया जाएगा. इस दिन व्रत का विेषेश महत्व बताया गया है. राधाष्टमी के दिन श्रद्धालु बरसाना की ऊंची पहाड़ी पर स्थित गहवर वन की परिक्रमा करते हैं. इस दिन रात-दिन बरसाना में बहुत ज्यादा रौनक होती है. इसके साथ ही अलग-अलग तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को आयोजन किया जाता है. राधाष्टमी का त्योहार धार्मिक गीतों और कीतर्न के साथ शुरू किया जाता है।

राधा अष्टमी व्रत का महत्व-

राधा अष्टमी के नाम से इस व्रत को जाना जाता है. इस व्रत को करने से धन की कमी नहीं होती और घर में बरकत बनी रहती है. इस व्रत को करने से भाद्रपक्ष की अष्टमी के व्रत से ही महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत भी होती है.राधाष्टमी राधा रानी के अवतरण दिवस के रूप में मनाई जाती है, जिन्हें माता लक्ष्मी का रूप माना जाता है. राधाष्टमी राधा रानी के अवतरण दिवस के रूप में मनाई जाती है, जिन्हें माता लक्ष्मी का रूप माना जाता है, राधा रानी को भगवान कृष्ण की दैवीय प्रेमिका के रूप में जाना जाता है, इनका अवतार कमल के फूल से हुआ, तथा भगवान कृष्ण को भगवान विष्णु के आठवें अवतार रूप में माना गया हैं. राधाष्टमी मुख्य रूप से उन भक्तों द्वारा मनाया जाता है, जो भगवान कृष्ण की आराधना करते हैं. परंपराओं के अनुसार, गौडिया वैष्णव संप्रदाय श्रीकृष्ण एवं राधा रानी के प्रति समर्पित होकर उनकी पूजा करते है, यह संप्रदाय चैतन्य महाप्रभु द्वारा वर्णित भगवत गीता और भागवत पुराण का पाठ करते हैं, चैतन्य महाप्रभु वैष्णव संप्रदाय के संस्थापक है.

गौडिया वैष्णव संप्रदाय राधाष्टमी को अपनी प्रथाओं और परम्पराओं के अनुरूप आधे दिन उपवास का करते हैं, कुछ भक्त इस दिन सख्त उपवास का पालन भी करते हैं, वे पानी की बूंद का उपभोग किए बिना पूरे दिन कड़ा व्रत करते हैं, राधाष्टमी भगवान कृष्ण और राधा रानी के ईश्वरीय प्रेम के समरूप मनाया जाता है, भक्त श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त हेतु प्रशंसा, भजन और गीतों के साथ राधा रानी की पूजा करते हैं. परंपरागत रूप से राधाष्टमी मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र में मनाया जाता है, इस दिन राधा रानी और भगवान कृष्ण के विग्रह पूर्ण रूप से फूलों से सजाया जाता हैं, राधाष्टमी वह दिन है जब भक्त राधा रानी के चरणों के शुभ दर्शन प्राप्त करते हैं, क्योंकि दूसरे दिनों में राधा के पैर ढके रहते हैं. राधाष्टमी के दिन, भक्तों द्वारा दिव्य प्रेमी जोड़े (भगवान कृष्ण और राधा रानी) की प्रशंसा में भक्ति, आध्यात्मिक और श्री राधा गायत्री मंत्र का पाठ आयोजित किया जाता हैं, राधाष्टमी को बरसाना, मथुरा, वृंदावन, नंदगाँव तथा आस-पास के क्षेत्र (ब्रज भूमि) में मुख्य रूप से मनाया जाती है, राधाष्टमी भगवान और मनुष्य के बीच एक अद्वितीय संबंध का प्रतीक है, जो श्रीकृष्ण और राधारानी के निःस्वार्थ दैवीय प्रेम बंधन को दर्शाता है, राधा अष्टमी उत्सव भारत के प्रसिद्ध जन्माष्टमी उत्सव के 15 दिनों के बाद मनाया जाता है।


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राधाष्टमी कथा -

  • पौराणिक कथाओं के अनुसार राधाजी, वृषभानु गोप की पुत्री थी. राधाजी की माता का नाम कीर्ति था. पद्मपुराण में राधाजी को राजा वृषभानु की पुत्री बताया गया है. इस ग्रंथ के अनुसार जब राजा यज्ञ के लिए भूमि साफ कर रहे थे तब भूमि कन्या के रुप में इन्हें राधाजी मिली थी. राजा ने इस कन्या को अपनी पुत्री मानकर इसका लालन-पालन किया.
  • इसके साथ ही यह कथा भी मिलती है कि भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार में जन्म लेते समय अपने परिवार के अन्य सदस्यों से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा था, तब विष्णु जी की पत्नी लक्ष्मी जी, राधा के रुप में पृथ्वी पर आई थी. ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधाजी, श्रीकृष्ण की सखी थी. लेकिन उनका विवाह रापाण या रायाण नाम के व्यक्ति के साथ सम्पन्न हुआ था. ऎसा कहा जाता है कि राधाजी अपने जन्म के समय ही वयस्क हो गई थी. राधाजी को श्रीकृष्ण की प्रेमिका माना जाता है।

राधाष्टमी पूजा विधि-

  • राधाष्टमी के दिन शुद्ध मन से व्रत का पालन किया जाता है. इस दिन राधा जी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराते हैं जिसके बाद उनका श्रंगार किया जाता है।
  • इस दिन राधा जी की सोने या किसी दूसरी धातु से बनी सुंदर प्रतिमा को विग्रह में स्थापित किया जाता है।
  • दोपहर के समय भक्ती और श्रद्धा के साथ राधा जी की अराधना की जाती है. धूप-दीप से आरती के बाद राधाजी को भोग लगाया जाता है।
  • कई ग्रंथों में राधाष्टमी के दिन राधा-कृष्णा की संयुक्त रूप से पूजन की बात कही गई है।
  • राधाष्टमी के दिन सबसे पहले राधाजी को पंचामृत से स्नान कराएं जिसके बाद विधिवत रूप उनका श्रंगार करें।
  • ऐसा कहा जाता है कि इस दिन 27 पेड़ों की पत्तियां और 27 ही कुओं का जल इकट्ठा करें. सवा मन दूध, दही और शुद्ध घी, बूरा और औषधियों से मूल शांति करें।
  • अंत में कई मन पंचामृत से वेदिक मंत्रों के साथ श्यामश्याम का अभिषेक करें. नारद पुराण के अनुसार, राधाष्टमी का व्रत करने वाले भक्तगण ब्रज के दुर्लभ रहस्य तो जान लेते हैं।
  • जो व्यक्ति इस व्रत को विधिवत तरीके से पूरा करता है, उसे सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। Talk To Astrologer