मौनी एकादशी 2019: तिथि, महत्व और उत्सव

By: Future Point | 06-Dec-2019
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मौनी एकादशी 2019: तिथि, महत्व और उत्सव

मौन एकादशी (Maun Ekadashi) जैन समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है जो मगसर महीने के 11वें दिन मनाया जाता है। इसे मौन अग्यार (Maun Agyaras) भी कहा जाता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार यह त्योहार इस वर्ष (यानि साल 2019 में) 8 दिसंबर को मनाया जाएगा।

इस दिन मुख्य रूप से मौन धारण कर पौषध व्रत रखा जाता है। प्राचीन समय में सुव्रत सेठ ने यह व्रत रखा था। हर वर्ष जो व्यक्ति सभी रीति रिवाज़ों के साथ एकादशी के दिन व्रत और तप करता है उसे निर्वाण प्राप्त होता है। उसे देवकुल में जगह मिलती है।

Read in English: Mauni Ekadashi 2019


मौन एकादशी का महत्व

उपासकों के लिए मौन एकादशी का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति एकादशी के दिन 11 वर्ष और 11 महीने का तप करने वाले व्यक्ति की पूजा करता है उसे निर्वाण प्राप्त होता है। प्राचीन समय में सुव्रत सेठ नाम के एक व्यक्ति ने मौन एकादशी के दिन उपासना की थी।

जैन समुदाय के लिए यह दिन बेहद अहम है क्योंकि मौन एकादशी के दिन ही भूत, वर्तमान और भविष्य के तीर्थंकरों के 150 कल्याणक हुए थे।

मौन एकादशी के दिन इन नियमों का पालन करना होता है:

  • शांत रहकर पौषध व्रत रखना।
  • 12 लोगस्स का कायोत्सर्ग
  • 12 खमासमण सूत्र
  • 12 स्वस्तिक और इस जाप पद की 20 नवकारवाली

मौन एकादशी से संबंधित कथाएं

वासुदेव श्रीकृष्ण और भगवान नेमिनाथ की कथा

एक बार की बात है। श्री नेमिनाथ द्वारका शहर आए थे। जब राजा कृष्ण वासुदेव को इसका पता चला तो वे उनसे मिलें और उनका खूब आदर-सत्कार किया।

जब उन्होंने भगवान नेमिनाथ का वचन सुना तो वे उठ खड़े हुए। उनके समक्ष झुक गएं और पूछा, “हे ईश्वर! एक राजा होने के नाते मेरे ऊपर राज्य की बहुत सी ज़िम्मेदारियों का भार है। ऐसे में मैं अपने धर्म का पालन कैसे करूं? कृप्या मुझे कोई उपाय सुझाएं!”

जवाब में श्री नेमिनाथ ने कहा, “पूरे वर्ष में यह वह दिन है जिस दिन सबसे कम प्रतिज्ञाएं ली जा सकती हैं लेकिन उनसे बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।”

उन्होंने श्री वासुदेव को मगशीर्ष के पूर्वार्ध की एकादशी (मगसर सुद 11) को सभी रस्मों और रिवाज़ों के साथ उपासना करने को कहा।

सुव्रत सेठ की कहानी

बहुत पहले धातकी खंड के विजयपुर नगर में सूर नाम का सेठ रहा करता था। वह बहुत ज्ञानी था। इसलिए उस शहर के राजा भी सेठ का सम्मान करते थे और उसे बुद्धिमान व्यक्ति मानते थे।

एक रात जब सेठ सुकून से सो रहा था तो अचानक मध्यरात्रि में उठ गया। वह बेचैन होकर सोचने लगा कि अपने पूर्व जन्म में किए गए अच्छे कर्मों के कारण ही वह वर्तमान में एक खुशहाल और ऐश्वर्य जीवन जी रहा है। अगर उसे आगे की ज़िंदगी भी अच्छे से जीनी है तो इस जीवन में भी कुछ अच्छा करना होगा। इसके बिना उसका जीवन व्यर्थ है।

जब वह सुबह उठा तो अपने गुरु से मिला और उनके उपदेश सुनें। गुरु के विचारों से वह बेहद प्रभावित हुआ और उनसे पूछा, “हे गुरु, मैं जिस तरह का कार्य करता हूं, उसके चलते मेरे लिए हर रोज़ उपासना करना और मेरे धर्म का पालन करना मुमकिन नहीं है। क्या आप बता सकते हैं कि वर्ष के 360 दिन में से किस दिन थोड़ा तप करके अधिकतम पुण्य प्राप्त किया जा सकता है?”

इस पर उसके गुरु ने कहा, “मगसर महीने की एकादशी (11वें दिन) को तुम्हें मौन रहकर पौषध व्रत रखना होगा। यह व्रत इसी दिन लगातार 11 साल 11 महीने तक रखना होगा। इस तप को पूरा करने के बाद ही तुम्हें निर्वाण प्राप्त होगा।”

यह सुनने के बाद उसने अपने पूरे परिवार के साथ एकादशी व्रत रखना शुरु कर दिया। 11 वर्ष और 11 महीने तक व्रत रखने के बाद उसका यह तप पूरा हुआ। तप पूरा होने के 15 दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो गई और उसे 11वें स्वर्ग (देवलोक) में जगह मिली।

11वें देवलोक में 21 सागरोपम का समय व्यतीत करने के बाद उसने भारत क्षेत्र के सौरीपुर नगर में समुद्रदत्त के पुत्र के रूप में जन्म लिया। उसके पिता ने उसे सुव्रत नाम दिया। युवा होने पर उसका 11 कन्याओं से विवाह हुआ।

जब उसे अपने खुशहाल जीवन का आभास हुआ और लगा कि एकादशी के कारण ही उसे 11वें देवलोक में जगह मिली थी, तो उसने अपनी 11 पत्नियों के साथ एकादशी के व्रत का प्रण लिया।

उसकी सभी पत्नियों को केवलज्ञान प्राप्त हुआ और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। उसके कुछ समय पश्चात राजा सुव्रत को भी केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवलोक के सभी देवों ने उसकी मुक्ति का उत्सव मनाया।

उसके बाद वह कमल पर विराजमान हुआ और अपने शिष्यों को उपदेश दिए। कुछ वर्षों के पश्चात उसे भी मोक्ष की प्राप्ति हुई।

मौन एकादशी का महत्व

मौन एकादशी जैन समुदाय का सबसे प्रमुख त्योहार है जिसके निम्न कारण हैं:

  • जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर श्री अरनाथ इसी दिन मोह माया त्याग कर संयासी बने थे।
  • जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ ने भी इसी दिन संसार त्याग कर निर्वाण प्राप्त किया था।
  • जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ को भी इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।

मंत्र

मौन एकादशी के दिन इस मंत्र का जाप करें:
“ओम् रं श्रीं मल्लिनाथ सर्वज्ञाय नमः”

भूत, भविष्य और वर्तमान के कुल 150 कल्याणक हैं। मौन एकादशी के दिन आराधना करने से व्यक्ति को पूर्ण निर्वाण या मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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