जानिए, दशहरा के पर्व पर क्यों की जाती है शमी वृक्ष की पूजा।

By: Future Point | 24-Sep-2019
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जानिए, दशहरा के पर्व पर क्यों की जाती है शमी वृक्ष की पूजा।

हमारी भारतीय संस्कृति में प्रत्येक त्यौहार का अपना एक अलग महत्व होता है, प्रत्येक त्यौहार हमें यह संदेश देता है कि हम जीवन को किस प्रकार समृद्ध बना सकते हैं. विजयादशमी पर रावण दहन के बाद कई प्रांतों में शमी के पत्ते को सोना समझकर देने का प्रचलन है, तो कई जगहों पर इसके वृक्ष की पूजा का प्रचलन. अश्विन मास के शारदीय नवरात्र में शक्ति पूजा के नौ दिन बाद दशहरा अर्थात विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है, असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक इस पर्व के दौरान रावण दहन और शस्त्र पूजन के साथ शमी वृक्ष का भी पूजन किया जाता है, संस्कृत साहित्य में अग्नि को ‘शमी गर्भ’ के नाम से जाना जाता है।

दशहरा पर शमी वृक्ष पूजन का महत्व-

शारदीय नवरात्र में शक्ति पूजा के नौ दिन बाद जब विजयादशमी आती है उसे दशहरा कहा जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक यह पर्व विजय का भी प्रतीक है, इस दिन श्रीरामचंद्र जी ने बुराई के प्रतीक रावण का अंत किया था, तभी से यह प्रथा चली आ रही है और रावण दहन और शस्त्र पूजन के साथ-साथ शमी का पूजन किया जाता है, संस्कृत में अग्नि को ‘शमी गर्भ’ कहा जाता है, हिन्दू धर्म में दशहरा के दिन इस वृक्ष की पूजन करते हैं, खासकर क्षत्रियों में इसका महत्व अधिक है. महाभारत युद्ध में पांडवों ने इसी पेड़ के ऊपर अपने हथियार छुपाकर रखे थे और बाद में कौरवों से जीत दिलाने में इस पेड़ का भी अहम स्थान है, इसी दिन संध्याकाल में शमी का पूजन करने से आरोग्य और धन प्राप्त होता है, यह प्राचीन परंपरा है।

शमी वृक्ष की पूजा से होती हैं सभी मनोकामनाएं पूरी-

ऐसा माना जाता है कि दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, खासकर क्षत्रियों में इस पूजन का महत्व ज्यादा है, और इसी तरह मान्यता है कि शमी का वृक्ष घर में लगाने से देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है, शमी के वृक्ष की पूजा करने से घर में शनि का प्रकोप कम होता है, शमी के वृक्ष होने से सभी तंत्र-मंत्र और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है. मान्यता के अनुसार मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम ने लंका पर आक्रमण किया था और इससे पहले शमी के पेड़ के सामने शीष झुकाकर विजय की प्रार्थना की थी, भगवान ने इन पत्तियों का स्पर्श करके जीत हासिल की थी, इसलिए शमी की पत्तियों का आज भी महत्व है. इस दिन इसकी पूजा करने से सुख-समृद्धि और जीत का आशीर्वाद मिलता है, बाद में इसका महत्व और कीमती माना जाने लगा और इसे सोने के समान बताया गया और दशहरे पर शुभकामनाओं के साथ एक दूसरे में बांटने की परंपरा शुरू हो गई, इस दौरान यह माना जाता है कि सोने जैसी इसकी पत्तियां है, जो आपके जीवन में सैभाग्य और समृद्धि और जीत का आशीष दें।

शमी वृक्ष पर पौराणिक कथा-

विजया दशमी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा भी है. महर्षि वर्तन्तु का शिष्य कौत्स थे, महर्षि ने अपने शिष्य कौत्स से शिक्षा पूरी होने के बाद गुरू दक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्रा की मांग की थी, महर्षि को गुरू दक्षिणा देने के लिए कौत्स महाराज रघु के पास गए, महाराज रघु ने कुछ दिन पहले ही एक महायज्ञ करवाया था, जिसके कारण खजाना खाली हो चुका था, कौत्स ने राजा से स्वर्ण मुद्रा की मांग की तब उन्होंने तीन दिन का समय मांगा, राजा धन जुटाने के लिए उपाय खोजने लग गया, उसने स्वर्गलोक पर आक्रमण करने का विचार किया, राजा ने सोचा स्वर्गलोक पर आक्रमण करने से उसका शाही खजाना फिर से भर जाएगा, राजा के इस विचार से देवराज इंद्र घबरा गए और कोषाध्याक्ष कुबेर से रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करने का आदेश दिया, इंद्र के आदेश पर रघु के राज्य में कुबेर ने शमी वृक्ष के माध्यम से स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करा दी. ऐसा माना जाता है कि जिस तिथि को स्वर्ण की वर्षा हुई थी उस दिन विजयादशमी थी. राजा ने शमी वृक्ष से प्राप्त स्वर्ण मुद्राएं कौत्स को दे दीं, अतः इस घटना के बाद विजयादशमी के दिन शमी के वृक्ष के पूजा होने लगी।

शमी वृक्ष से लाभ-

  • गुजरात के किसान खेतों में शमी बोते हैं, जिसे उन्हें कई लाभ मिलते हैं, यह वृक्ष पानखर जैसा कांटेदार होता है, जिसके पत्ते सूख जाने के बाद उसमें छोटे-छोटे पीले फूल आते हैं, उसकी जड़ जमीन में बहुत गहराई तक होती है, जो उपज के सूखने नहीं देती है।
  • इस पेड़ से सालभर के लिए चारा मिल जाता है, गर्मियों में यह काफी फलता-फूलता है और उसमें ढेर सारे पत्ते रहते हैं, खेतों की मेढ़ पर लगाने से हवा का दबाव भी नियंत्रित रहता है जो तूफान से बचाता है।
  • इसकी सूखी लकड़ियों से आज भी कई गांवों का चूल्हा जलता है, विदेशी कृषि विशेषज्ञों ने भी माना है कि जिस खेत में यह पेड़ लगा होता है उस खेत के किसान को फायदे में ही रहते हैं।
  • इसीलिए हिंदू धर्म में बरगद,पीपल, तुलसी और बिल्व पत्र के समान पवित्र पेड़ों की तरह ही शमी को भी पूज्यनीय माना है।
  • इसलिए हमें शमी के पत्ती (सोना पत्ती) बुजुर्गों को देकर आशीर्वाद लेना चाहिए।

शमी मंत्र -

अमङ्गलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च । दु:स्वप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येहं शमीं शुभाम् ।। शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका । धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ।। करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया । तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वंभवश्रीरामपूजिते ।।

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