Shri Krishna ki 16 kalayen: जानिए भगवान श्रीकृष्ण की 16 कलाओं की शिक्षाएं

By: Future Point | 15-Feb-2024
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Shri Krishna ki 16 kalayen: जानिए भगवान श्रीकृष्ण की 16 कलाओं की शिक्षाएं

किसी ने शयाम कहा, किसी ने केशव कहा, कोई कृष्ण कहें, कोई गोपाल सबके प्यारे, सबके लाडले रासबिहारी, मायापति, माधव। मुरली धामी तो बन गये मुरलीधारी, उठायो गोवर्धन तो कहलाये  गिरिधारी एक ऊर्जा, एक श्री  हरि जिनके नाम पुकारे जन अनेक। 

श्री विष्णु जी के 8वें अवतार भगवान श्रीकृष्ण जी ने जितनी लीलाएं की, उतनी लीलाएं, किसी अन्य अवतार ने नहीं की। भारत के अलग अलग राज्यों में इन्हें अलग अलग नामों से पुकारा जाता है।  भगवान श्रीकृष्ण की जन्म नगरी मथुरा में इन्हें, गोविन्द, गोपाल, कान्हा, कृष्ण कहा जाता है तो , राजस्थान में इनके नाम बदल जाते है, वहां कोई इन्हें ठाकुरजी और कोई भाव से श्रीनाथजी कहता है। मराठी नगरी महाराष्ट्र में विठ्ठल जी महाराज कहलाये जाते है, उड़ीसा में श्री जगन्नाथ का सम्बोधन है, और बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते हैं। 

भारत के दक्षिण में गए तो लोगों के ह्रदय में वेंकेटेश बन विराजित हुए, गुजरात में द्वारकाधीश बन विराजित हुए, त्रिपुरा और असम में कृष्ण नाम पाया, यूं तो कण कण में भगवान् श्री कृष्ण जी विराजित है, पर करोड़ों अणुओं की तरह उनके नाम और उनकी शक्ति भी असीमित है, अनंत है, अगोचर है। जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, जिसे मन्त्रों से भी बांधा नहीं जा सकता, जिसे शक्ति से रोका नहीं जा सकता, जिसे स्नेह से ह्रदय स्थल में जन्मजन्मांतर के लिए अपना बनाकर रखा जरूर जा सकता है।

ऐसे राधावल्लभ भगवान् श्री कृष्ण को समझना और उनके गुणों को समझना, जानना, उनसे परिचित होना, सरल कार्य नहीं है। भगवान श्री कृष्ण के विषय में कहा जाता है की भगवान् श्री कृष्ण टेढ़े है, उनकी मुरली टेढ़ी, उनकी छवि भी टेढ़ी, उनकी भृकुटि टेडी, उनकी नजरे टेडी, उनकी चितवन टेडी, उनकी मुस्कान भी टेडी, उनकी चाल भी टेडी , ऐसे टेड़े व्यक्ति का ह्रदय एक दम सरल है, सहज है, जिसे निश्चल स्नेह से अपना बनाया जा सकता है।  

ऐसे मोरमुकुटधारी भगवान गोपाल जी को 16 कलाओं और 64 गुणों वाला कहा गया है। भगवान श्रीकृष्ण की 16 कलाएं कौन कौन सी थी।  भगवान श्रीकृष्ण जी सोलह कला संपन्न है, इसलिए चंद्र के समान मनमोहक है।

 

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भगवान श्री की 16 कलाएं इस प्रकार थी -

  1. धन संपदा से परिपूर्ण इन्हें श्री कला से युक्त कहा गया। श्री कला में गिरिधारी जी को धन संपदा, वैभव से युक्त व्यक्ति को श्री कला से युक्त व्यक्ति की संज्ञा दी जाती है। भगवान श्री कृष्ण जी धन धान्य से युक्त होने के कारण श्री कला से संपन्न है।
  2. भगवान श्री कृष्ण जी दूसरी कला भू है। भू से अभिप्राय यहाँ भूमि और धरा से है। इस धरा के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण है, एक बहुत बड़े पर्वत को अपनी एक छोटी अंगुली पर धारण करने की शमता भगवान् श्री कृष्ण में हैं।  समुद्र किनारे द्वारिका जी की स्थापना भी इसी का एक भाग थी।
  3. भगवान् श्री कृष्ण जी की तीसरी कला का तो कहना हुई क्या- उनकी कीर्ती प्रकृति के कण कण में समाहित है।  भगवान श्री कृष्ण के भक्त वो कण है जो इस सृष्टि के हर भाग में वास कर, भगवान जी के कृपा का गुणगान कर रहे है, भगवान श्री कृष्ण की इसी तीसरी कला के प्रभाव से सारे संसार में भगवान श्रीकृष्ण की जय जयकार हो रही है।
  4. वाणी सम्मोहन, जिसे इला के नाम से भी जाना जाता है। यह कला भगवान् श्री कृष्ण जी की वाणी में प्रभावित करने का जादू जैसा सम्मोहन देती है, महाभारत में जब भी, जहाँ भी, भगवान् श्रीकृष्ण बोलना शुरू करते है तो उसके बाद सब मंत्र मुग्ध होकर उन्हें सुनते चले जाते है। उनकी वाणी के सम्मोहन को महाभारत में अनुभव किया जा सकता है।
  5. लीला युक्त - भगवान् श्री कृष्ण जी ने जितनी लीलाएं की, उतनी लीलाएं किसी अन्य अवतार ने नहीं की। लीलाएं करने में भगवान् श्रीकृष्ण जी संपन्न है, और उनके जीवन की लीलाएं आज सभी को प्रभावित करती है। विशेष रूप से उनके बालपन के जीवन चरित्र लीलाएं।
  6. भगवान् श्रीकृष्ण जी छवि इतनी निराली है, मनमोहक है की व्यक्ति अपनी सुधबुध खो देता है। उन्हें देखने के बाद कुछ और देखने की इच्छा बाकी नहीं रहती है। कृष्ण जी के मुख मंडल की कांति अपनी और खींचने वाली है, दृष्टा अपना भूलकर, कृष्ण जी को देखने के बाद बार बार उन्हें देखता है। यही हमारे बांके बिहारी की कांति नामक कला है, जो चुम्बक की तरह अपनी और खींचने वाली है।
  7. श्रीकृष्ण जी संगीत और कला के जानकार भी थे। राजनीती और कूटनीति के धुरंधर होने के साथ साथ वे, बांसुरी वादन, गायन और नृत्य कला में भी पारंगत थे। मंत्रमुग्ध कर देने वाली बांसुरी की धुन पर गोपियाँ, गोप, मित्र, सखा, जीव और जंतु, पशु सभी खींचे चले आते थे। उनकी संगीत के सभी दीवाने थे। गऊ तक उनकी बांसुरी की धुन को सुनने के लिए उत्साहित रहती थी। उनकी इसी कला का नाम विद्या है, जो गीत संगीत की जानकारी थी।
  8. विमल नाम की कला से युक्त थे। जो लोग मन से निर्मल होते है, उन में यह कला पाई जाती है। विमल नाम की कला भगवन श्रीकृष्ण जी की आठवीं कला है। भगवान बिना किसी जातिपात, लिंग,रूप, धन धान्य और वर्ग के भेदभाव से परे होकर, सब के स्नेह की आवाज पर दौड़े चले आते है। उनके लिए सब एकसमान है। यही इस कला का काम है। सबको सरल भाव से अपना मानना। स्नेह संबंधों में बुद्धि का प्रयोग भगवान् श्रीकृष्ण बिल्कुल नहीं करते थे।
  • भगवान श्री कृष्ण की नवीं कला उत्कर्षिनी नाम की कला है। इस कला में दूसरों का मनोबल बढ़या जाता है। मन से हारे व्यक्ति को हिम्मत दी जाती है। जब अर्जुन ने अपनों के सम्मुख लड़ने से मना कर दिया था तो भगवान् श्री कृष्ण जी ने अपनी इसी कला का प्रयोग करते हुए, अर्जुन का मनोबल बढ़ाया और उसे धर्म की राह दिखाई। हारते हुए को हिम्मत देना उत्कर्षिनी नाम की कला का काम है, इस कला में गिरिधारी निपुण थे।  समय समय पर उन्होंने इस कला के दर्शन कराएं।

 

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  • भगवान श्री कृष्ण की दसवीं कला ज्ञान है। ज्ञान का अर्थ है की जिसे समय पर विवेक शक्ति के साथ प्रयोग किया जाए। रिश्तों को बचाने और युद्ध को रोकने के लिए भगवान् श्री कृष्ण जी अनेक प्रयास किये। शिशुपाल की 99 गलतियों को क्षमा किया। दुर्योधन को बार बार सद्बुद्धि देने का प्रयास किया। कर्ण को पाडंवों के पक्ष में युद्ध लड़ने के लिए मनाया। परिस्थिति अनुसार भगवान श्रीकृष्ण जी बांसुरी और गांडीव उठाने का विवेक रखते थे, उनके ज्ञान का विस्तार श्रीमद भगवत गीता के ज्ञान के रूप में सुना जा सकता है। आकाश के विस्तार की तरह गोविन्द का ज्ञान अनंत है, अथाह है।
  • भगवान श्रीकृष्ण जी की ग्यारवीं कला क्रिया है। क्रिया से अभिप्राय कर्म से है। जबकि वो अपनी इच्छामात्र से सब कार्य संपन्न कर सकते है, फिर भी वो चमत्कार न करके कर्मवादी बनाते है। भगवान श्रीकृष्ण जी भाग्यवादी नहीं बनाते, कर्म की प्रेरणा देते है। वो स्वयं भी कर्म करते है और दूसरों को भी कर्म का मार्ग दिखाते है। गीता का ज्ञान भी यही सन्देश देता है।
  • भगवान श्रीकृष्ण जी की बारहवीं कला योग है। योग का अर्थ है अपने मन को साधना, ध्यान और साधना के बल पर आत्मबल को उच्च करना। उनका एक नाम योगेश्वर भी है। योग के आधार पर वो अपने मुख्य में पूरा ब्रह्माण्ड दिखा सकते है। मन को पढ़ना भी उन्हें अपने योग के बल पर आता है। इस प्रकार भगवान् श्री कृष्ण जी योग नामक   बारहवीं कला के भी जानकारी थे।
  • सोलह कलाओं में से भगवान् श्री केशव जी की तेरहवीं कला प्रह्वी थी। जिसे सरल शब्दों में हम विनय के नाम से जानते है। ईश्वर होकर, सामर्थ्यवान होकर भी विनम्र बने रहना, सरल नहीं है, यह गुण बड़े बड़े संकटों, महात्माओं और ऋषि मुनियों में नहीं होता है, ईश्वरत्व का गुण भूलकर सरल, विनम्र बने रहना कोई भगवान श्रीकृष्ण जी से सीखें। सब कुछ स्वयं करने के बाद भी किसी बात का श्री वो स्वयं नहीं लेते है। यही उनकी विनम्रता की ऊंचाई है।
  • श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं से संपन्न बनाने वाली 14वीं कला सत्य का अनुसरण है। कड़वे से कड़वा सत्य बोलने में भगण श्रीकृष्ण जी घबराते नहीं है। शिशुपाल के सामने हो, या अर्जुन के, या फिर दुर्योधन के, वो साहस के साथ सत्य बोलते है, कई जगह वो द्रौपदी को सत्य से अवगत कराते है, बलराम जी को भी युद्ध में भागी न बनने पर कड़वा सत्य बोलकर उन्हें सत्य से परिचित कराते है। इसी प्रकार वो बार बार सत्य के साथ खड़े नजर आते है
  • भगवान् श्री कृष्ण जी की पंद्रहवी कला इसना नाम की है। इस कला के अंतर्गत व्यक्ति का प्रभाव ही सब कुछ कर देता है, व्यक्ति को स्वयं कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। भगवान् श्रीकृष्ण जी के प्रभाव से अनेक स्थानों पर राजा महाराजा और अन्यजन उनके खिलाफ नहीं बोलते है, उनके प्रभाव में आकर शांत हो जाते है। इस कला को इसना नाम दिया गया है।
  • भगवान श्री कृष्ण जी की सोलहवीं कला अनुग्रह है। इस कला में भगवान अपने भक्तों पर अनुग्रह की कृपा बनाये रखते है। अपने भक्त की आवाज सुनकर वो दौड़े चले जाते है। फिर वो भक्त चाहे किसी भी श्रेणी का क्यों न हो। सभी पर अपनी कृपा की छाँव एक समान रखते है, यही अनुग्रह नाम की कला है।

इस प्रकार चंद्र के समान सोलह कलाओं से युक्त भगवान् श्री कृष्ण अपनी सोलह कलाओं से संसार का कल्याण करते है।

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