हस्तरेखाओं द्वारा हृदय रोग का विवेचन

By: Future Point | 27-May-2022
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हस्तरेखाओं द्वारा हृदय रोग का विवेचन

हृदय रोग के अध्ययन हेतु यों तो संपूर्ण हथेली ही महत्वपूर्ण है, परंतु अनामिका अंगुली, सूर्य पर्वत, हृदय रेखा, नाखून एवं चंद्र पर्वत आदि कुछ ऐसे अवयव हैं, जिनका अध्ययन विशेष रूप से आवश्यक होता है।

सूर्य पर्वत: अनामिका अंगुली के ठीक नीचे के स्थान/क्षेत्र को सूर्य का क्षेत्र या सूर्य पर्वत कहते हैं तथा अनामिका अंगुली को सूर्य की अंगुली कहते हैं। सूर्य मनुष्य के शरीर में हृदय का कारक होता है। इसलिए सूर्य पर्वत एवं अनामिका अंगुली का अध्ययन हृदय की स्थिति (रोग/निरोग) के आकलन में अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सूर्य पर्वत और अनामिका अंगुली यदि उन्नत, विस्तृत, पुष्प एवं शुभ वर्ण युक्त हो, तो व्यक्ति का हृदय स्वस्थ होता है।

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सूर्य पर्वत के हृदय रोगकारक लक्षण:-

सूर्य पर्वत शुभ हो (अर्थात् क्रॉस, जाल आदि रहित) परंतु अनामिका अंगुली दोषयुक्त (टेढ़ी या झुकी हुई) हो, तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति का हृदय औसत दर्जे (अर्थात् न तो पूर्ण तौर पर स्वस्थ और न ही रोगी) का होता है। ऐसे व्यक्ति/जातक को रक्तचाप संभव होता है।

यदि सूर्य पर्वत एवं अनामिका अंगुली, दोनों ही दूषित हो, सूर्य पर्वत क्रॉस सयुक्त एवं अंगुली टेढ़ी-मेढ़ी, या झुकी हुई हो, तो जातक का हृदय कमजोर होता है।

यदि सूर्य पर्वत या अनामिका अंगुली का द्वितीय पर्व क्रॉससयुक्त हो, तो हृदयाघात की संभावना बनी रहती है एवं रक्तचाप तो अवश्य ही होता है।

यदि सूर्य पर्वत अपने मूल स्थान से बुध पर्वत की ओर झुका हो, तो जातक का हृदय त्रिदोष (पित्त, वायु एवं कफ) से पीड़ित होता है तथा दिल के दौरे से मृत्यु की संभावना होती है। उपर्युक्त स्थिति में अनामिका अंगुली भी दूषित होनी चाहिए।

यदि सूर्य पर्वत अपने मूल स्थान से शनि पर्वत की ओर झुका हो, तो जातक का हृदय वायु विकार से पीड़ित होता है, हृदय में शूल सी चुभन होती है।

यदि सूर्य पर्वत दूषित हो तथा गुरु पर्वत भी अत्यधिक उठा हुआ हो, तो जातक का हृदय कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित होता है।

क्रॉस/जाल/द्वीप/नक्षत्र/बिंदु/कोण चिन्ह यदि सूर्य पर्वत पर उपस्थित हों, तो ऐसा सूर्य पर्वत दूषित कहलाता है तथा कमजोर हृदय तथा हृदय रोगकारक होता है।

हृदय रेखा: सामान्यतः हृदय रेखा हथेली में कनिष्ठा अंगुली के नीचे, बुध पर्वत के नीचे से शुरू हो कर, क्रमषः सूर्य और शनि पर्वतों को पार करती हुई, बृहस्पति पर्वत तक जाती है। परंतु सभी हाथों में हृदय रेखा ऐसी ही नहीं होती है।

व्यक्ति की शरीर में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों का असर सबसे पहले उसके मन पर पड़ता है और हृदय रेखा, जो मन का दर्पण है, उन सभी प्रभावों को दर्शाती है।

हृदय रेखा के गहन अध्ययन से हृदय रोगों का अध्ययन संभव है, क्योंकि यह शरीर में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों के प्रभाव को स्पष्ट दर्शाती है। स्पष्ट, सुंदर, शुभ वर्णयुक्त, शाखा रहित हृदय रेखा अच्छे स्वास्थ्य एवं निरोगी हृदय को दर्शाती है।

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हृदय रेखा के हृदय रोगकारक लक्षण:

यदि हृदय रेखा को छोटी-छोटी आड़ी रेखाएं काटें, तो जातक/जातिका हृदय रोगी होता है।

हृदय रेखा पर काला चिह्न उस आयुमान में हृदयाघात का संकेत करता है।

हृदय रेखा पर उपस्थित छिद्र उस आयुमान में गंभीर हृदय रोग की ओर संकेत करता है।

यदि हृदय रेखा श्रृंखलायुक्त, या द्वीपयुक्त हो, तो ऐसा जातक रक्तचाप से पीड़ित होता है।

कई जगह टूटी हुई हृदय रेखा कमजोर हृदय दर्शाती है।

यदि हृदय रेखा अधिक चैड़ी एवं द्वीप युक्त हो, तो ऐसा जातक कमजोर हृदय वाला, रक्तचाप पीड़ित होता है।

यदि सूर्य पर्वत के नीचे हृदय रेखा क्रॉस, या द्वीपयुक्त हो तथा सूर्य पर्वत भी दूषित हो, तो उस आयुमान में जातक को अवश्य ही हृदय रोग होता है।   

यदि हृदय रेखा किसी जगह टूटी हुई हो और उस रिक्त स्थान की पूर्ति किसी वर्ग चिह्न द्वारा कर दी गयी हो, ऐसा जातक मृत्युतुल्य कष्ट को भोग कर भी जीवित बना रहता है।  

नाखून: नाखून के द्वारा मनुष्य की शारीरिक शक्ति, स्वास्थ्य, रोग तथा स्वभाव आदि के विषय में विचार किया जाता है। हृदय रोग संबंधी विश्लेषण में नाखूनों के आकार-प्रकार, रंग-रूप एवं उन पर उपस्थित चिह्नों का बहुत अधिक महत्व होता है।

यदि नाखून ऊपरी भाग में चैकोर और नीचे की तरफ नुकीले हो, तो हृदय विकार होता है।

नाखूनों में नीला रंग, विषेष कर मूल भाग में हो, तो दुर्बल हृदय का द्योतक है।

यदि नाखून और हथेली बहुत ज्यादा लाल रंग की हो और अंगुलियों के तीसरे पर्व मोटे और गद्देदार हों, तो जातक को अधिक रक्तचाप की शिकायत होती है।

आनुवंशिक हृदय रोगी परिवारों के सदस्यों के नाखून प्रायः छोटे होते हैं। यदि नाखून अपनी जड़ में सपाट और पतले हो तथा उनमें चंद्र का आकार बहुत छोटा, या न के बराबर हो, तो यह व्यक्ति के हृदय के कमजोर होने का पक्का प्रमाण होता है।

अत्यधिक लंबे नाखून वाले की शारीरिक शक्ति प्रायः दुर्बल होती है एवं हृदय तथा फेफड़े कमजोर होते हैं।

उद्गम स्थान पर अर्ध चंद्र का चिह्न न हो, तो हृदय की दुर्बलता प्रकट होती है और जातक की हृदय गति आकस्मिक रूप से बंद हो जाने की संभावना भी रहती है।

यदि अर्ध चंद्रों का आकार अधिक बड़ा हो, तो हृदय की गति एवं रक्त प्रवाह में अधिक तीव्रता रहती है। ऐसे व्यक्ति रक्तचाप वृद्धि, मिर्गी, मूर्च्छा आदि रोगों के शिकार होते देखे गये हैं।

चंद्र पर्वत: हथेली के बायें किनारे पर, द्वितीय मंगल क्षेत्र के नीचे, चंद्र पर्वत का क्षेत्र माना जाता है। चंद्रमा, जो रक्त का कारक है, का हृदय रोग उत्पति में विशेष प्रभाव होता है। यदि चंद्र पर्वत उन्नत, विस्तृत, पुष्ट एवं शुभ वर्णयुक्त हो तथा क्रॉस/जाल/तिल आदि विकारों से रहित हो, तो जातक की हृदय गति ठीक रहती है एवं रक्तचाप नियंत्रित रहता है। चंद्र पर्वत के रोगकारक लक्षण इस प्रकार है:-

यदि संपूर्ण चंद्र पर्वत अत्यधिक उन्नत हो, तो ऐसा जातक व्यर्थ सोचने वाला, हृदय रोगी एवं उदर रोगी होता है।

क्रॉस, या जालयुक्त चंद्र पर्वत जातक को रक्तचाप का रोगी बनाता है।

अत्यधिक निम्न चंद्र पर्वत वाला जातक कमजोर हृदय वाला, शंकालु प्रवृत्ति का होता है तथा निम्न रक्तचाप पीड़ित होता है।

दूषित चंद्र पर्वत वाला जातक मानसिक रूप से व्याधित होता है तथा अचानक हृदय गति रुकने के भय से पीड़ित रहता है।

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स्वास्थ्य रेखा:-

इस रेखा को बुध रेखा के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः यदि बुध रेखा उपस्थित न हो, तो ऐसी स्थिति शुभ मानी जाती है। यदि यह रेखा हथेली में उपस्थित हो, तो यह एक अशुभ लक्षण है। सुंदर, स्पष्ट, सीधी स्वास्थ्य रेखा को ही कुछ हद तक शुभ माना जाता है। यदि दोषयुक्त स्वास्थ्य रेखा हथेली में उपस्थित हो, तो यह दीर्घकालीन रोग का संकेत होता है। यदि सूर्य पर्वत, हृदय रेखा एवं नाखूनों द्वारा हृदय रोग के लक्षण स्पष्ट हों एवं स्वास्थ्य रेखा भी दूषित हो, तो ऐसा जातक दीर्घ अवधि के हृदय रोगों से पीड़ित रहता है।

राहु-केतु एवं हृदयाघात: राहु एवं केतु, ये दोनों, छाया ग्रह हैं, परंतु इनके प्रभाव का एक विशेष गुण है आकस्मिकता, अर्थात् अचानक। राहु-केतु के प्रभाव से घटनाएं अचानक, बिना किसी पूर्वाभास के, घटित होती है, जैसे दुर्घटना, चोट, हृदयाघात आदि। हृदय रोगों में हृदयाघात एक ऐसा ही रोग है, जो अपना प्रभाव पूर्ण तीव्रता से अचानक दिखाता है और कुछ ही समय में व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती है। राहु पर्वत का क्षेत्र चंद्र एवं शुक्र पर्वतों के मध्य में, मणिबंध से ले कर हथेली के मध्य में, मस्तिष्क रेखा के कुछ नीचे तक होता है। इस क्षेत्र में भाग्य रेखा , जीवन रेखा एवं स्वास्थ्य रेखा भी उपस्थित रहती है।

इसलिए इन रेखाओं में से यदि किसी एक रेखा पर भी क्रॉस, जाल, या द्वीप, या छिद्र हो, तो उस आयुमान में रोग भय होता है। यदि हृदयाघात/रोग के अन्य लक्षण, जैसे सूर्य पर्वत तथा हृदय रेखा का दूषित होना स्पष्ट हो, तो हृदय रोग की पूर्ण संभावना हो जाती है। इसी प्रकार यदि केतु पर्वत का क्षेत्र, जिसे मंगल का क्षेत्र (दोनों मंगल पर्वतों के मध्य का क्षेत्र) भी दूषित हो, अर्थात् हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा, या भाग्य रेखा क्रॉस, जाल, या द्वीपयुक्त हो, तो रक्तचाप संबंधी बीमारी विशेष कर अपना अनिष्ट प्रभाव दिखाती है।

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हृदय रोगों के कुछ अन्य लक्षण:

यदि कोई प्रभावी रेखा, जीवन रेखा तथा मस्तिष्क रेखा को काटती हुई, हृदय रेखा में मिल जाए, तो किसी प्रियजन के कारण हृदय रोग, शारीरिक कष्ट या दोनों ही संभव है।

यदि भाग्य रेखा हृदय रेखा पर समाप्त हो, तो हृदय की दुर्बलता के कारण, या हृदय संबंधी कार्य से आय में कमी होती है।

यदि मस्तिष्क रेखा पर द्वीप हो और उसी आयुमान में भाग्य रेखा से उसी अवस्था में महीन रेखाएं नीचे जाती हुई दिखाई दें, तो दुर्भाग्य के कारण हृदय संबंधी रोग होते हैं।

हृदय रेखा पर तारे का चिह्न अच्छा लक्षण नहीं है। यदि तारा छोटा हो, तो जातक हृदय रोग से, हृदय रेखा से निर्दिष्ट उम्र में, निजात पाता है। परंतु यदि तारा चिह्न बड़ा हो, तो जातक की मृत्यु स्पष्ट होती है।

कुछ प्रमुख उपाय:-

यदि सूर्य पर्वत अत्यंत निम्न हो, अर्थात दबा हुआ हो, तो हृदय संबंधी सभी प्रकार के रोगों से छुटकारा हेतु सोने की अंगूठी में माणिक्य पहनना अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुआ है।

अत्यधिक उन्नत एवं दूषित सूर्य पर्वत की स्थिति में सूर्य ग्रह की शांति के उपाय लाभदायक सिद्ध हुए हैं जैसे सूर्य मंत्र जप तथा उसका दशांश हवन, सूर्य ग्रह संबंधी दान।

अत्यधिक निम्न चंद्र पर्वत की स्थिति में चांदी की अंगूठी में मोती को अभिमंत्रित करा कर धारण करना हृदय रोग में लाभकारी होता है। इससे हृदय को बल मिलता है।

यदि चंद्र पर्वत अधिक उठा हुआ हो, तो ऐसी स्थिति में हृदय रोग निवारण हेतु चंद्र ग्रह का मंत्र जप लाभकारी होता है।

महामृत्युंजय मंत्र जप हृदय रोग में रामबाण की तरह कार्य करता है।

रामरक्षा स्तोत्र या काली कवच, या देवी कवच का नित्य पाठ करने से भी हर तरह के संकट टलते हैं।

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