हरतालिका तीज पर्व विशेष- नियम, पूजा विधि एवं कथा।

By: Future Point | 26-Aug-2019
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हरतालिका तीज पर्व विशेष- नियम, पूजा विधि एवं कथा।

हिन्दू धर्म के अनुसार मनाया जाने वाला हरतालिका तीज व्रत एक प्रमुख व्रत है, भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज मनाई जाती है, दरअसल भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विशेष महत्व होता है. हिन्दू धर्म में हरतालिका तीज व्रत कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियां करती हैं और इसके अलावाविधवा महिलाएं भी इस व्रत को कर सकती हैं, हरतालिका तीज व्रत निराहार और निर्जला किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए किया था. अतः हरतालिका तीज व्रत करने से महिलाओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है।


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हरतालिका तीज व्रत के नियम-

  • हरतालिका तीज व्रत करते समय जल ग्रहण नहीं किया जाता है, व्रत के बाद अगले दिन जल ग्रहण करने का विधान है।
  • हरतालिका तीज व्रत करने पर इसे छोड़ा नहीं जाता है, प्रत्येक वर्ष इस व्रत को विधि-विधान से करना चाहिए।
  • हरतालिका तीज व्रत के दिन रात्रि जागरण किया जाता है, अतः रात में भजन-कीर्तन करना चाहिए।
  • हरतालिका तीज व्रत कुंवारी कन्या, सौभाग्यवती स्त्रियां करती हैं, शास्त्रों में विधवा महिलाओं को भी यह व्रत रखने की आज्ञा है।

हरतालिका तीज व्रत की पूजा विधि-

  • सर्वप्रथम हरतालिका पूजा के लिए लाल कपड़ा बिछाएं जिसपर शिव जी की मूर्ति या फोटो कुछ रख दें.
  • इसके पश्चात भगवान शिव जी के अभिषेक के लिए एक परात रख लें, जिसके बाद सफेद चावल से अष्टकमल बनाकर दीप कलश स्थापिक करें, चौक पूरा कर लें.
  • इसके पश्चात कलश के ऊपर स्वास्तिक बना लें और उसमें जल भरकर सिक्का, सुपारी और हल्दी डाल दें.
  • इसके पश्चात कलश के ऊपर पान के 5 पत्तों को गुच्छा रखें और चावल भरी कटोरी और एक दीप भी उसके ऊपर रख दें.
  • इसके पश्चात पान के पत्ते के ऊपर चावल रखकर उस पर गौर और गणेश स्थापित कर लें जिसके बाद पूजा शुरू करें.
  • इसके पश्चात चावल, दूब और रोली चढ़ाएं. गणपति को दूब पसंद है, सभी भगवानों को दीप कलश का टीका करें जिसके बाद षोडपचार विधि से पूजन करें.
  • षोडपचार विधि में पहले हाथ जोड़कर बोलें कि हे प्रभु आप हमारी पूजा में जरूर आएं और भगवान को आसन ग्रहण कराएं, फूल और जल चढ़ाएं.
  • इसके पश्चात हाथ में जल लेकर मंत्र पढ़ें और प्रभु के चरणों में अर्पित करें.
  • इसके पश्चात 3 बार मंत्र पढ़ते हुए आचमन करें और फिर हाथ धो लें, परात में पानी भरकर शिव जी को स्नना कराएं और साफ कपड़ो से पोछ कर उनका श्रृंगार करें.
  • इसके पश्चात मौली को वस्त्र के रूप में पहनें और जनेऊ, हार, मालाएं पगड़ी आदि पहन लें. जिसके बाद इत्र छिड़के, चंदन अर्पित करें, फूल, धूप, दीप, पान के पत्ते पर फल, मिठाई और मेवे आदि पर चढ़ाएं, बेलपत्र, शमिपत्री आदि जो भी फूल लेकर आए हैं वो अर्पित करें.
  • इसके पश्चात हरतालिका तीज की व्रत कथा सुने या पढे़ं.

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हरतालिका तीज व्रत की कथा-

पौराणिक कथा के अनुसार मां पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में शिव जी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया. इस दौरान माता पार्वती ने अन्न का सेवन नहीं किया. काफी समय से सूखे पत्ते चबाकर समय काटा और कई सालों तक पानी भी ग्रहण नहीं किया. पार्वती मां की स्थिति देखकर उनके पिता काफी दुखी थे. इस दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव लेकर मां पार्वती के पिता के पास पहुंचे, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. पिता ने जब माता पार्वती को उनके विवाह की बात बताई जो वे काफी दुखी हो गए और जोर-जोर से विलाप करने लगी. एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि यह कठोर व्रत शिव जी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कह रही है, जबकि उनके पिता माता का विवाह विष्णु से कराना चाहते हैं. फिर सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गई और वहां एक गुफा में जाकर भगवान शिव की अराधना में लीन हो गईं. भाद्रपद तृतीया शुक्ल के दिन हस्त नक्षत्र को मां पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ में स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया. तब माता के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छानुसार अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया| Talk to Astrologer



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