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क्रिकेट विश्व कप में भारत की भूमिका - एक शोध

By: Rekha Kalpdev | 03-Jul-2019
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क्रिकेट विश्व कप में भारत की भूमिका - एक शोध

भारत में सबसे अधिक खेले जाने वाले खेलों में क्रिकेट का नाम सबसे ऊपर आता है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि क्रिकेट मैच के चलते लोग अपने जरुरी कार्यों को भी स्थगित करने से पीछे नहीं हटते है। भारत में खेलों की बात हो और क्रिकेट की बात ना हो, ऐसा संभव नहीं है। भारत के हर प्रदेश, हर कस्बे, हर मौहल्ले और हर गली में इस खेल को खेलते देखा जा सकता है। विश्व में क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतियोगिता का आयोजन करने का कार्य अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के द्वारा किया जाता है। यह परिषद ही चार वर्षों के अंतराल पर आईसीसी विश्व कप का आयोजन करती है। संपूर्ण विश्व में क्रिकेट की यह सबसे बड़ी संस्था है, इसके बनाए नियम और शर्तों के तहत ही कोई टीम क्रिकेट विश्व कप में भाग ले सकती है।

आगे बढ़ने से पूर्व यह जान लेना उचित रहेगा कि क्रिकेट खेल की शुरुआत कब से हुई। आईये जानें-

क्रिकेट खेल के शुरुआत और भारत का प्रथम विश्व कप

भले ही आज क्रिकेट भारत के हर व्यक्ति की रगो में रक्त बनकर दौड़ रहा है, परन्तु आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इसका जन्म स्थान इंग्लैंड है। 15 जून 1909, इंग्लैंड की एक छोटी सी क्रिकेट कांफ्रेंस की स्थापना हुई, जिसमें सहयोगी देश ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका थे, इसी के साथ क्रिकेट खेल को एक स्थायी मान्यता प्राप्त हुई। यहीं से क्रिकेट खेल का जन्म हुआ। 1926 में भारत औपचारिक रुप से क्रिकेट का पूर्ण सदस्य बना। कई बार अपने नाम बदलता हुआ, आज यह कांफ्रेंस अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के नाम से जानी जाती है। जब हम आज क्रिकेट की बात कर रहें है तो शुरु से ही शुरुआत की जाए, 7 से 21 जून 1974 को पहला वर्ल्ड कप खेला गया था। मैच का प्रथम मैच भारत और इंग्लैंड के मध्य था, यह ओर बात थी कि वर्ल्ड कप के अपने पहले ही मैच में भारत को मुंह की खानी पड़ी थी, और वह अपना यह मैच हार गया था। इस वर्ल्ड कप की जीत का सेहरा वेस्टइंडीज टीम के नाम बंधा। 1983 में इसी वेस्टइंडीज को हरा कर भारत ने अपना प्रथम विश्व कप 43 रनों से जीता था।

भारत का विश्व कप में आज तक का प्रदर्शन

भारत ने 1983 में जब वेस्टइंडीज को हराकर विश्व कप जीता, तो निश्चित रुप से उससे पहले भारत के लिए क्रिकेट विश्व कप जीतना भारत की क्रिकेट टीप के लिए एक ख्वाब ही हुआ करता था। कप्तान कपिल देव के मजबूत इरादों और टीम के एकजुट प्रयास के परिणाम स्वरुप ही यह संभव हो पाया। इस विश्व कप को जीत भारत ने दुनिया भर में अपने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए थे, सब इस टीम के प्रदर्शन को देखकर हैरान परेशान थे। इसके बाद इस स्वर्णिम अवसर ने स्वयं को दोहराया और 2011 में मुंबई में महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व में भारत ने एक बार फिर से श्रीलंका को हराते हुए विश्व क्रिकेट जगत में अपनी विजय पताका लहराई। 2003 में फाईनल में आस्ट्रेलिया से हार कर हम इस जीत से मात्र एक कदम दूर रह गए। एक बार फिर से 2019 में विश्व कप क्रिकेट कप महोत्सव चल रहा है।

आज हम इस आलेख में आपको बताने जा रहे है कि भारत ने कब कब क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता, और उस समय भारत की कुंडली में क्या ग्रह स्थिति थी, जिसके फलस्वरुप यह घटना घटित हुई-

क्रिकेट खिलाड़ी बनने के ज्योतिष योग

जन्मपत्री का तीसरा भाव - बल, पुरुषार्थ, शौर्य, पराक्रम, दाहिना हाथ और शारीरिक क्षमताओं का भाव है। तृतीय से तृतीय भाव पंचम भाव है। खेलों का विचार करते समय इस भाव का भी विचार किया जाता है। पराक्रम, पराक्रमेश, पंचम भाव - यश, मान, प्रतिष्ठा, मनोरंजन ,खेल का स्थान, खेल प्रतिभा एवं दक्षता का भाव है, पंचमेश। षष्ठ भाव - विरोधी पक्ष, प्रतियोगिता, संघर्ष, प्रतिद्वंद्वियों, सकारात्मक परिणाम का भाव है, व षष्ठेश और मंगल - ताकत, ऊर्जा, शक्ति, पराक्रम, वीरता एवं आक्रामकता कारक ग्रह है, का बली होना जातक को खेलों में लेकर जाता है।

  • तृतीय भाव और तृतीयेश का संबंध बन रहा हो तो व्यक्ति बाहुबली होता है। एकादश भाव जरुर देखा जाता है क्योंकि यह उपलब्धियों, सफलता और उन्नति का भाव है। दशम भाव का इनसे संबंध अवश्य होना चाहिए तभी तो व्यक्ति का कर्म खेल होगा, और वह अपनी कार्यक्षमता के बल पर आगे बढ़ेगा।
  • लग्न, लग्नेश का इन भावों से प्रत्यक्ष संबंध होना व्यक्ति को खिलाड़ी बना सकता है। इन योगों के साथ साथ शुक्र का इन भावों से संबंध बना यश और धन भी देता है। इसके अतिरिक्त दशम भाव या दशमेश से संबंध साहस व शक्ति को बढ़ाकर खेल जगत में सफलता देता है।
  • चतुर्थ भाव भी उपरोक्त योगों में सम्मिलित हो तो व्यक्ति को लोकप्रियता और फैंस की लम्बी कतार मिलती है। कुंडली में इन भावों एवं भाव स्वामियों का, बलवान हो कर, खेल के कारक भावों एवं भावेशों तथा ग्रहों से संबंध खेल के द्वारा सफलता, ख्याति, उपलब्धि, लाभ दिलाता है। मंगल का तृतीय भाव से संबंध व्यक्ति को सुदृढ़ शरीर वाला और साहसी बनाता है।
  • बुध तीसरे व छठे भाव से संबंध बने तो व्यक्ति तकनीक के साथ खेलना जानता है। राहु की स्थिति व्यक्ति को नीति का प्रयोग जीत में करने की योग्यता देती है। लग्न व लग्नेश का स्वस्थ होना, जातक को स्वस्थ शरीर और स्वस्थ दिमाग देता है।

किस क्षेत्र का खिलाड़ी बनेगा-

  • एकादश भाव में जलतत्व राशियां कर्क, वॄश्चिक और मीन और चंद्रमा या शुक्र होने से पानी के खेल यात्रा की प्रतियोगिता में जातक का रुझानहोता है।
  • एकादश भाव में वायु तत्व राशियां मिथुन, तुला और कुंभ में बुध या गुरू हवाई जहाज की कलाबाजी पतंगबाजी घुड़सवारी शतरंज हैंड ग्लाइडिंग की ओर लेकर जाता है।
  • एकादश भाव में पृथ्वी तत्व राशियाँ वृष, कन्या और मकर होने तथा बली सूर्य मंगल होने पर जातक की रुचि हॉकी, क्रिकेट या फुटबॉल में रुचि हो सकती है।

आईये अब क्रिकेट विश्व विजेता बनने के समय की ग्रह स्थितियों का अध्ययन करते हैं-

प्रथम बार क्रिकेट विश्व कप विजेता बनने के समय की ग्रह स्थिति और भारत वर्ष की कुंडली

भारत वर्ष की कुंडली वृषभ लग्न और कर्क राशि ही है। लग्न में राहु, द्वितीय भाव में मंगल, पराक्रम भाव में पांच ग्रह बुध, सूर्य, शुक्र, चंद्र और शनि, छ्ठे भाव में गुरु, सप्तम में केतु है। पराक्रम भाव और पंचम भाव को खेलों में सफलता के लिए विशेष रुप से देखा जाता है। पंचमेश में एकादश की दशा या एकाद्शेश में पंचमेश की दशा अवधि खेलों में सफलता दिलाने का कार्य सहजता से करती है। इसी प्रकार पराक्रमेश में लाभेश की दशा या लाभेश में पराक्रमेश की दशा भी खेलों में सफलता की सूचक है। 1983 । 25 जून, लंदन, जिस समय भारत ने प्रथम बार क्रिकेट विश्व कप जीता, उस समय भारत की कुंडली में केतु महादशा में शुक्र की अंतर्द्शा प्रभावी थी। गोचर में शनि छ्ठे भाव पर गोचर कर अपनी दशम दृष्टि से जन्म शनि (पराक्रम भाव स्थिति) और तृतीय भाव, तृतीयेश, पंचमेश सभी को एक साथ सक्रिय कर रहे थे, गुरु भी उस समय गोचर में वृश्चिक राशि में गोचर कर पंचम दृष्टि से सफलता और मनोकामनापूर्ति के योग बना रहे थे।

आईये अब कप्तान कपिल देव की कुंडली का अध्ययन करते हैं-

कपिल देव कुंडली विश्लेषण
06 जनवरी 1959, रात्रि 2:30, चंडीगढ़
kapil_dev

जन्म कुंडली का तुला लग्न सप्तमेश धनेश मंगल से दृष्ट है। लग्नेश शुक्र सुख भाव में स्थित होकर दशम भाव को देखता है।

दशम भाव पर धनेश मंगल व पराक्रमेश गुरु की भी दृष्टि है। दशमेश चंद्रमा पराक्रमेश गुरु के साथ धन भाव में स्थित होकर धनेश मंगल से दृष्ट है। भावेश लग्नेश पंचमेश अथार्त् बुध सूर्य व शनि की युति पराक्रम भाव में हुई है, केतु छठे स्थान पर छठे घर के स्वामी गुरु से दृष्ट है। इस कुंडली के पराक्रम भाव में तीन ग्रहों की युति जातक को साहस शौर्य और पराक्रम देती है। पराक्रमेश व दशमेश की युति धन स्थान में होना तथा धनेश का शुभ ग्रह होकर धन भाव को देखना कर्म व पराक्रम से धन का संबंध जोड़ता है केतु का छठेभाव मे होना संघर्ष शक्ति बढ़ाता है, पंचमेश व नवमेश का संबंध योग प्रद है। तृतीय भाव में शनि बुध तथा सूर्य की युति तथा पंचमेश की पंचम भाव पर दृष्टि जातक की दक्षता कार्य कुशलता बढ़ा कर उसे धनवान व यश दिलाती है, दशमेश द्वितीय स्थान मे होने से जातक गुणी धनी परोपकारी मान सम्मान पाने वाला होता है। 1989, 25 जून विश्व कप जीतने के समय इनकी बुध महादशा में राहु की अंतर्दशा प्रभावी थी। महादशानाथ बुध नवमेश है और नवम को दृष्ट कर रहे हैं, अंतर्द्शानाथ राहु मूलत्रिकोण राशि कन्या में द्वादश भाव में स्थित है, शनि चंद्र से द्वाद्श होने के कारण शनि साढ़ेसाती प्रभावी थी, और जन्म गुरु पर गोचर गुरु विचरण कर रहा था। मंगल गोचर में नवम भाव से पुरुषार्थ भाव और चतुर्थ भाव को दॄष्टि से सक्रिय कर पुरुषार्थ से सम्मानित पद की प्राप्ति के योग बना रहा था। इस दिन चंद्र इनके तीसरे भाव पर गोचर कर रहा था। अत: जीत निश्चित थी।

दूसरी बार क्रिकेट विश्व कप विजेता बनने के समय की ग्रह स्थिति और भारत वर्ष की कुंडली

भारत ने द्वितीय विश्व कप 02 अप्रैल 2011 में जीता। कप्तान थे महेंद्र सिंह धोनी। इस समय भारत की कुंडली में सूर्य महाद्शा में राहु की अंतर्द्शा थी। सूर्य चतुर्थेश है और पंचमेश व नवमेश के साथ पराक्रम भाव में स्थित है, अंतर्द्शानाथ राहु लग्न भाव पर स्थित है। केंद्र और त्रिकोण भाव के स्वामी की दशा/अंतर्द्शा शुभता ही देती है। उस दिन गोचर में शनि जन्म चंद्र से चतुर्थ होकर शनि ढैय्या का प्रभाव दे रहा था, गुरु एकादश भाव में था और प्रतियोगिता भाव का कारक ग्रह मंगल अष्टम दृष्टि से प्रतियोगियों को परास्त कर रहा था, गोचर में चंद्र भी एकादश भाव में था। अत: सफलता निश्चित थी। विशेष बात इस दिन के गोचर की यह थी कि चार ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल और गुरु एकादश भाव पर गोचर कर रहे थे।

महेंद्र सिंह धोनी कुण्डली विश्लेषण

कन्या लग्न और कन्या राशि की है। लग्न में चन्द्र, बृहस्पति और शनि स्थित हैं, पंचम में केतु, नवम में मंगल, सूर्य बुध दशम भाव में तथा शुक्र व राहु ग्यारहवें हैं। बृहस्पति दिक्बली स्थिति में है। कुंडली में मंगल भाग्य स्थान (नवम भाव) में है जो उन्हें एक खिलाडी के सभी अच्छे गुण प्रदान करता है इसके अलावा मंगल यहाँ तीसरे भाव अपने वामी से दृष्ट होने के कारण बली है। जिस कारण इनमें पुरुषार्थ और मेहनत करने की विशेष क्षमता है। दशमेश का दशम भाव में ही स्थित होना इनके करियर को मजबूत कर रहा है। 02 अप्रैल 2011 के समय धोनी की कुंडली में राहु महादशा में बुध की अंतर्द्शा प्रभावी थी। महादशानाथ राहु एकादश भाव में हैं और बुध स्वराशि का कर्म भाव में है। लाभ भाव और कर्म भाव का दशा में संयोग होना इन्हें इस समय में सफलता देकर गया। शनि साढ़ेसाती का अंतिम चरण चल रहा था, जो सफलदायक है, गुरु सप्तम भाव में स्थित हो, लाभ और सफलता का आशीर्वाद दे रहा है। इस दिन चंद्र इनके सप्तम भाव पर गोचर कर रहा था, चंद्र जन्मकालीन राशि से 1,3,6,7,10 व 11 भाव में शुभ तथा 4, 8, 12 वें भाव में अशुभ फल देता है। अत: इस दिन विश्व कप विजेता बनना तय था।

तीसरी बार क्रिकेट विश्व कप विजेता ना बन पाने के समय की ग्रह स्थिति और भारत वर्ष की कुंडली

23 मार्च 2003 का फाईनल जोहनिस्बर्ग, दक्षिण अफ्रीका में हुआ, उस समय भारत की टीम के कप्तान सौरभ गांगूली थे।

भारत कुंडली विश्लेषण

23 मार्च 2003 को यह फाईनल खेला गया, इस समय भारत की कुंडली में शुक्र महादशा में शनि की अंतर्द्शा चल रही थी। शुक्र-शनि दोनों एक साथ पराक्रम भाव में युति संबंध में हैं और लगभग दो अंशों के अंतर पर है। वैदिक शास्त्रों में शुक्र में शनि और शनि में शुक्र की दशा को अनुकूल नहीं कहा गया है। इस दिन गोचर में शनि लग्न भाव पर गुरु पराक्रम भाव पर था, इन दोनों ग्रहों के गोचर फल ने इन्हें फाईनल तक पहुंचाया। परन्तु इस दिन मंगल का गोचर अष्टम भाव पर था और चंद्र सप्तम भाव पर गोचर कर रहा था। मंगल का अनुकूल गोचर और दशा अनुकूल ना होने के कारण यह शुभ अवसर हाथ से निकल गया।

सौरभ गांगूली कुंडली विश्लेषण

मेष लग्न और वृषभ राशि की कुंडली है। चंद्र, शुक्र, शनि द्वितीय भाव, सूर्य तीसरे, मंगल, बुध और केतु चतुर्थ, गुरु नवम और राहु दशम भाव में है। 23 मार्च 2003 को राहु में सूर्य की दशा थी। राहु दशम भाव और सूर्य पराक्रम भाव में स्थित है। शनि गोचर में जन्म राशि पर गोचर कर रहा था, अत: इनकी शनि की साढ़ेसाती चल रही थी। गुरु चतुर्थ भाव पर गोचर कर रहा था और मंगल गोचर में नवम भाव पर गोचर कर था। सभी कुछ इनके अनुकूल था केवल चंद्र इस दिन अष्टम भाव पर गोचर कर रहे थे, इसलिए ट्राफी आते आते हाथ से निकल गई।

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