सूपरमून और जापान मे सूनामी

 

11 मार्च 2011 को जापान में सबसे बड़ा भूकंप आया जिसने जापान में भारी तबाही मचा दी। भूकंप के साथ ही सुनामी ने तबाही को और भयंकर रूप दे दिया। वैसे तो जापान में लगभग सौ ज्वालामुखी सक्रिय अवस्था में है लेकिन यह भूकंप समुद्र के नीचे पैसिफिक रिंग ऑफ फायर (Pacific Ring of fire) क्षेत्र में आया था। इसका केंद्र टोक्यो से 350 किलोमीटर दूर एवं सिदेंई से 130 किलोमीटर दूर समुद्र तल में 24.5 किलोमीटर पर था। भूकंप की तीव्रता 8.9 थी। भूकंप की तीव्रता बहुत अधिक व समुद्र की गहराई कम होने के कारण लहरें 12 से लेकर 30 फीट तक ऊंची उठीं। जिन्होंने सिदेंई शहर में कहर मचा दिया।

क्या वैज्ञानिकों के पास ऐसा कोई तरीका उपलब्ध नहीं है जिससे भूकंप या सुनामी के बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सके? ज्योतिष में अनुमान करने के कुछ योग अवश्य उपलब्ध है। लेकिन इनसे हम काल का (कुछ दिनों या मास का) ही आकलन कर सकते हैं। कहां होगा, इसका कोई ठोस योग नहीं है।

हाल ही में चर्चित है कि चंद्रमा 19 मार्च 2011 को 20 वर्षों बाद पृथ्वी के अत्यधिक निकट आ रहा है। चंद्रमा की इस स्थिति को सुपरमून अर्थात बड़ा चांद कहते हैं। क्या यह कोई भूकंप का मुख्य कारण तो नहीं:-

जिस प्रकार से पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अंडाकार वृत्त में चक्कर लगाती है उसी प्रकार चंद्रमा भी पृथ्वी के चक्कर अंडाकार वृत्त में ही लगाता है। वह प्रति माह पृथ्वी के पास आ जाता है और फिर दूर भी चला जाता है। लेकिन यही पास आने का काम यदि पूर्णिमा या अमावस्या के समय होता है तो उसे सुपरमून कहते हैं। इस समय वह और बड़ा दिखाई देता है। खगोल शास्त्र के अनुसार जब भी सूर्य, चंद्र और पृथ्वी एक रेखा में आ जाते है (जैसे पूर्णिमा या अमावस्या को) और चंद्रमा अपनी भू-समीपक (Perigee) के 90 प्रतिशत के अंदर आ जाता है तो उसे सुपरमून कहते हैं। यह क्रिया लगभग 18वर्ष पश्चात पुनः होती है एवं लगभग दिसंबर-जनवरी माह में ही होती है क्योंकि इस समय सूर्य भी पृथ्वी के नजदीक होता है। सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण चंद्रमा को पृथ्वी की ओर खींच लेते हैं और सुपरमून की स्थिति बन जाती है।

पिछले व अगले 50 वर्षों में सुपरमून कब कब हुआ उसकी तालिका नीचे दी गई है।

इस वर्ष सुपरमून 19 मार्च 2011, 23:40 मिनट भारतीय समय पर होगा। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी से केवल 356577 कि.मी. (221567 मील) दूर होगा जबकि औसतन यह 384400 कि.मी. (238856 मील) दूर होता है। यह चंद्रमा की पिछले 20 वर्षों में सबसे कम दूरी होगी।

जैसा ज्ञात है पिछली सुनामी जिसने इंडोनेशिया व भारत में तबाही की थी, 26 दिसंबर 2004 को आई थी वह 10 जनवरी 2005 को सुपरमून से केवल 15 दिन पहले पूर्णिमा के दिन आई थी। इस बार भी जापान में सुनामी सुपरमून से केवल 9 दिन पहले ही आई है। अन्य सुपरमून के आसपास भी बड़े भूकंपों को देखा जा सकता है लेकिन जान-माल की हानि इस बात पर निर्भर करती है कि भूकंप का केंद्र कहां है।

भूकंप ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण के बढ़ जाने के कारण ही आते हैं। सुपरमून के कारण चंद्रमा व सूर्य दोनों का पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाता है। माना जाता है कि भूकंप पृथ्वी की प्लेट खिसक जाने के कारण आते हैं। अधिक गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की प्लेट को उठाने में लिफ्ट की तरह काम करता है। प्लेट के उठने पर या उसका दूसरी प्लेट पर दबाव कम होने पर यह खिसक जाती है। 6 मार्च 2011 को सुपरमून की स्थिति तो पास में थी ही, साथ में मंगल, गुरु, बुध, सूर्य भी एक न्यून कोण में विराजित थे, जिनके कारण एक ओर गुरुत्वाकर्षण और अथिक बढ़ गया। शनि भी उसी रेखा में विपरीत दिशा में विराजित थे जिसके कारण यह प्रभाव और बढ़ा और कुल मिलाकर जापान में भूकंप और सुनामी का प्रकोप बना दिया।

पिछले बड़े भूकंपों का यदि अध्ययन करें तो अधिकांश भूकंप पूर्णिमा, अमावस्या या उनके तीन दिन के अंदर या दोनों पक्षों की षष्ठी को ही आते हैं। जापान में 11 मार्च 2011 को भूकंप भी शुक्ल पक्ष की षष्ठी को ही आया।

ज्योतिषानुसार चंद्रमा के स्थिर राशियों वृष, सिंह, वृश्चिक तथा कुंभ में से गोचर का भी भूकंप से संबंध पाया गया है। भूकंप के अधिकेंद्र की स्थिति की जानकारी ग्रहण काल के ग्रह एवं भाव स्पष्ट द्वारा प्राप्त की जा सकती है - ऐसा संहिता ग्रंथों में बताया गया है।

पृथ्वी पर सर्वाधिक भयंकर भूकंपों के एक तुलनात्मक अध्ययन के अनुसार यह पाया गया कि 90 प्रतिशत से अधिक भूकंपों में सूर्य, बुध, शुक्र, चंद्र एवं मंगल एक दिशा में स्थित थे, या चंद्रमा सूर्य से विपरीत दिशा में स्थित होकर कृष्ण पक्ष में विद्यमान था। साथ ही काल-सर्प योग भी पूर्ण या आंशिक रूप से आकाश मंडल में विद्यमान था।

11 मार्च 2011 को शुक्ल पक्ष की षष्ठी थी और सूर्य, मंगल, बुध व गुरु 30 अंश के अंदर विद्यमान थे। आंशिक कालसर्प योग था-शनि को छोड़कर सभी ग्रह राहु-केतु के एक ओर थे। चंद्रमा वृष राशि में था। साथ में सुपरमून की स्थिति थी। शनि अन्य ग्रहों से विपरीत दिशा में था।

सभी ग्रहों की स्थिति पर विचार करें तो पृथ्वी पर भूकंप की स्थिति अभी अप्रैल व मई के तृतीय सप्ताह में बनी रहेगी। लेकिन ठीक समय व स्थान का ज्ञान अभी ज्योतिष की सीमा से बाहर है। इस विद्या पर अनुसंधान कर भविष्य में अवश्य ही इससे अधिक शुद्ध फलादेश किया जा सकता है व ज्योतिष को जन सामान्य के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है।




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