Jupiter RetroGrade 2011 Auspicious or InAuspicious | Jupiter Transit 2011

गुरु वक्री २०११ शुभ या अशुभ | गुरु मेष राशि में वक्री – १२ राशियों के लिए कैसा फल देंगे | गुरु गोचर २०११

देवगुरु बृहस्पति मंगलवार ३० अगस्त २०११, १४:४८ पर अपनी चाल बदल कर मार्गी से वक्री हो जाएंगे। गुरु की यह स्थिति २५ दिसंम्बर २११, रात्रि २८:०८ तक रहेगी। वक्री अवस्था में गुरु अपने सभी शुभ फल देने में असमर्थ रहेंगें। देवगुरु को सभी ग्रहों में गुरु का स्थान प्राप्त है। वक्री अवस्था में गुरु, सूर्य, शुक्र, शनि, राहू से दृष्टि सम्बंध बनायेंगें।

वक्री गुरु कब शुभ

अगर आपकी कुंडली में गुरु वक्री अवस्था में है तो वक्री गोचर गुरु अनुकूल फल देंगे। इसके विपरीत जन्म कुंडली में गुरु मार्गी अवस्था में होने पर आपको अपने ज्ञान और कौशल का सावधानी से प्रयोग करना होगा। पदोन्नति के कार्य बाधित हो सकते है। तथा वरिष्ठजनों से बेवजह सम्बन्ध प्रभावित हो सकते है। अपने गुरुओं के आशीर्वाद, मार्गदर्शन और सलाह से कार्य करना आपकी सफलता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करेगा

जिन व्यक्तियों की कुंडली में गुरु वक्री होकर स्थित होते है, उन व्यक्तियों को गुरु का वक्री होना पहले से अधिक धार्मिक आस्थावान बना सकता है। ऎसे में व्यक्ति का धार्मिक विषयों से जुडा व्यापार आरम्भ करना या इससे संबन्धित योजनाओं को पूरा करना व्यक्ति के लिये लाभकारी सिद्ध हो सकता है। ऐसे सभी जातकों को वक्री अवस्था में गुरु जीवन में आगे बढने के नये अवसर भी दे सकता है।

सता परिवर्तन के योग

वर्तमान में राहू-केतु वृश्चिक-वृषभ में क्रमश गोचर कर रहे है। गुरु वक्री अवस्था में राहू-केतु अक्ष से समसप्तक रहेगें। ऐसे में वे अपने शत्रु शुक्र की राशि में स्थित केतु के साथ युति करेंगे। तथा राहू से दृष्टि संबंध में रहेंगे। वृषभ राशि भारत की लग्न राशि है। तथा भारत की कुंडली में गुरु अष्टमेश व् एकादशेश होते है। अष्टमेश का लग्न भाव पर गोचर, सता परिवर्तन के योग बनाता है। क्योकि यहाँ वक्री गुरु राज और सता के कारक के कारक ग्रह सूर्य से भी सम्बंध बना रहे है।

राजनीति में उठा पटक के चलते महत्वपूर्ण बदलाव आ सकते है। वक्री गुरु शनि से भी दृष्टि सम्बंध बना कर आन्तरीक शक्ति, व्यक्तिगत योग्यता को बढानें में सहायक रहेगा। राजनेता और सता से जुड़े लोगों को इस अवधि में असुविधा की स्थिति में रहना पडेगा।

गुरु कब अशुभ

जब भी कोई ग्रह वक्री अवस्था में होता है, तो वह अपनी प्रवृति के विपरीत फल देता है। जैसे गुरु धन, धर्म, सोने आध्यात्म, न्याय, विवेक, योग्यता, अध्यात्मिक गुरुओं के कारक ग्रह है। इसलिए गुरु के वक्री होने पर ये सभी क्षेत्र प्रभावित होंगे।

गुरु जब वक्री होते है तो व्यक्ति को बीते समय की समृ्तियां आने की संभावना बनती है। उसे पुराने रिश्तेदारों से मिलने के अवसर प्राप्त होने की भी संभावना बनती है। तथा इससे पूर्व ऋण पर दिये गये धन के वापस प्राप्ति में परेशानियां आ सकती है। इस अवस्था में व्यक्ति को स्वयं के प्रति भी ईमानदार रहना चाहिए। क्योकि ऎसे में व्यक्ति अपने बनाये सिद्धान्तों का स्वयं ही पालन नहीं करता है।

गुरु के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए क्या करें -

गुरु के वक्री होने के कारण गुरु की शुभता की कमी को दूर करने के लिये व्यक्ति को अपने से बडों को भोजन करना चाहिए, गुरुवार में पडने वाली अमावस्या या गुरुवार के व्रत रखना, पुखराज धारण करना, पीले वस्त्र, चने की दाल, शक्कर, केले, लड्डओं का भोग लगाना, धार्मिक ग्रन्थों का दान यथाशक्ति करने से लाभ प्राप्त होते है।

गुरु मंत्र या गुरु गायत्री मंत्र का जाप 19000 बार विधिपूर्वक करना भी व्यक्ति को लाभ देता है। प्रत्येक ग्रुरुवार को केसर का तिलक लगाने से भी गुरु की शुभता में वृ्द्धि होती है।

सभी राशि के जातकों के लिए गुरु के वक्री गोचर का फल भिन्न भिन्न रहेगा। आइये जाने की गुरु मंगल की मेष राशि में वक्री होने पर आपके लिए कैसे रहने वाले है। मेष राशि के जातक इस अवधि में अवश्य सोने या चांदी की अंगूठी में पुखराज धारण करें, पीपल के निकट गुरु बीज मंत्र “ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम: “ का जप करें।

वक्री गुरु राशिफल

मेष- गुरु लग्न भाव स्थित रहेंगे, जोकि स्वास्थ्य के प्रतिकूल है।

वृष- गुरु की 1२वें भाव स्थिति रहेगी जो की व्यर्थ के व्यय, अविश्वास का कारण बनेगी।

मिथुन- गुरु की एकादश भाव स्थिति होगी, जो फायदे का काम करेगी।

कर्क- गुरु की दशम भाव स्थिति अचानक व्यावसायिक यात्रा हो सकती है।

सिंह- गुरु की नवम भाव स्थिति होने से धर्म कार्य बाधित रहेंगे।

कन्या- गुरु की अष्टम भाव स्थिति होने से घरेलू झंझट विवाद बढाएगी।

तुला- गुरु की ७वीं भाव स्थित से विदेश यात्रा होगी।

वृश्चिक- गुरु की ६वीं स्थिति से मित्रों से मदद मिलेगी।

धनु- गुरु की ५वीं स्थिति होने से संतान से दूरी बनेगी।

मकर-गुरु की चतुर्थ भाव स्थिति होने से सुख की कमी होगी।

कुंभ- तीसरी भाव स्थिति होने के कारण परेशानियों से निजात मिलेगी।

मीन- दूसरी भाव में स्थित होने से जो काम की योजना बनाई जाएगी वह सिरे चढ़ेगी।




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