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जानिए जन्मकुंडली के प्रथम भाव में बैठे तुला राशि के शनि का प्रभाव

जानिए जन्मकुंडली के प्रथम भाव में बैठे तुला राशि के शनि का प्रभाव

Ashutosh Tiwari
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भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि ग्रह को दुख कारक ग्रह माना जाता है। अक्सर देखा जाय तो शनि ग्रह के सम्बन्ध मे समाज में चल रही अनेकों भ्रान्तियां फैली पड़ी है इसलिये शनि ग्रह को मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक ग्रह नही है जितना की अल्पज्ञ विद्वानो द्वारा समाज में फैलाया जा रहा है। शनि शत्रु ही नही बल्कि अति मित्र ग्रह भी है जो जातक को रंक से राजा भी बना देता है। मोक्ष की प्राप्ति को प्रदान करने वाला एक मात्र ग्रह शनि ही है।

सदैव प्रकृति पर संतुलन बनाये रखने वाला ग्रह शनि ही है और हर मानव प्राणी को न्याय का मार्ग प्रदान करता है जो व्यक्ति अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं शनि केवल उन्ही को प्रताडित करता है ज्योतिष शास्त्र में प्रमाण मिलता है कि शनि वृद्ध, तीक्ष्ण, आलसी, वायु प्रधान, नपुंसक, तमोगुणी और पुरुष प्रधान ग्रह है। इसका वाहन गिद्ध है। स्वाद कसैला तथा प्रिय वस्तु लोहा है. शनि राजदूत, सेवक, पैर के दर्द तथा कानून और शिल्प, दर्शन, तंत्र, मंत्र और यंत्र विद्याओं का कारक है।

यह जातक के स्नायु तंत्र को प्रभावित करता है राशियों में मकर और कुंभ राशियों का स्वामी तथा मृत्यु का देवता है यह ब्रह्म ज्ञान का भी कारक है इसीलिए जन्मकुंडली में शनि प्रधान ग्रह वाले संन्यास ग्रहण कर लेते हैं। प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तुला राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि कहा जाता है जिसे साधारण शब्दों में कहा जाय कि तुला राशि में स्थित होने पर शनि अन्य सभी राशियों की तुलना में सबसे बलवान हो जाते हैं। परन्तु कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में उच्च राशि का शनि सदा शुभ फलदायी होता है जो सत्य नहीं है क्योंकि कुंडली में शनि का उच्च होना केवल उसके बल को दर्शाता है तथा उसके शुभ या अशुभ स्वभाव को नहीं जिसके चलते किसी कुंडली में उच्च का शनि शुभ अथवा अशुभ दोनों प्रकार के फल ही प्रदान कर सकता है जिसका निर्णय उस कुंडली में शनि के शुभ अशुभ स्वभाव को देखकर ही लिया जा सकता है।


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आज के इस लेख में हम कुंडली के प्रथम घर में स्थित होने पर उच्च के शनि द्वारा प्रदान किये जाने वाले कुछ संभावित शुभ तथा अशुभ फलों के बारे में विचार करेंगे। किसी कुंडली के पहले घर में स्थित उच्च का शनि शुभ होने की स्थिति में जातक को कलात्मक तथा रचनात्मक विशेषताएं प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक रचनात्मक तथा कलात्मक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार के जातक कलाकार, चित्रकार, नाट्यकार, मूर्तिकार, संगीतज्ञ, रचनाकार, लेखक आदि के रूप में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

कुंडली के पहले घर में स्थित शुभ उच्च के शनि का प्रभाव जातक को अच्छी कल्पना शक्ति, बुद्धिमता, जोड़ तोड़ करने की क्षमता, विश्लेषण करने की क्षमता, कूटनीतिक विशेषता तथा अन्य ऐसे गुण प्रदान कर सकता है जिनके कारण जातक अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकता है तथा इनमें से कुछ जातक अपनी इन विशेषताओं के चलते सफल राजनेता बन सकते हैं और राजनीति के माध्यम से सरकार में प्रभुत्व तथा प्रतिष्ठा का कोई पद प्राप्त कर सकते हैं।

वहीं दूसरी ओर, कुंडली के पहले घर में स्थित उच्च के शनि के अशुभ होने की स्थिति में जातक के विवाह तथा वैवाहिक जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है जिसके चलते इस प्रकार के अशुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातकों का विवाह देरी से अथवा बहुत देर से हो सकता है जबकि इस प्रकार के कुछ अन्य जातकों का विवाह तो समय पर हो जाता है किन्तु इन जातकों का वैवाहिक जीवन बहुत कष्टप्रद रहता है तथा इनमें से बहुत से जातकों का विवाह बहुत सी समस्याओं को झेलने के पश्चात टूट जाता है।

कुंडली के पहले घर में स्थित अशुभ उच्च के शनि का प्रभाव जातक को शराब पीने, अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन करने, शारीरिक सुख प्राप्त करने के लिए बहुत सी स्त्रियों के साथ संबंध बनाने जैसीं लतें लगा सकता है जिसके कारण इन जातकों को बहुत सा धन इन लतों की पूर्ति के लिए खर्च करना पड़ सकता है तथा इन आदतों के चलते इन जातकों को स्वास्थ्य हानि तथा मान हानि जैसे परेशानियों को दिला सकता है।


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