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करेंगे अपने मामा का वध - लिखा था भगवान श्रीकृष्ण की कुंडली में

करेंगे अपने मामा का वध - लिखा था भगवान श्रीकृष्ण की कुंडली में

Rekha Kalpdev
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भगवान श्रीकृष्ण का जीवन सभी के लिए आदर्श रहा है। सर्वविदित है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, रोहिणी नक्षत्र में नन्द बाबा के घर हुआ था। जन्म के समय हर्ष योग बन रहा था। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से हम सभी को न केवल जीवन जीने की प्ररेणा मिलती है अपितु कठिन समय में व्यक्ति को किस प्रकार का आचरण और कर्तव्य का पालन करना चाहिए, यह भी भगवन के जीवन से समझा जा सकता है। आईये जानें कि इनकी कुंडली में ऐसे कौन से योग थे जिन्होंने इन्हें १६ कलाओं से युक्त किया-

भगवान श्रीकृष्ण की कुंडली में वृषभ लग्न की है, लग्न में उच्च का चंद्रमा है, चौथे भाव में सिंह राशि का सूर्य, पंचम में कन्या का बुध, छठे भाव में तुला का शुक्र शनि के साथ, सप्तम में राहू, लग्न में चंद्रमा के साथ केतू, भाग्य भाव में उच्च का मंगल, मीन का बृहस्पति है। एक अनुमान है कि भगवान कृष्ण की बाल्यावस्था चंद्रमा की दशा में, किशोरावस्था मंगल की महादशा में और युवावस्था राहू की महादशा में बीती होगी। इसके बाद गुरु, शनि और बुध की दशाओं के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के सूत्रधार की भूमिका निभाई होगी।

krishna dev

लग्न भाव
दूसरे भाव यानि वाणी भाव पर किसी भी प्रकार का अशुभ प्रभाव न होना अर्थात किसी ग्रह की दृष्टि, दुष्प्रभाव न हो और द्वितीयेश उच्च का हो तो जातक ऊंचे स्तर का वक्ता होता है। वृषभ लग्न में द्वितीयेश बुध उच्च का होकर पंचम भाव में बैठता है तो कृष्ण को ऐसा वक्ता बनाता है कि भरी सभा में जब कृष्ण बोल रहे हों तो कोई उनकी बात को काटता नहीं है। शिशुपाल जैसा मूर्ख अगर मूर्खतापूर्ण तरीके से टोकता भी है तो उसका वध भी निश्चित हो जाता है।

पराक्रम भाव
तीसरे भाव और पराक्रम का सीधा संबंध है। श्रीकृष्ण की कुण्डली में तीसरा भाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस भाव का अधिपति चंद्रमा उच्च का होकर लग्न में बैठता है। इसके साथ ही इस भाव को उच्च का शनि और उच्च का मंगल भी देखता है। जिस भाव पर मंगल और शनि दोनों की दृष्टि हो उस भाव से संबंधित फलों में तीव्र उतार-चढ़ाव देखा जाता है। एक तरफ हमें चौअक्षुणी सेना और कौरवों के महारथियों के बीच स्थिर भाव से खड़े होकर अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते कृष्ण दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर उन्हीं कृष्ण को हम रणछोड़ दास के रूप में भी देखते हैं। हंसी खेल की तरह पूतना से लेकर कंस तक का वध कर देने वाले कृष्ण हमें मथुरा छोड़ द्वारिका बसाते हुए भी मिल जाते हैं। एक तरफ पराक्रम की पराकाष्ठा दिखाई देती है तो दूसरी तरफ रण छोड़ देने की कला भी। यह दोनों पराकाष्ठाएं मंगल और शनि के तृतीय यानी पराक्रम भाव को प्रभावित करने के कारण दृष्टिगोचर होती हैं।

भ्राता और बाल सखा
एकादश भाव में सूर्य किसी भी जातक के बड़े भाई और सखाओं के बारे में बताता है। यहां उपस्थित बृहस्पति हमें बताता है इन दोनों का ही प्रमुख रूप से अभाव रहेगा। श्रीकृष्ण से पहले पैदा हुए सात भाई बहिन कंस की सनक के कारण काल का ग्रास बन गए। बलराम को भी अपनी मां की कोख छोड़कर रोहिणी की कोख का सहारा लेना पड़ा, तब पैदा हुए और श्रीकृष्ण के साथ बड़े हुए। सगे भाई होते हुए भी सौतेले भाई की तरह जन्म हुआ। बाद में स्यमंतक मणि के कारण श्रीकृष्ण और बलराम के बीच मतभेद हुए, महाभारत के युद्ध में भी बलराम ने भाग नहीं लिया क्योंकि पाण्डवों के शत्रु दुर्योधन को उन्होंने गदा चलाने की शिक्षा दी थी। कुल मिलाकर भ्राता के रूप में बलराम कृष्ण के लिए उतने अनुकूल नहीं रहे, जितने एक भ्राता के रूप में होने चाहिए थे। अगर बलराम पाण्डवों की ओर से युद्ध में आ खड़े होते तो पाण्डवों का पलड़ा युद्ध से पहले ही भारी हो चुका होता। लेकिन कृष्ण लीला को यह मंजूर नहीं था, सो बलराम दूर रहे।

चतुर्थ का सूर्य
सूर्य जिस भाव में बैठता है, उस भाव को सूर्य का ताप झेलना पड़ता है, श्रीकृष्ण की कुण्डली में सूर्य चतुर्थ भाव में बैठता है, तो माता का वियोग निश्चित रूप से होता है। एक ही बार नहीं, माता देवकी और माता यशोदा दोनों को पुत्रवियोग झेलना पड़ा था। जन्म के बाद श्रीकृष्ण अपनी जन्मदायी मां के पास नहीं रह पाए और किशोरावस्था में पहुंचते पहुंचते अपना पालन करने वाली माता को भी त्याग देना पड़ा।

लाभ भाव का बृहस्पति
वृहस्पति ऐसा ग्रह है जो जिस भाव में बैठता है उस भाव को तो नष्ट करता ही है, साथ ही लाभ के भाव में हानि और व्यय के भाव में लाभ देने वाला साबित होता है। यहां लाभ भाव में बैठा वृहस्पति वास्तव में कृष्ण की सभी सफलताओं को बहुत अधिक कठिन बना देता है। यह तो उस अवतार की ही विशिष्टता थी कि हर दुरूह स्थिति का सामना दुर्धर्ष तरीके से किया और अपनी लीला को ही खेल बना दिया। एकादश भाव शनि का भाव है, इस भाव में वृहस्पति के बैठने पर जातक को कोई भी सफलता सीधे रास्ते से नहीं मिलती है। जातक को अपने हर कार्य को संपादित करने के लिए जुगत लगानी पड़ती है। कृष्ण को चाहे जीवित रखने के लिए संतान बदलनी पड़े, चाहे शिशुपाल को मारने के लिए सुदर्शन चक्र चलाना पड़े, चाहे यदुवंश के विकास के लिए द्वारिका जाना पड़े, चाहे जरासंघ के वध के लिए भीम का अनुनय करना पड़े, हमें कृष्ण अपने हर कार्य के लिए विशिष्ट युक्ति प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं। सामान्य रूप से इन युक्तियों का इस्तेमाल भी असंभव जान पड़ता है, लेकिन श्रीकृष्ण सहज रूप से अपने लिए उन स्थितियों को गढ़ते चले जाते हैं।

संतान और बुध
सामान्य तौर पर ज्योतिषीय कोण से देखा जाए तो पंचम भाव में बुध की उपस्थिति कन्या के जन्म होने का संकेत करती है, लेकिन जहां मैंने पूर्व में भी अपना प्रेक्षण लिखा है कि किसी भी जातक की कुण्डली में चंद्रमा जितना अधिक मजबूत होगा, जातक के पुत्र होने की संभावनाएं बढ़ेंगी और कुण्डली में चंद्रमा के बलहीन होने पर कन्या संतति होने की संभावना अधिक होती है। भगवान श्रीकृष्ण की कुण्डली में पंचम में उच्च का बुध देखकर सूरदासजी जहां अधिक संतति की बात करते हैं, वहीं पुत्र संतति के लिए मैं लग्न में बलशाली चंद्रमा के योग को अधिक सबल मानता हूं। यहां बुध केवल संतति की संख्या अधिक होने की ओर ही इंगित करता है। ऐसे में हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि संतति होने अथवा नहीं होने, अधिक या कम होने को हम पंचम भाव से ही देखेंगे, लेकिन पुत्र होगा अथवा पुत्री यह देखने के लिए हमें कुण्डली में चंद्रमा की स्थिति को प्रमुख रूप से देखना होगा।

रोग-रिपु भाव
सामान्य तौर पर ज्योतिषीय कोण से देखा जाए तो पंचम भाव में बुध की उपस्थिति कन्या के जन्म होने का संकेत करती है, लेकिन जहां मैंने पूर्व में भी अपना प्रेक्षण लिखा है कि किसी भी जातक की कुण्डली में चंद्रमा जितना अधिक मजबूत होगा, जातक के पुत्र होने की संभावनाएं बढ़ेंगी और कुण्डली में चंद्रमा के बलहीन होने पर कन्या संतति होने की संभावना अधिक होती है। भगवान श्रीकृष्ण की कुण्डली में पंचम में उच्च का बुध देखकर सूरदासजी जहां अधिक संतति की बात करते हैं, वहीं पुत्र संतति के लिए मैं लग्न में बलशाली चंद्रमा के योग को अधिक सबल मानता हूं। यहां बुध केवल संतति की संख्या अधिक होने की ओर ही इंगित करता है। ऐसे में हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि संतति होने अथवा नहीं होने, अधिक या कम होने को हम पंचम भाव से ही देखेंगे, लेकिन पुत्र होगा अथवा पुत्री यह देखने के लिए हमें कुण्डली में चंद्रमा की स्थिति को प्रमुख रूप से देखना होगा।

कुण्डली के छह भावों को श्रेष्ठ बताया है। इनमें लग्न, द्वितीय, तृतीय, षष्ठम, दशम एवं एकादश शामिल हैं। छठा भाव इस कारण भी महत्वपूण है कि यह आपकी सेवा प्रवृत्ति को दर्शाता है, यह आपके शत्रुओं को दर्शाता है, उनकी ताकत और कमजोरियों के बारे में बताता है। जब जीवन ही दौड़ हो तो हमें पता होना चाहिए कि साथ दौड़ रहे या प्रतिस्पर्द्धा कर रहे दूसरे जातकों के साथ हमारा संबंध कैसा रहेगा। कोई आईएएस की परीक्षा के लिए प्रतिस्पर्द्धा कर रहा है तो कोई अपना कारोबार जमाने के लिए। ऐसे में छठा भाव महत्वपूर्ण हो जाता है। श्रीकृष्ण का लग्नेश ही छठे भाव में स्वग्रही होकर बैठ गया है। ऐसे में वे खुद प्रथम श्रेणी के पद नहीं ले रहे हैं, लेकिन हर प्रतिस्पर्द्धा में, हर युद्ध में, हर वार्ता में वे श्रेष्ठ साबित होते जा रहे हैं। यह लग्न और षष्ठम का बहुत खूबसूरत मेल है।

सप्तम राहू और दांपत्य जीवन
इसमें कोई दो राय नहीं है कि श्रीकृष्ण का संबंध बहुत सी गोपिकाओं और राजकुमारियों से रहा। कुल 16 हजार 108 विवाह किए। यहां हमें देखना होगा कि स्त्री और पुरुष का संबंध हर बार केवल शारीरिक ही नहीं होता है। श्रीकृष्ण कहीं आध्यात्मिक रूप से जुड़े दिखाई देते हैं, कहीं साधारण दांपत्य जीवन के रूप में, कहीं गोपिकाओं से शरारत के अंदाज में तो कहीं उद्धारक के रूप में। सप्तम के राहू को देखकर सूरदासजी कहते हैं रसिक शिरोमणी का ऊंच नीच हर कुल की स्त्री से संबंध रहा, तो यहां संबंध से तात्पर्य केवल शारीरिक संपर्क नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहू जिस भाव में बैठेगा उस भाव के संबंध में अनिश्चितता बनाए रखेगा। सप्तम भाव केवल पत्नी का ही नहीं होता है। यात्रा में साथ चल रहे सहयात्री का, व्यवसाय में साझेदार का, युद्ध में आपकी ओर से लड़ रहे सहयोद्धा का और तो और एक ही नाव में सवार दो लोगों को भी एक दूसरे के सप्तम भाव से ही देखा जाएगा।

यहां हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण हर कुल और वर्ग के साथ संबंध बनाते हुए चलते हैं। इसके बावजूद वे अपना अधिकांश समय किसके साथ और कैसे बिताते हैं कभी स्पष्ट नहीं हो पाता है। एक तरफ गोपिका आकर कहती है कि वह चोर मेरा माखन चुरा रहा था, तो वहीं यशोदा बताती है कि वह अपने खिलौनों से भीतर खेल रहा है। एक तरफ मथुरा से द्वारका की ओर प्रयाण हो रहा है तो दूसरी ओर महाभारत की व्यूह रचना रची जा रही है। इस सबके बावजूद कृष्ण अपने हर साथी से अकेले मिलने का अवसर भी उठा लेते हैं। यानी श्रीकृष्ण हर समय अकेले भी हैं, किसी न किसी के साथ भी हैं और किसी के साथ नहीं है। अपने साथियों के साथ भी नहीं।


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