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ज्योतिष और ह्रदय रोग

ज्योतिष और ह्रदय रोग

Rekha Kalpdev
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आधुनिक काल अपने साथ कई नई तकनीक अपने साथ लेकर आया हैं ओर साथ लेकर आया हैं अनेकों-अनेक बीमारियां। इन्हीं अनेक बीमारियों में से एक बीमारी ह्दय रोग हैं। इस बीमारी का मुख्य कारण आज का खान-पान और आज की बिगड़ी हुई जीवन शैली हैं। ह्रदय रोग किसी आयुवर्ग तक सीमित नहीं रह गया हैं। इस रोग का विस्तार तीव्र गति से होता जा रहा हैं। वैसे तो चिकित्सा जगत अपने आप में पूर्ण और सक्षम हैं। परन्तु महंगे चिकित्सा ईलाज का भार उठाना सभी के लिए संभव नहीं हैं। कोई भी रोग यदि अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही पकड़ में आ जाए तो उसे पूरी तरह से समाप्त करना संभव हैं। इसके विपरीत जब रोग बढ़ जाता हैं तो वह लाईलाज हो जाता हैं। रोगों की समय पर पहचान करने में जन्मकुंडली महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। चिकित्सा जगत में रोग की पहचान रोग के लक्षण प्रकट होने के बाद ही की जा सकती हैं परन्तु ज्योतिष चिकित्सा जगत इस सबसे बहुत आगे हैं। आज यदि ज्योतिष विद्या और चिकित्सा जगत दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रुप में प्रयोग किया जा सकता हैं। कुंडली से रोग की पहचान और चिकित्सा जगत से इसका ईलाज किया जाए तो कोई रोग लाईलाज नहीं रहेगा। ह्द्रय रोग की पहचान करने में ज्योतिष विद्या किस प्रकार उपयोगी साबित हो सकती हैं आइये जानें-


Heart Deasese

रोग से संबंधित भाव

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का पहला भाव शरीर हैं, छ्ठा भाव रोग हैं, आठवां भाव लम्बी अवधि के रोगों का हैं और बारहवां भाव अस्पताल और गहन चिकित्सा का हैं। इसके अतिरिक्त कुंडली के विभिन्न भावों को शरीर के विभिन्न अंगों में वर्गीकूत किया गया हैं। जब ६, ८ व १२ वें भाव व भावेश का संबंध शरीर के जिस भाव या भावेश से बनता हैं। शरीर के उस अंग में रोग होने के योग बढ़ जाते हैं। ६, ८ व १२ वें भाव के स्वामी को अशुभ भाव की संग्या दी जाती हैं। इसीलिए इन भावों को त्रिकभावों के नाम से भी जाना जाता हैं। द्वितीय भाव और सप्तम भाव को मारकेश का नाम दिया गया है। तीसरा, सातवां और आठवां भाव मृत्यु भाव हैं। ज्योतिष शास्त्र में ह्द्रय स्थान से जुड़े रोग जानने के लिए कर्क राशि का विश्लेषण किया जाता हैं। कर्क राशि और कर्क राशि चंद्रमा इस रोग के कारक ग्रह हैं। ह्रदय अंग का प्रतिनिधित्व सूर्य हैं। ग्रहों में सूर्य रोगों से लड़ने की शक्ति का सूचक भी हैं।

  • मंगल और चंद्र की युति, चतुर्थ भाव में हों और नीच राशि में हों तो ह्रदय से जुड़े रोग जन्म ले सकते हैं। चतुर्थ भाव, चतुर्थेश और कर्क राशि का पापी ग्रहों से पीडित होना ह्रद्य विकार उत्पन्न करने की क्षमता रखता है।
  • सूर्य-शनि, चन्द्र-राहु, मंगल-केतु का आपस में विरोधात्मक संबंध हैं, इसलिए इन ग्रहों का एक-दूसरे से किसी भी प्रकार से संबंध होना रोग देता हैं।
  • हृदय रोग में सूर्य अशुद्ध रक्त को फेफड़ों द्वारा शुद्ध करके शरीर को पहुंचाता है, चन्द्रमा रक्त, मन व मानवीय भावना, मंगल रक्त की शक्ति, बुध श्वसन तंत्र, मज्जा, रज एवं प्राण वायु, गुरु फेफड़े व शुद्ध रक्त, शुक्र मूत्र, चैतन्य, शनि अशुद्ध रक्त का कारक है।
  • ह्रदय रोग का चतुर्थ और पंचम दोनों भावों से विश्लेषण किया जाता हैं। इस विषय में दो मत सामने आते हैं। एक मत चतुर्थ भाव का समर्थन करता हैं तो दूसरा पंचम भाव का। आईये अब पंचम भाव से ह्र्द्रय रोग का विश्लेषण करते हैं-
  • पंचमेश का द्वादश भाव में होना या पंचमेश एवं द्वादशेश दोनों एक साथ ६, ८ और १२वें भाव में हों या पंचमेश नवांश में पाप ग्रहों से युति कर रहा हों अथवा दृष्ट हों तो ह्रदय रोग की संभावनाएं बनती हैं।
  • पंचमेश अथवा पंचम भाव और सिंह राशि जन्मकुंडली में पाप ग्रहों से युत या दृष्ट हो।
  • पंचमेश तथा षष्ठेश का रोग भाव की एक साथ होना तथा पंचम और सप्तम भाव में पाप ग्रह स्थित हों।

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  • यदि कुंडली में चतुर्थ भाव में गुरु, सूर्य और शनि तीनों एक साथ हों अथवा मंगल, गुरु और शनि एक साथ हों तो ह्रद्य रोग अस्वस्थता का कारण बनता है।
  • उपरोक्त योग में यदि चौथे और पांचवें भाव में पाप ग्रह हों तब भी ह्रदय रोग कष्ट देता हैं।
  • पंचमेश का पाप ग्रहों से पीडित होना, फिर वह चाहे युति के कारण हो रहा हों या फिर दृष्टि की कारण अथवा छ्ठे भाव का स्वामी सूर्य पाप ग्रहों से युति होकर चतुर्थ भाव में हो।
  • कर्क और वृष राशि में चंद्रमा पाप ग्रहों से युति हो या पापग्रहों के मध्य चंद्रमा स्थित हो तो ह्द्रय रोग परेशानियां देता है।
  • यदि चतुर्थेश बारहवें भाव में व्ययेश के साथ हो या नीच राशिस्थ, शत्रु राशिस्थ हो, अस्त हो अथवा जन्म पत्री में शनि, मंगल, राहु व केतु होने पर व्यक्ति को ह्रदय रोग होता हैं।
  • जब शुक्र कुंडली में नीच राशि का हो तो शुक्र की महादशा में ह्रदय रोग स्वास्थ्य में कमी का कारण बनता हैं।
  • कुंडली के पंचम भाव, पंचमेश, सिंह राशि में स्थित ग्रह और सूर्यग्रह इन सब में से कोई भी ग्रह पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो ह्रद्य रोग सेहत खराब करता हैं।
  • जब पंचम भाव में नीच के ग्रह स्थित हो, विशेष रुप से बुध नीचस्थ, राहु व ८वें भाव का स्वामी हों, साथ ही चतुर्थ भाव में शत्रु राशि में सूर्य-शनि के साथ पीड़ित अवस्था में हो तो जातक को ह्रदय रोग अवश्य होता है।
  • यदि राहु चतुर्थ भाव में हों और लग्नेश भी पापग्रहों के प्रभाव में होने के कारण पीडि़त हो रहा हो तो ह्रदय रोग होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
  • कुंडली का चतुर्थ भाव जब भी राहु / केतु से पीडित होगा तथा लग्नेश भी पाप ग्रहों के साथ होने के कारण निर्बल होगा तो जातक रोगग्रस्त तो रहेगा ही ह्रदय से जुड़ी बीमारियों से भी पीडित होगा।

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