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श्री हनुमानजी

श्री हनुमानजी

Vinay Garg
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हनुमानजी के बारे में एक दुर्लभ प्रस्तुति


राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना॥


श्री हनुमानजी भगवान् के भवन के मुख्य द्वारपाल हैं, भगवान् ने कहा है कि जब भी मेरे द्वार पर मेरा दर्शन करने आओगे तो तब तुम्हें पहले हनुमानजी का दर्शन करना होगा, तभी मेरा दर्शन मिलेगा, इसलिये आपको भगवान् के मन्दिर में प्रथम दर्शन हनुमानजी का होता हैं

भगवान् का जो निजधाभ है जहाँ परम ब्रह्म भगवान रामजी निवास करते हैं यानी साकेत में, श्रीहनुमानजी एक रूप में साकेत में हमेशा निवास करते हैं, जो भी कोई भक्त अपनी याचना लेकर हनुमानजी के पास आता है तो हनुमानजी ही प्रभु के पास जाकर प्रार्थना करते हैं कि प्रभु इस पर कृपा करें।

साकेत में गोस्वामीजी ने भी भगवान् के दर्शन की प्रार्थना इसी प्रकार की, विनयपत्रिका भी जब लिखी है उस पर हस्ताक्षर कराने भी हनुमानजी के पास आते हैं, सकाम भाव से जो भक्त आते हैं हनुमानजी हमेशा उनको द्वार पर बैठे मिलते हैं और हनुमानजी की इच्छा है कि यह छोटे-छोटे काम जो तुम लेकर आये हो मेरे प्रभु को अकारण कष्ट मत दो, प्रभु बहुत कोमल हैं, बहुत सरल हैं लाओ इनको मैं निपटाता हूँ।

इसलिये हनुमानजी हमेशा द्वार पर मिलते हैं और कोई प्रेम के वशीभूत, भाव के वशीभूत आता है तो हनुमानजी उसे भगवान् के भवन के द्वार में अन्दर प्रवेश करा देते हैं, दर्शन के लिए कोई आता है तो उसको प्रवेश करा देते हैं, मनोकामना लेकर आता है तो स्वयं हनुमानजी पूरी करा देते हैं, क्योंकि माँ ने पहले ही आशीर्वाद दे दिया था।

माँ को भी मालूम था कि संसार में कितने लोग हैं जिनके कितने प्रकार के काम हैं, प्रतिदिन भीड़ लगेगी, भगवान् के दरबार पर कौन निपटायेगा, तो हनुमान यह काम तुम पूरा करोगे, शायद इसीलिये ही "राम दुआरे तुम रखवारे" का दूसरा भाव ऐसा ही लगता है जैसे कथा से पहले कथा का मंगलाचरण होता है।

राम दर्शन से पहले मंगलमूर्ति मारूति नन्दन हनुमानजी का दर्शन आवश्यक है, घर के बाहर जब कोई विशेष दिन होता है तो हम लोग मंगल कलश सजाकर रखते है, भगवान् श्रीरामजी ने अपने घर के बाहर प्रतिदिन मंगल कलश के रूप मे हनुमानजी को विराजित किया है

भगवान् का भवन तो मंगल भवन अमंगलहारी है पर उनके द्वार पर भी तो मंगल कलश चाहिए, अपना जो मंगलमय परिवार का चिन्ह है यह मंगल कलश है, इस कलश के रूप मे श्रीहनुमानजी मंगल मूर्ति विराजमान हैं।

मंगल मूरति मारूति नन्दन, सकल अमंगल मूल निकन्दन।
पवन तनय संतन हितकारी, ह्रदय विराजत अवध बिहारी।


श्री हनुमानजी की शरण में जो भी आ जाता है उसकी हनुमानजी स्वयं रक्षा करते हैं, शरणागत को किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता, जो हनुमानजी की शरण में एक बार आ गया उसकी क्या अवस्था हो जाती है, गोस्वामीजी ने कहा है।

सुर दुर्लभ सुखकरि जग माँही। अन्तकाल रघुपतिपुर जाई।।<>/p

जो सुख देवताओं को भी दुर्लभ है उनका हनुमानजी की कृपा से साधारण सा मनुष्य भोग कर लेता है, यह भोग, यह सुख सुग्रीव को भी मिला, विभीषण को भी मिला, वानरों को मिला, जो हनुमानजी की शरण में आया उसे सुख मिलता है।

सुख की अनुभूति कौन करता है? सुख का अनुभव करती है हमारी ज्ञानेन्द्रियां और हनुमानजी ज्ञान गुणसागर है, हनुमानजी "ज्ञानिनामग्रगंण्यम" (कान, नाक, त्वचा, आँख व जीभ) यह पाँच हमारी ज्ञानेन्द्रियां हैं, इसका रस तो भगवतरस है यही रस का, सुख का अनुभव कराती है।


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